राधिका की डायरी Part 337: The Vow of a Mother’s Soul

 


राधिका की डायरी

Part 337: The Vow of a Mother’s Soul

Radhika felt as if her soul was being ripped apart. Desperate and trembling, she pleaded with Pandit Ji, "I cannot lose my son! If something happens to him, my life will have no meaning. I will end myself too; there is no purpose left for me in this world without them." Seeing her shattered state, Pandit Ji spoke with a calm, reassuring voice, "Do not lose heart, Radhika. There is no problem so difficult that it lacks a cure. Every challenge is born with a solution already in existence. Don't let tension consume you. I will consult my Guru Maharaj and find a ritual or a remedy to shield your son. Until then, you must stay strong."

But strength was hard to find. Radhika's hunger and thirst vanished, replaced by an agonizing wait. She vowed not to touch a single morsel of food until she heard her son's voice. For three long, grueling days, she wept and prayed, her body weakening but her maternal resolve standing firm. Finally, on the third day, the silence broke. She managed to connect with her son. Hearing his small, innocent voice say, "Mummy, I am perfectly fine," felt like life-giving breath returning to her lungs. Only then did the dark clouds of immediate terror begin to lift.

भाग 337: एक माँ का आत्मिक संकल्प

राधिका को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी आत्मा के टुकड़े-टुकड़े हो रहे हों। बदहवास और कांपते हुए उसने पंडित जी से गुहार लगाई, "मैं अपने बेटे को नहीं खो सकती! अगर उसे कुछ हुआ, तो मेरे जीने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। मैं खुद को खत्म कर लूंगी; उनके बिना इस दुनिया में मेरा कोई उद्देश्य नहीं बचेगा।" उसकी टूटती हुई हालत देख पंडित जी ने सांत्वना देते हुए कहा, "हिम्मत मत हारो राधिका। ऐसी कोई कठिन समस्या नहीं जिसका कोई समाधान न हो। समाधान समस्या से पहले जन्म लेता है। तुम चिंता मत करो, मैं अपने गुरु महाराज से चर्चा करूँगा और तुम्हारे बेटे की रक्षा का कोई अचूक उपाय निकालूँगा। तब तक तुम्हें खुद को संभालना होगा।"

लेकिन खुद को संभालना राधिका के लिए नामुमकिन सा था। उसकी भूख-प्यास मर गई और उसकी जगह एक अंतहीन इंतज़ार ने ले ली। उसने प्रण ले लिया कि जब तक वह अपने बेटे की आवाज़ नहीं सुन लेगी, वह अन्न का एक दाना भी नहीं चखेगी। तीन लंबे और कष्टदायी दिनों तक वह रोती और प्रार्थना करती रही। उसका शरीर कमजोर पड़ रहा था, लेकिन उसकी ममता का संकल्प अडिग था। आखिरकार, तीसरे दिन चुप्पी टूटी। उसकी अपने बेटे से बात हो पाई। जब उसने सुना— "मम्मी, मैं बिल्कुल ठीक हूँ," तो राधिका को लगा जैसे उसके मृत शरीर में प्राण लौट आए हों। तब जाकर उसके दिल पर रखा भारी बोझ थोड़ा कम हुआ।

निष्कर्ष: एक माँ की तड़प भगवान को भी झुकने पर मजबूर कर देती है। राधिका का अन्न-जल त्यागना और अपने बच्चे की आवाज़ के लिए तड़पना उसके निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा थी। पंडित जी के आश्वासन ने उसे एक नई उम्मीद दी है, लेकिन खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है।

मजबूत सवाल: क्या एक बच्चे की "मैं ठीक हूँ" वाली मासूम आवाज़ उस गहरे 'मारक योग' को टालने के लिए काफी है, या यह केवल तूफान से पहले की शांति है?

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