​राधिका की डायरी ​Part 356: The Divine Grace of Purnima

 


​राधिका की डायरी

Part 356: The Divine Grace of Purnima

​The auspicious day of Purnima (Full Moon) had arrived, and Radhika knew she had to perform the Satyanarayan Puja as promised. She called her officer, requesting an emergency leave. The officer agreed but warned her, "The work in the forest must not stop." Radhika assured him with unwavering confidence, "Do not worry, sir. The work will proceed exactly as planned." With the leave granted, she threw herself into the preparations. She cleaned her small room, gathered the ritual items, and invited a few neighbors to join.

​When the priest arrived, Radhika sat down with a heart full of devotion. She observed a strict fast and prepared the sacred 'Prasad' with her own hands. The atmosphere in that small room in 'Chhota Pakistan' transformed as the chants of Lord Satyanarayan filled the air. She completed the Katha with full rituals, offered 'Dakshina' to the priest, and sought his blessings. But her day of devotion didn't end there. Even after the guests left, she sat down for her two-hour Sundarkand path. Her body was tired, but the spiritual energy of the Purnima gave her a sense of profound peace and the strength to face whatever challenges the coming 'lockdown' might bring.

भाग 356: पूर्णिमा की दिव्य कृपा

​पूर्णिमा का पावन दिन आ गया था और राधिका जानती थी कि उसे सत्यनारायण भगवान की कथा का अपना संकल्प पूरा करना है। उसने साहब को फोन किया और इमरजेंसी छुट्टी की माँग की। साहब ने छुट्टी तो दे दी पर चेतावनी भी दी, "देखो राधिका, जंगल का काम नहीं रुकना चाहिए।" राधिका ने अटूट विश्वास के साथ कहा, "आप निश्चिंत रहिए सर, काम में रत्ती भर भी रुकावट नहीं आएगी।" छुट्टी मिलते ही वह तैयारियों में जुट गई। उसने अपने छोटे से कमरे को साफ किया, पूजा की सामग्री जुटाई और आस-पास के कुछ लोगों को आमंत्रित किया।

​पंडित जी के आने पर राधिका पूरी श्रद्धा के साथ पूजा पर बैठी। उसने कड़ा व्रत रखा था और अपने हाथों से शुद्ध 'प्रसाद' बनाया था। 'छोटा पाकिस्तान' के उस छोटे से कमरे का माहौल तब बदल गया जब सत्यनारायण भगवान की कथा के श्लोक गूँजने लगे। उसने पूरे विधि-विधान से कथा संपन्न की, पंडित जी को दक्षिणा देकर विदा किया और उनका आशीर्वाद लिया। लेकिन उसकी भक्ति का दिन यहीं समाप्त नहीं हुआ। मेहमानों के जाने के बाद, वह फिर से दो घंटे के सुंदरकांड पाठ के लिए बैठ गई। शरीर थका हुआ था, लेकिन पूर्णिमा की उस आध्यात्मिक ऊर्जा ने उसे एक गहरी शांति और आने वाले 'लॉकडाउन' की चुनौतियों से लड़ने की शक्ति दे दी थी।

निष्कर्ष: पूर्णिमा का चाँद राधिका के विश्वास की तरह चमक रहा था। उसने साबित कर दिया कि जब इंसान नारायण की शरण में होता है, तो वह बड़ी से बड़ी ज़िम्मेदारी और बीमारी को मुस्कुराकर झेल सकता है।

मजबूत सवाल: क्या पूर्णिमा की यह विशेष पूजा राधिका के बच्चों के लिए वह सुरक्षा कवच और मज़बूत कर देगी जिसकी उसे ज़रूरत थी? और क्या आने वाली वैश्विक महामारी उसके इस अटूट नियम को तोड़ पाएगी?

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