राधिका की डायरी Part 371: The Silent Guardian at the Bedside
राधिका की डायरी
Part 371: The Silent Guardian at the Bedside
Radhika looked at the ₹5,000 in her hand and then at the hospital bills that had already crossed ₹40,000. She realized that giving this small amount to her sister-in-law wouldn't make a significant difference to the treatment, but it was vital for her own survival. She needed that money to travel, to sustain herself, and most importantly, to continue the expensive rituals for her son’s safety. She decided to keep the money and instead offer her physical presence and spiritual strength.
She made a firm decision: she would not leave the hospital until her daughter was discharged. For the next few days, the hospital ward became her temple. Amidst the smell of medicines and the constant beeping of monitors, Radhika continued her 'Sadhana'. She would sit in a corner, eyes closed, chanting mantras for both her children. To the world, she was just a tired mother sitting by a bed, but internally, she was a warrior woman fighting a spiritual battle against the illness of one child and the enemies of the other.
भाग 371: अस्पताल के बिस्तर के पास एक मौन तपस्या
राधिका ने अपने हाथ में रखे उन 5000 रुपयों को देखा और फिर 40,000 के उन बिलों को, जो उसकी ननद पहले ही भर चुकी थी। उसे समझ आ गया कि यह छोटी सी रकम उस भारी खर्च के सामने ऊँट के मुँह में जीरा जैसी थी। अगर वह ये पैसे दे भी देती, तो उसका खुद का आना-जाना मुश्किल हो जाता और सबसे जरूरी—वह अपने बेटे की सुरक्षा के लिए जो अनुष्ठान और पूजा कर रही थी, उसका खर्च कैसे उठाती? उसने वह पैसा अपने पास सुरक्षित रखा और खुद को पूरी तरह बेटी की सेवा में झोंक दिया।
राधिका ने तय कर लिया कि जब तक बेटी पूरी तरह ठीक होकर डिस्चार्ज नहीं हो जाती, वह यहाँ से टस से मस नहीं होगी। वह अस्पताल का कोना ही अब उसकी साधना का केंद्र बन गया। दवाइयों की गंध और मशीनों के शोर के बीच, राधिका अपनी पूजा और मंत्र जाप जारी रखती। वह बिस्तर के पास बैठती और मन ही मन सुंदरकांड और सुरक्षा मंत्रों का पाठ करती। दुनिया के लिए वह सिर्फ एक लाचार माँ थी, लेकिन हकीकत में वह एक तपस्विनी थी जो अपनी एक संतान की बीमारी और दूसरी संतान के दुश्मनों से अकेले लड़ रही थी।
निष्कर्ष: राधिका ने हार नहीं मानी। उसने पैसों के अभाव को अपनी भक्ति और सेवा से भरने की कोशिश की, इस उम्मीद में कि दवाइयों से ज्यादा दुआएं काम करेंगी।
मजबूत सवाल: क्या राधिका की यह मौन साधना अस्पताल के उन डॉक्टरों को भी हैरान कर देगी? क्या ग्लूकोज के सहारे टिकी उसकी बेटी की जिंदगी में राधिका की प्रार्थनाएं कोई नया मोड़ लाएंगी?
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