​राधिका की डायरी ​Part 342: The Marathon of Faith and Duty

 


​राधिका की डायरी

Part 342: The Marathon of Faith and Duty

​Radhika knew that the path ahead was a race against time. Every morning at 9:00 AM, she had to oversee the labor at the forest site. But now, she had an even bigger responsibility—the spiritual shield for her son. After supervising the work for a couple of hours and ensuring everything was on track, she rushed towards her rented room, a staggering 150-kilometer journey away. Traveling by bus, her mind was solely focused on the task at hand. Upon reaching the market near her small room in 'Chhota Pakistan', she meticulously gathered everything: the raw cotton thread, black sesame, mustard oil for Saturday, and all the essentials for the Satyanarayan Puja.

​Exhausted but driven by a divine purpose, she finally returned to her room to prepare. After a restless night of planning, she was back at the forest site early the next morning to resume her duties. By the time evening fell and she returned to her small sanctuary, she was physically drained, but her spirit was stronger than ever. The preparations were complete; the materials for her year-long penance were ready. Now, the real test of her endurance and devotion was about to begin.

भाग 342: कर्तव्य और विश्वास की मैराथन

​राधिका जानती थी कि अब उसकी ज़िंदगी समय के साथ एक कठिन दौड़ बन चुकी है। हर सुबह 9:00 बजे उसे जंगल के काम की निगरानी करनी होती थी, लेकिन अब उसके कंधों पर एक और बड़ी ज़िम्मेदारी थी—अपने बेटे का सुरक्षा कवच। काम शुरू करवाने के एक-दो घंटे बाद, जब सब कुछ व्यवस्थित हो गया, राधिका वहाँ से अपने किराए के कमरे के लिए निकल पड़ी, जो वहाँ से पूरे 150 किलोमीटर दूर था। बस के लंबे सफर में भी उसका दिमाग केवल पूजा की तैयारी में लगा रहा। 'छोटा पाकिस्तान' इलाके में अपने छोटे से कमरे के पास पहुँचकर, वह सीधे बाज़ार गई। वहाँ से उसने सत्यनारायण भगवान की कथा का सामान, शनिवार की गुप्त पूजा के लिए कच्चा सूत, काली तिल, राई का तेल और हल्दी—सब कुछ बहुत ध्यान से जुटाया।

​थकान से चूर होने के बावजूद, वह सामान समेटकर अपने कमरे में आई और सब तैयार कर लिया। रात भर आराम करने के बाद, वह अगले दिन सुबह फिर से जंगल पहुँची, दिन भर काम सँभाला और शाम होते-होते वापस अपने कमरे पर लौट आई। उसके पास अब वह सारा सामान था जो उसकी एक साल की लंबी तपस्या के लिए ज़रूरी था। शरीर भले ही टूट रहा था, लेकिन मन को यह तसल्ली थी कि अब वह अपने बेटे के लिए ढाल बनने के लिए पूरी तरह तैयार है। उसकी साधना का सामान सज चुका था, अब बारी थी कठिन इम्तिहान की।

निष्कर्ष: 150 किलोमीटर का सफर और काम का बोझ भी एक माँ के कदमों को नहीं रोक सका। राधिका ने यह साबित कर दिया कि जब संकल्प बड़ा हो, तो दूरियाँ और थकान मायने नहीं रखतीं।

मजबूत सवाल: क्या राधिका का यह कमजोर शरीर रोज़ की इस भागदौड़ और हर शनिवार-रविवार के कठिन नियमों को एक साल तक झेल पाएगा, या नियति उसके रास्ते में कोई और बाधा खड़ी करेगी?​Radhika knew that the path ahead was a race against time. Every morning at 9:00 AM, she had to oversee the labor at the forest site. But now, she had an even bigger responsibility—the spiritual shield for her son. After supervising the work for a couple of hours and ensuring everything was on track, she rushed towards her rented room, a staggering 150-kilometer journey away. Traveling by bus, her mind was solely focused on the task at hand. Upon reaching the market near her small room in 'Chhota Pakistan', she meticulously gathered everything: the raw cotton thread, black sesame, mustard oil for Saturday, and all the essentials for the Satyanarayan Puja.

​Exhausted but driven by a divine purpose, she finally returned to her room to prepare. After a restless night of planning, she was back at the forest site early the next morning to resume her duties. By the time evening fell and she returned to her small sanctuary, she was physically drained, but her spirit was stronger than ever. The preparations were complete; the materials for her year-long penance were ready. Now, the real test of her endurance and devotion was about to begin.

भाग 342: कर्तव्य और विश्वास की मैराथन

​राधिका जानती थी कि अब उसकी ज़िंदगी समय के साथ एक कठिन दौड़ बन चुकी है। हर सुबह 9:00 बजे उसे जंगल के काम की निगरानी करनी होती थी, लेकिन अब उसके कंधों पर एक और बड़ी ज़िम्मेदारी थी—अपने बेटे का सुरक्षा कवच। काम शुरू करवाने के एक-दो घंटे बाद, जब सब कुछ व्यवस्थित हो गया, राधिका वहाँ से अपने किराए के कमरे के लिए निकल पड़ी, जो वहाँ से पूरे 150 किलोमीटर दूर था। बस के लंबे सफर में भी उसका दिमाग केवल पूजा की तैयारी में लगा रहा। 'छोटा पाकिस्तान' इलाके में अपने छोटे से कमरे के पास पहुँचकर, वह सीधे बाज़ार गई। वहाँ से उसने सत्यनारायण भगवान की कथा का सामान, शनिवार की गुप्त पूजा के लिए कच्चा सूत, काली तिल, राई का तेल और हल्दी—सब कुछ बहुत ध्यान से जुटाया।

​थकान से चूर होने के बावजूद, वह सामान समेटकर अपने कमरे में आई और सब तैयार कर लिया। रात भर आराम करने के बाद, वह अगले दिन सुबह फिर से जंगल पहुँची, दिन भर काम सँभाला और शाम होते-होते वापस अपने कमरे पर लौट आई। उसके पास अब वह सारा सामान था जो उसकी एक साल की लंबी तपस्या के लिए ज़रूरी था। शरीर भले ही टूट रहा था, लेकिन मन को यह तसल्ली थी कि अब वह अपने बेटे के लिए ढाल बनने के लिए पूरी तरह तैयार है। उसकी साधना का सामान सज चुका था, अब बारी थी कठिन इम्तिहान की।

निष्कर्ष: 150 किलोमीटर का सफर और काम का बोझ भी एक माँ के कदमों को नहीं रोक सका। राधिका ने यह साबित कर दिया कि जब संकल्प बड़ा हो, तो दूरियाँ और थकान मायने नहीं रखतीं।

मजबूत सवाल: क्या राधिका का यह कमजोर शरीर रोज़ की इस भागदौड़ और हर शनिवार-रविवार के कठिन नियमों को एक साल तक झेल पाएगा, या नियति उसके रास्ते में कोई और बाधा खड़ी करेगी?

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