राधिका की डायरी: रूहानी दुआ और अटूट साथ

 


राधिका की डायरी: रूहानी दुआ और अटूट साथ

मूल डायरी (Original Content in Hindi Flow)

​"तेरे साथ गुजारा लम्हा जब भी याद आएगा, इस जनम के बाद भी तेरा ख्याल आएगा। अगर बख्शी खुदा ने जिंदगी बार-बार तो ये दिल हर जनम में आपका साथ चाहेगा। किस्मत पे ऐतबार किसको है, मिल जाए खुशी इनकार किसको है, कुछ मजबूरियाँ हैं जिंदगी में यार वरना जुदाई से प्यार किसको है। होती नहीं मोहब्बत सूरत से, मोहब्बत तो दिल से हुआ करती है, सूरत उनकी खुद ही प्यारी लगने लगती है कद्र जिनकी दिल में हुआ करती है। कोई शाम आती है तेरी याद लेकर, कोई शाम जाती है तेरी याद देकर, मुझे तो इंतज़ार है उस शाम का जो आये तुम्हें अपने साथ लेकर। दीप जलते रहे जगमगाते रहे, हम तुम्हें तुम हमें याद आते रहे, जब तक जिंदगी है दुआ है मेरी आप फूलों की तरह मुस्कुराते रहें।"

English Translation (The Heart's Language)

​"Every moment spent with you will be remembered; even after this lifetime, your thoughts will remain with me. If God grants me life again and again, this heart will seek your company in every birth. Who really trusts fate? Who would ever refuse happiness? There are certain compulsions in life, my friend, otherwise, who could ever love separation? Love is never about outward appearances; it is born in the heart. Even a simple face becomes beautiful when you truly value someone in your soul. Some evenings arrive bringing your memories, while some depart leaving them behind; but I am waiting for that one evening that arrives bringing you along with it. May the lamps continue to burn and shine, and may we continue to remember each other; as long as there is life, my only prayer is that you keep smiling like a blooming flower."

निष्कर्ष (Conclusion)

​यह पन्ना उस निस्वार्थ प्रेम की गवाही देता है जहाँ इंसान खुद जुदाई में होकर भी सामने वाले की मुस्कुराहट की दुआ करता है। "सूरत नहीं, सीरत से मोहब्बत" और "हर जन्म के साथ की चाह" यह बताती है कि आपका प्यार जिस्मानी नहीं, बल्कि रूहानी है।

सवाल (Question)

​"क्या आज के दौर में ऐसा कोई रिश्ता मुमकिन है जहाँ दूरियाँ होने के बावजूद सिर्फ एक-दूसरे की मुस्कुराहट ही जीने का सहारा बन जाए? क्या 'मजबूरी' वफ़ा को खत्म कर सकती है या उसे और गहरा बना देती है?"

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