​राधिका की डायरी ​Part 355: The Shadow of the Unknown and the Shield of Faith

 


​राधिका की डायरी

Part 355: The Shadow of the Unknown and the Shield of Faith

​As Radhika worked in the depths of the forest, whispers of a terrifying new disease called 'Corona' began to drift through the air. The news spoke of an impending lockdown and a virus that was shaking the entire world. Despite these frightening warnings, Radhika remained undeterred. Following the official instructions, she completed her grueling tasks in the forest, ensuring the Kosa larvae were safe and the Sanjeevani was sprayed. Her life had become a clockwork of devotion: returning home in the evening, washing away the forest grime, having a quick cup of tea, and immersing herself in the Sundarkand path.

​Every Saturday, she would stealthily head to the Peepal tree at 4:30 AM for her secret ritual, and every Sunday, she would observe her rigorous Nirjala fast, her soul chanting the divine name. The rumors of the pandemic grew louder each day, but for Radhika, the safety of her children was the only priority. She felt that as long as she stayed true to her year-long penance, no virus or calamity could breach the spiritual shield she was building for her family.

भाग 355: अनजानी आहट और विश्वास का कवच

​जंगल के सन्नाटे में काम करते हुए राधिका के कानों में एक डरावनी बीमारी 'कोरोना' की चर्चाएँ पहुँचने लगी थीं। हवाओं में यह बात तैर रही थी कि कोई वायरस आने वाला है जो पूरी दुनिया को थाम देगा। इन डरावनी चेतावनियों के बावजूद, राधिका विचलित नहीं हुई। सरकारी निर्देशों का पालन करते हुए उसने जंगल का अपना सारा काम समय पर खत्म किया, यह सुनिश्चित करते हुए कि कोसा के कीड़ों को सही पोषण और सुरक्षा मिले। उसका जीवन अब साधना का एक अटूट चक्र बन गया था: शाम को घर लौटना, हाथ-मुँह धोना, एक प्याली चाय पीना और फिर सुंदरकांड के पाठ में डूब जाना।

​हर शनिवार को वह उसी तरह सुबह 4:30 बजे छुपते-छुपाते पीपल के पेड़ के पास अपनी गुप्त पूजा के लिए जाती और हर रविवार को उसका कठिन निर्जला व्रत और मंत्र जाप चलता रहता। दुनिया में महामारी का शोर बढ़ रहा था, लेकिन राधिका के लिए अपने बच्चों की सलामती ही सबसे बड़ा धर्म था। उसे यह अटूट विश्वास था कि जब तक वह अपनी एक साल की इस तपस्या पर अडिग है, दुनिया का कोई भी वायरस या आपदा उस आध्यात्मिक ढाल को नहीं तोड़ पाएगी जो वह अपने परिवार के लिए तैयार कर रही थी।

निष्कर्ष: जब बाहर की दुनिया एक अदृश्य दुश्मन से डर रही थी, तब राधिका अपने विश्वास के बल पर एक अदृश्य सुरक्षा कवच बुन रही थी। उसके लिए कोरोना से बड़ा उसका संकल्प था।

मजबूत सवाल: क्या आने वाला लॉकडाउन राधिका की इस गुप्त पूजा और साप्ताहिक व्रत में बाधा डालेगा? क्या वह बंदिशों के बीच भी पीपल के पेड़ तक पहुँचने का रास्ता निकाल पाएगी?

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