राधिका की डायरी ​Part 359: The Burden of an Imperfect Ritual

 


राधिका की डायरी

Part 359: The Burden of an Imperfect Ritual

​Radhika’s heart was heavy with the knowledge that the 108 earthen Shivalingas were missing from the ceremony. Unable to suppress her worry, she finally spoke to the priest about the omission. However, instead of understanding her concern, the priest grew defensive and angry. "I have performed the rituals my way," he snapped, "I will not perform this puja again!" His words felt like a blow to Radhika's soul.

​Had it been a regular prayer for herself, she might have let it go. But this was about her son’s life and his future—the very reason for her year-long penance. The fear of some impending misfortune (Anisht) began to haunt her. She kept thinking that if the foundation of this shield was flawed, would it be strong enough to withstand the 'pit' her enemies had dug? The priest’s anger only added to her distress, leaving her in a state of restless prayer, pleading with Mahadev to overlook the ritualistic error and see only a mother’s desperate heart.

भाग 359: अपूर्ण अनुष्ठान का बोझ

​राधिका के मन में वह 108 पार्थिव शिवलिंग वाली बात किसी फाँस की तरह चुभ रही थी। जब उससे रहा नहीं गया, तो उसने दबे स्वर में पंडित जी से उस विधि के बारे में पूछ ही लिया। लेकिन पंडित जी अपनी गलती मानने के बजाय उल्टा नाराज़ हो गए। वे झल्लाकर बोले, "मैंने अपने हिसाब से पूरी पूजा करा दी है, अब मैं दोबारा इसे नहीं कराऊँगा!" पंडित जी की यह बेरुखी राधिका के कलेजे को चीर गई।

​अगर यह उसकी अपनी सुख-सुविधा के लिए की गई कोई सामान्य पूजा होती, तो शायद वह इतनी गंभीर नहीं होती। लेकिन यहाँ बात उसके बच्चे के भविष्य और उसकी जिंदगी की थी—वही जिंदगी जिसके लिए वह एक साल की कठिन अग्निपरीक्षा से गुजर रही थी। उसके मन में यह डर बैठ गया कि कहीं इस चूक की वजह से कोई 'अनिष्ट' न हो जाए। वह रह-रहकर यही सोच रही थी कि जिस सुरक्षा कवच को बनाने के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, क्या वह इस कमी के कारण कमज़ोर पड़ जाएगा? पंडित जी की नाराजगी ने उसकी बेचैनी और बढ़ा दी, और वह महादेव के सामने हाथ जोड़कर बस यही विनती करने लगी कि वे विधि की त्रुटि नहीं, बल्कि एक माँ की तड़प देखें।

निष्कर्ष: राधिका के लिए वह केवल एक पूजा नहीं, बल्कि उसके बेटे की ढाल थी। पंडित की नाराजगी और विधि की कमी ने उसे एक ऐसे मानसिक द्वंद्व में डाल दिया जहाँ से केवल भगवान शिव का भरोसा ही उसे निकाल सकता था।

मजबूत सवाल: क्या राधिका की यह व्याकुलता उसे फिर से वही पूजा किसी और विधान से करने पर मजबूर करेगी? या महादेव उसे कोई ऐसा संकेत देंगे जिससे उसका यह भय दूर हो सके?

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