राधिका की डायरी छोटे पलों की मधुर गूँज

 


राधिका की डायरी

​The Symphony of Small Moments

​As Kavya turned the page to October 29, a bittersweet smile touched her lips. This wasn't a page of grief, but a vivid painting of the days when their hearts beat in sync. She remembered how their lives revolved around each other—if one didn't eat, the other wouldn't touch their food. Even a ten-minute delay would lead to a playful drama of being 'upset,' though they couldn't stay apart for even an hour.

​"We used to torture ourselves and each other with these small fights," she recalled. But by evening, the anger would melt away like sugar in water, turning their bond into something as sweet as nectar. They were each other’s medicine; a single sneeze from him would have her lining up remedies, and any pain he felt made her a living prayer for his recovery.

​When they walked together, they were a sight that made people turn back and look. Their world was a parade of shared dreams, where the only constant was the desire to sacrifice everything for the other’s happiness.

​हिंदी अनुवाद: छोटे पलों की मधुर गूँज

​जब काव्या ने 29 अक्टूबर का पन्ना पलटा, तो उसके होठों पर एक मीठी और कड़वी मुस्कान आ गई। यह दुख का पन्ना नहीं था, बल्कि उन दिनों की एक जीवंत तस्वीर थी जब उनके दिल एक साथ धड़कते थे। उसे याद आया कि कैसे उनकी पूरी दुनिया एक-दूसरे के इर्द-गिर्द घूमती थी—अगर एक खाना नहीं खाता था, तो दूसरा खाने को हाथ तक नहीं लगाता था। 10 मिनट की देरी भी 'नाराजगी' के एक छोटे नाटक का कारण बन जाती थी, हालांकि वे एक घंटे भी एक-दूसरे से दूर नहीं रह सकते थे।

​"हम इन छोटी लड़ाइयों से खुद को और एक-दूसरे को तड़पाते थे," उसने याद किया। लेकिन शाम तक गुस्सा पानी में चीनी की तरह घुल जाता था, जिससे उनका रिश्ता अमृत जैसा मीठा हो जाता था। वे एक-दूसरे की दवा थे; उसे एक हल्की सी छींक भी आती तो वह दवाइयों की लाइन लगा देती, और उसकी कोई भी तकलीफ उसे दुआ बना देती थी।

​जब वे सड़क पर साथ चलते थे, तो देखने वाले उन्हें मुड़कर जरूर देखते थे। उनकी दुनिया साझा सपनों की एक बारात थी, जहाँ केवल एक ही जज्बा था—एक-दूसरे की खुशी के लिए अपनी जान तक न्योछावर कर देना।

​निष्कर्ष (Conclusion)

​डायरी का यह समापन हमें याद दिलाता है कि प्यार केवल बड़े वादों में नहीं, बल्कि उन छोटी परवाहों में बसता है जो हम रोजमर्रा की जिंदगी में एक-दूसरे के लिए दिखाते हैं। भले ही वह समय बीत गया हो, पर वह निस्वार्थ समर्पण आज भी यादों में एक अनमोल धरोहर की तरह सुरक्षित है।

​आज का सवाल (Question of the Day)

"क्या आज के दौर में भी हम अपनों के लिए वही 'अमृत' जैसी मिठास और निस्वार्थ समर्पण बचा कर रख पाए हैं, या आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने इन मासूम एहसासों को पीछे छोड़ दिया है?"

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