राधिका की डायरी Part 377: The Grueling Journey Across Villages



राधिका की डायरी

Part 377: The Grueling Journey Across Villages

Radhika knew that finding 25 interested farmers in a single village was impossible. To complete her target, she had to navigate through multiple small hamlets scattered across the region. Despite her 'Nirjala' fast, which left her throat parched and her body weak, she didn't let her pace slacken. From the first village, she could only gather five files; for the rest, she had to trek through rugged paths to reach the next destination.

In each village, she went door-to-door, explaining the benefits of silk farming. Collecting documents like the 'Khasra' and 'Naksha' (land records) was a tedious task, as many farmers didn't have their papers ready. She sat with them under neem trees, patiently answering their doubts while her own parched lips struggled to speak. By the end of the day, she was covered in dust and exhausted, but the hope she saw in the eyes of the poor farmers became her strength. Every step she took on that dry land was a testament to her dedication to her children and her duty.

भाग 377: गाँवों की धूल और अटूट संकल्प

राधिका अच्छी तरह जानती थी कि एक ही गाँव में 25 किसान मिलना मुमकिन नहीं है। अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए उसे एक गाँव से दूसरे गाँव की खाक छाननी थी। उसका 'निर्जला' व्रत था, गला सूखकर काँटा हो रहा था और शरीर में ऊर्जा खत्म हो रही थी, लेकिन उसके कदमों में गजब की तेजी थी। पहले गाँव से उसे केवल पाँच फाइलें मिल पाईं; बाकी के लिए उसे ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए अगले पड़ाव की ओर बढ़ना पड़ा।

हर गाँव में वह घर-घर गई, किसानों को रेशम पालन के फायदे समझाए। खसरा और नक्शा जैसे दस्तावेज़ इकट्ठा करना सबसे बड़ा सिरदर्द था, क्योंकि कई किसानों के पास कागजात तैयार ही नहीं थे। तपती दोपहर में वह नीम के पेड़ों के नीचे बैठकर उनके शक दूर करती, जबकि उसके खुद के सूखे होंठ बोलने में भी तकलीफ दे रहे थे। दिन ढलने तक वह धूल से सनी हुई और बेहद थक चुकी थी, लेकिन उन गरीब किसानों की आँखों में जागी उम्मीद ही उसकी ताकत बन गई। उस सूखी जमीन पर उसके बढ़ते कदम इस बात का सबूत थे कि वह अपने बच्चों और अपने फर्ज के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

निष्कर्ष: राधिका की मेहनत रंग ला रही थी। प्यास से लड़ते हुए उसने मीलों का सफर तय किया ताकि उन किसानों का भविष्य और अपना घर संवर सके।

मजबूत सवाल: क्या राधिका सूरज ढलने से पहले उन सभी 25 किसानों के दस्तावेज़ों का इंतज़ाम कर पाएगी? और क्या इस निर्जला उपवास के बाद उसके शरीर में इतनी जान बचेगी कि वह वापस अपने कमरे तक सुरक्षित पहुँ

च सके?

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भाग 4 = एक नया मोड़ टर्निंग प्वाइंट

भाग 3 = शुभ दीपावली जैसे दीपावली में दीपक की रोशनी से घर में उजाला हो जाता है वैसे ही मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सब के जीवन से दुख परेशानी चिंता उदासी हमेशा हमेशा के लिए चली जाए खुशी मुस्कुराहट सुख समृद्धि धन वैभव हमेशा हमेशा के लिए रोशनी बन कर आ जाए शुभ दीपावली

' भाग 1= पाँचवी पास ने क्यों शुरू किया आयुर्वेद का बिज़नेस? मेरी कहानी!'