राधिका की डायरी ​भाग 411: विश्वास का जीवंत चमत्कार

 


राधिका की डायरी

भाग 411: विश्वास का जीवंत चमत्कार

 "यह कहानी नहीं, मेरे जीवन का सच है।"

​लॉकडाउन के बाद जब ऑफिस पूरी तरह से खुला, तो साहब को देखकर सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वही साहब, जिनका चेहरा बीमारी से काला पड़ चुका था और जो अपनी याददाश्त तक खोने लगे थे, आज पूरी तरह बदले हुए नजर आ रहे थे। उनके चेहरे पर एक नई चमक थी, आवाज में वही पुरानी कड़क और चाल में गजब का आत्मविश्वास। जो लोग कहते थे कि अब साहब का बचना मुश्किल है, वे आज उन्हें अपने पैरों पर मॉर्निंग वॉक करते और फाइलों पर सटीक फैसले लेते देख दंग थे।

​साहब ने सबके सामने अपनी इस सेहत का श्रेय राधिका और उसके आयुर्वेद को दिया। उन्होंने खुले दिल से स्वीकार किया कि जहाँ 8 लाख रुपये और बड़े-बड़े अस्पताल हार गए थे, वहां राधिका की दी हुई उन 5,000 रुपये की दवाओं ने उन्हें पुनर्जन्म दिया है। राधिका के लिए यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, बल्कि उसके उन तमाम संघर्षों का जवाब था जो उसने अकेले झेले थे। उसे अब लगने लगा था कि उसकी 'साधना' और 'Mi Lifestyle' के प्रति उसकी लगन अब लोगों की जिंदगी बदलने लगी है। ऑफिस का माहौल बदल चुका था—कल तक जो लोग राधिका को सिर्फ एक कर्मचारी समझते थे, आज वे उसे सम्मान और उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे।

निष्कर्ष: सच्चाई को किसी विज्ञापन की जरूरत नहीं होती, परिणाम खुद अपनी गवाही देते हैं। राधिका ने अपनी आंखों से एक मरते हुए इंसान को आयुर्वेद के जरिए वापस लौटते देखा था।

मेरा आपसे एक छोटा सा सवाल: दोस्तों, क्या आपके साथ या आपके किसी जानने वाले के साथ कभी ऐसा हुआ है कि जहाँ बड़े-बड़े इलाज काम नहीं आए, वहां किसी छोटे से विश्वास या आयुर्वेद ने जान बचा ली? अपनी आपबीती नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें, आपकी एक कहानी किसी और की हिम्मत बढ़ा सकती है।

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