राधिका की डायरी ​Part 404: The Silence of the Locked World

 


राधिका की डायरी

Part 404: The Silence of the Locked World

​The onset of the pandemic brought a haunting silence everywhere. For Radhika, the most painful part was the disruption of her spiritual routine. As the lockdown intensified, it became impossible to find a priest for her monthly Satyanarayan Puja, and even the basic ceremonial items were no longer available in the market. The streets were deserted, and the vibrant energy of her progress was replaced by an eerie stillness. The Ayurveda consultant, who used to be her guide, could only visit occasionally, and soon, the field visits to the farmers also came to a grinding halt.

​The momentum Radhika had built with such grit was suddenly frozen. Her 25 farmers were stuck, her business was stalled, and the files she had fought so hard to pass were now lying dormant in closed offices. It felt as if time itself had betrayed her. She sat alone in her room, watching the world shut down through her window, worried about her son who was far away and trapped in a toxic environment. But even in this isolation, Radhika knew she couldn't give up. If she couldn't perform the grand rituals, she would have to find the strength within her heart to keep her hope alive during these dark times.

भाग 404: थमी हुई दुनिया और खामोश प्रार्थनाएँ

​कोरोना के बढ़ते प्रकोप ने पूरी दुनिया को घरों में कैद कर दिया। राधिका के लिए सबसे दुखद वह पल था जब उसकी अटूट 'सत्यनारायण कथा' की परंपरा में बाधा आई। लॉकडाउन की वजह से न तो पंडित मिल रहे थे और न ही पूजा की सामग्री। जिस आध्यात्मिक शक्ति के बल पर वह पहाड़ जैसे दुखों से लड़ रही थी, अब वह मार्ग भी बंद होता दिख रहा था। आयुर्वेद वाले सर का आना भी अब कभी-कभार ही हो पाता था और धीरे-धीरे खेतों में जाने का काम भी पूरी तरह बंद हो गया।

​राधिका ने जो रफ़्तार पकड़ी थी, उस पर जैसे किसी ने अचानक ब्रेक लगा दिया हो। जिन 25 फाइलों के लिए उसने चप्पलें घिसी थीं, वे अब बंद दफ्तरों में धूल खाने लगी थीं। सब कुछ थमने लगा था। उसे अपने बेटे की चिंता सता रही थी, जो उससे दूर उस 'जेल' जैसे घर में फंसा हुआ था जहाँ से राधिका उसे निकालना चाहती थी। सड़कों पर सन्नाटा था और राधिका के मन में शोर। उसे लग रहा था कि क्या उसकी सारी मेहनत इस महामारी की भेंट चढ़ जाएगी? लेकिन अपनी तन्हाई में भी, राधिका ने अपनी हिम्मत को टूटने नहीं दिया; अगर बाहर की पूजा बंद थी, तो उसने अपने भीतर की साधना को और मजबूत करने का फैसला किया।

निष्कर्ष: लॉकडाउन ने राधिका के हाथ-पैर तो बांध दिए थे, लेकिन वह उसके संकल्प को नहीं बांध सका। वह जानती थी कि यह दौर भी उसकी एक बड़ी परीक्षा है।

मजबूत सवाल: जब सारे रास्ते बंद हो रहे थे, तब राधिका अपने और अपने बेटे के मानसिक स्वास्थ्य को कैसे संभालेगी? क्या आयुर्वेद के वे प्रोडक्ट्स, जो उसने खरीदे थे, इस बीमारी के दौर में उसकी ढाल बनेंगे?

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