राधिका की डायरी Part 364: The Test of Emptiness and Faith

 

राधिका की डायरी

Part 364: The Test of Emptiness and Faith

The much-awaited call didn't come, so Radhika finally made the call herself. The news was heart-breaking: the loan wasn't approved yet, and it could take a long time. Her heart sank. The ₹65,000 'Goa Offer' and her dream of a side business seemed to be slipping away. But a bigger worry weighed on her soul—the Purnima (Full Moon) was only two days away. It was time for her monthly Satyanarayan Puja, and for the first time, she had absolutely no money left.

Between the medical expenses, the costly Rudrabhishek, and the daily travel to the forest, every penny of her savings had been drained. Her expenses had far outpaced her meager income. To add to the pressure, the Kosa (silk) harvest was just 2-4 days away. She needed to prepare for the grueling task of harvesting, but her mind was stuck on the empty ritual plate for the upcoming puja. She stood at a crossroads, wondering how she would honor her promise to God and manage the harvest without a single rupee in her pocket.

भाग 364: खाली जेब और विश्वास की परीक्षा

इंतज़ार का बांध जब टूट गया, तो राधिका ने खुद फोन लगाया। उधर से जो खबर मिली उसने राधिका के पैरों तले ज़मीन खिसका दी—लोन अभी पास नहीं हुआ था और इसमें काफी समय लग सकता था। उसका गोवा ऑफर और बिजनेस का सपना धुंधलाने लगा, लेकिन उससे भी बड़ी एक चिंता उसके मन को खाए जा रही थी। दो दिन बाद पूर्णिमा थी और उसे सत्यनारायण भगवान की कथा करानी थी। विडंबना यह थी कि उसके पास अब एक रुपया भी नहीं बचा था।

बीमारी का खर्च, महंगा रुद्राभिषेक और हर दिन जंगल आने-जाने का किराया—इन सबने उसकी जमापूंजी पूरी तरह खत्म कर दी थी। उसकी कमाई से कहीं ज़्यादा उसका खर्च बढ़ गया था। उधर कोसा की फसल भी तैयार खड़ी थी; दो-चार दिनों में कोसा तोड़ने का काम शुरू होने वाला था जिसकी तैयारी में भी पैसे और मेहनत दोनों की ज़रूरत थी। राधिका इस सोच में डूबी थी कि जिस भगवान ने उसे अब तक संभाला, उनकी पूजा के लिए वह सामग्री कहाँ से लाएगी? और बिना पैसों के वह इस भारी काम को कैसे अंजाम देगी?

निष्कर्ष: राधिका के सामने अब दोहरी चुनौती थी—एक तरफ उसकी धार्मिक निष्ठा और दूसरी तरफ उसकी जीविका (कोसा की फसल)। ऐसा लग रहा था मानो नियति उसे पूरी तरह खाली हाथ कर उसकी श्रद्धा की अंतिम परीक्षा ले रही थी।

मजबूत सवाल: क्या राधिका इस खाली जेब के साथ पूर्णिमा की पूजा कर पाएगी? क्या कोई अनजाना फरिश्ता उसकी मदद के लिए आएगा, या यह कोसा की फसल ही उसे इस संकट से उबारेगी?


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