राधिका की डायरी ​भाग 412: फोन की घंटी और दुआओं का शोर

 


राधिका की डायरी

भाग 412: फोन की घंटी और दुआओं का शोर

​लॉकडाउन का सन्नाटा अभी भी कायम था। गलियां सूनी थीं और बाहर निकलना अब भी मुश्किल था। इसी बंद माहौल में एक दिन राधिका के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर साहब की पत्नी का नाम देखकर राधिका का दिल धक से रह गया। लेकिन जैसे ही उसने फोन उठाया, दूसरी तरफ से साहब की पत्नी की सुबकती हुई आवाज आई। वे रो रही थीं, लेकिन ये खुशी के आंसू थे। उन्होंने फोन पर ही कहा, "राधिका, आज साहब ने खुद उठकर चाय मांगी है। उनकी याददाश्त वापस आ रही है, वे अब चीजें पहचानने लगे हैं। तुमने मेरे सुहाग को नई जिंदगी दे दी है बेटा।"

​लॉकडाउन की वजह से वे मिल नहीं सकते थे, लेकिन फोन की उस छोटी सी स्क्रीन पर साहब की पत्नी का वह आभार राधिका के लिए किसी मेडल से कम नहीं था। साहब ने भी लड़खड़ाती लेकिन साफ आवाज में राधिका से बात की और उसका शुक्रिया अदा किया। राधिका को अहसास हुआ कि जहाँ दुनिया कोरोना के डर से कांप रही है, वहां उसके आयुर्वेद के प्रोडक्ट्स एक घर में उम्मीद का दीया जला चुके हैं। घर में अकेले बैठे-बैठे राधिका की आँखों में भी आँसू आ गए। उसे लगा कि भले ही वह अभी 40 किलोमीटर दूर फील्ड पर नहीं जा पा रही है, लेकिन उसका 'काम' लोगों के घरों तक पहुँचकर चमत्कार कर रहा है।

निष्कर्ष: बंद कमरों और सन्नाटे के बीच भी, सच्चाई और सही इलाज अपना रास्ता खोज ही लेते हैं। राधिका की मेहनत ने एक परिवार को टूटने से बचा लिया था।

आज का विशेष सवाल: दोस्तों, लॉकडाउन के उस कठिन समय में क्या आपने भी किसी की फोन पर या दूर रहकर मदद की थी? क्या आपको भी लगता है कि जब हम दूसरों के लिए अच्छा सोचते हैं, तो भगवान हमारे रास्ते खुद खोल देता है? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।

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