राधिका की डायरी ​Part 367: The Superhuman Strength of a Mother

 


राधिका की डायरी

Part 367: The Superhuman Strength of a Mother

​Within those intense 48 hours, Radhika turned into a whirlwind of activity. She was juggling the preparations for the Satyanarayan Puja with the high-stakes Kosa harvest. Displaying brilliant management skills, she decided to increase the number of laborers. She calculated that instead of four laborers working for eight days, eight laborers could finish the task in just four days. Her strategy worked flawlessly—within six days, the entire Kosa harvest was plucked and ready.

​But what was truly miraculous was her spiritual endurance. Even amidst the chaotic labor management and financial stress, her soul remained tethered to the divine. Her constant chanting of mantras and the recitation of Sunderkand never stopped. She continued her Sunday fast and maintained her secret Saturday rituals (Gupt Puja) without fail. It was as if her devotion was the fuel that kept her exhausted body moving, proving that when a mother fights for her children, even time and fatigue bow down before her.

भाग 367: महामानवीय शक्ति और संकल्प की पराकाष्ठा

​उन दो दिनों के भीतर राधिका एक ऐसी ऊर्जा से भर गई जिसने सबको हैरान कर दिया। एक ओर सत्यनारायण पूजा की तैयारी थी और दूसरी ओर कोसा तुड़वाने की भारी जिम्मेदारी। राधिका ने यहाँ अपनी गजब की सूझबूझ दिखाई; उसने हिसाब लगाया कि चार लेबर अगर आठ दिन काम करेंगे तो बहुत समय निकल जाएगा, इसलिए उसने लेबर की संख्या बढ़ाकर आठ कर दी ताकि काम चार दिन में ही सिमट जाए। उसकी यह योजना सफल रही और छह दिनों के भीतर कोसा की पूरी फसल टूटकर तैयार हो गई।

​लेकिन सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात उसकी आध्यात्मिक शक्ति थी। लेबरों की भागदौड़, पैसों की तंगी और बेटी की चिंता के बीच भी उसका मंत्र जाप और सुंदरकांड का पाठ एक पल के लिए भी नहीं रुका। उसका रविवार का उपवास और शनिवार की गुप्त पूजा भी पूरी निष्ठा के साथ चलती रही। ऐसा लग रहा था मानो उसकी भक्ति ही उसके बीमार शरीर को वो ताकत दे रही थी जिसकी उसे इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत थी। उसने साबित कर दिया कि जब एक माँ अपनी संतान की रक्षा का संकल्प लेती है, तो थकान और वक्त भी उसके सामने घुटने टेक देते हैं।

निष्कर्ष: राधिका ने असंभव को संभव कर दिखाया था। फसल कट चुकी थी और पूजा संपन्न हो गई थी, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी—अस्पताल में भर्ती उसकी बेटी की खबर और वह खाली जेब जिसे अब इस फसल से भरना था।

मजबूत सवाल: क्या इस अथक परिश्रम और अटूट भक्ति का फल राधिका को उसकी बेटी की मुस्कुराहट के रूप में मिलेगा? क्या कोसा की यह तैयार फसल उसे फिर से आर्थिक रूप से खड़ा कर पाएगी?

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भाग 4 = एक नया मोड़ टर्निंग प्वाइंट

भाग 3 = शुभ दीपावली जैसे दीपावली में दीपक की रोशनी से घर में उजाला हो जाता है वैसे ही मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सब के जीवन से दुख परेशानी चिंता उदासी हमेशा हमेशा के लिए चली जाए खुशी मुस्कुराहट सुख समृद्धि धन वैभव हमेशा हमेशा के लिए रोशनी बन कर आ जाए शुभ दीपावली

' भाग 1= पाँचवी पास ने क्यों शुरू किया आयुर्वेद का बिज़नेस? मेरी कहानी!'