राधिका की डायरी Part 346: The Rhythm of Faith and Toil
राधिका की डायरी
Part 346: The Rhythm of Faith and Toil
From Monday to Friday, Radhika’s life became a seamless blend of relentless work and silent prayer. Every morning at 4:00 AM, she would rise to finish her Sundarkand path before the world woke up. By 9:00 AM, she was at the forest site, her eyes scanning every tree, every laborer, and every tin canister she had set up. The arrival of the Kosa eggs was imminent, and the pressure was immense. Throughout the day, while navigating the rough forest terrain and managing the workers, the mantra "Om Namo Bhagavate Vasudevaya" was her constant companion—a silent hum beneath her breath that gave her the strength to ignore her aching limbs.
The week was a physical and mental grind. Living in a small room in 'Chhota Pakistan', she managed her own meals, her job, and the strict spiritual rules set by Pandit Ji. Her coworkers noticed a change in her—she spoke less, worked with a strange, quiet intensity, and seemed to be constantly lost in some internal devotion. She avoided any distractions, her mind fixed on the one-year goal. As Friday evening approached, a different kind of anxiety began to grip her. The next day was Saturday—the day of her first secret ritual at the Peepal tree, an act that had to be performed in absolute solitude and secrecy.
भाग 346: श्रम और श्रद्धा की लय
सोमवार से शुक्रवार तक राधिका का जीवन कठिन परिश्रम और मौन प्रार्थना का एक अटूट संगम बन गया था। हर सुबह 4:00 बजे वह जाग जाती ताकि दुनिया के जागने से पहले अपना सुंदरकांड का पाठ पूरा कर सके। सुबह 9:00 बजे तक वह जंगल में होती थी, जहाँ उसकी आँखें हर पेड़, हर मज़दूर और उसके द्वारा लगाए गए हर टिन के डिब्बे का निरीक्षण करती थीं। कोसा के अंडे आने ही वाले थे और ज़िम्मेदारी का बोझ बहुत बड़ा था। पूरे दिन जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते हुए और वर्करों को संभालते हुए, "ओम नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप उसका एकमात्र सहारा था—उसकी साँसों में बसने वाली यह ध्वनि उसे शरीर के दर्द को भूलने की शक्ति देती थी।
यह पूरा हफ्ता शारीरिक और मानसिक रूप से निचोड़ देने वाला था। 'छोटा पाकिस्तान' के उस छोटे से कमरे में रहते हुए वह खुद अपना खाना बनाती, अपनी नौकरी सँभालती और पंडित जी द्वारा बताए गए कड़े नियमों का पालन करती। उसके साथ काम करने वालों ने उसमें एक बदलाव महसूस किया—वह अब कम बोलती थी, एक अजीब सी शांत तीव्रता के साथ काम करती थी और ऐसा लगता था जैसे वह किसी आंतरिक साधना में लीन है। उसने खुद को हर भटकाव से दूर कर लिया था, उसका लक्ष्य बस वह एक साल था। जैसे-जैसे शुक्रवार की शाम नज़दीक आई, एक अलग तरह की घबराहट ने उसे घेर लिया। अगला दिन शनिवार था—पीपल के पेड़ के नीचे उसकी पहली गुप्त पूजा का दिन, जिसे उसे पूर्ण एकांत और गोपनीयता में संपन्न करना था।
निष्कर्ष: राधिका ने अपने काम और अपनी भक्ति के बीच एक ऐसा संतुलन बना लिया था जिसे देख पाना किसी साधारण इंसान के बस की बात नहीं थी। उसकी चुप्पी में एक माँ का सबसे बड़ा संकल्प छिपा था।
मजबूत सवाल: क्या राधिका शुक्रवार की रात चैन से सो पाएगी, या शनिवार की उस 'गुप्त पूजा' की घबराहट उसे रात भर जगाए रखेगी? क्या वह बिना किसी की नज़र में आए उस अनुष्ठान को पूरा कर पाएगी?
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