राधिका की डायरी बिखरे सपने और अनकही गूँज

 

राधिका की डायरी बिखरे सपने और अनकही गूँज

Scattered Dreams and Unspoken Echoes

The ink on the paper felt heavy, much like the weight in Kavya's heart as she sat by the window. She looked at the date—July 22, 2016—a day frozen in time. She began to write, not out of anger, but out of a quiet realization that some chapters end even before the book is finished.

"I have no complaints against you," she whispered to the empty room. "Life gave me so much, and even if you aren't here today, your memories remain my constant companions."

Kavya smiled through a thin veil of tears, remembering the laughter they shared. He was the one who taught her how to smile, yet ironically, he became the reason for her deepest sorrows. It was a beautiful paradox—the person who gave her the best moments of her life was also the one who left her with an ache that wouldn't subside.

She knew he wouldn't come back. The logic of the world told her that time only moves forward. Yet, a small, stubborn part of her heart wished for the clock to turn back. She wished the winds would blow in her favor once more, bringing back the days when her mornings began with the sound of his voice.

"My love hasn't faded," she wrote, her hand trembling slightly. "It was there then, it is here now, and it will stay forever. The only difference is... today, I have no one left to show it to."

हिंदी अनुवाद: बिखरे सपने और अनकही गूँज

खिड़की के पास बैठी काव्या के दिल के बोझ की तरह ही कागज पर स्याही भी भारी लग रही थी। उसने तारीख देखी—22 जुलाई, 2016—वक्त का एक ऐसा दिन जो ठहर गया था। उसने लिखना शुरू किया, गुस्से में नहीं, बल्कि इस एहसास के साथ कि कुछ अध्याय किताब पूरी होने से पहले ही खत्म हो जाते हैं।

"मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है," उसने खाली कमरे में बुदबुदाया। "वक्त ने मुझे बहुत कुछ दिया, और अगर आज तुम साथ नहीं हो, तो क्या हुआ, तुम्हारी यादें मेरी परछाई बनकर साथ हैं।"

काव्या अपनी आँखों में तैरते आँसुओं के बीच मुस्कुराई, उन यादों को याद करते हुए जो उन्होंने साथ बिताई थीं। वही था जिसने उसे मुस्कुराना सिखाया था, फिर भी विडंबना यह थी कि वही उसकी गहरी उदासी का कारण बना। यह एक खूबसूरत विरोधाभास था—जिस इंसान ने उसे जिंदगी के सबसे बेहतरीन पल दिए, उसी ने उसे एक ऐसा दर्द भी दिया जो कम नहीं होता था।

वह जानती थी कि वह वापस नहीं आएगा। दुनिया का तर्क कहता है कि समय हमेशा आगे बढ़ता है। फिर भी, उसके दिल का एक छोटा सा, जिद्दी हिस्सा चाहता था कि घड़ी की सुइयां पीछे घूम जाएं। वह चाहती थी कि हवाएं एक बार फिर उसके पक्ष में चलें, और वे दिन वापस ले आएं जब उसकी सुबह उसकी आवाज सुनकर शुरू होती थी।

"मेरा प्यार कम नहीं हुआ है," उसने लिखा, उसका हाथ थोड़ा कांप रहा था। "प्यार तब भी था, प्यार अब भी है और हमेशा रहेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि... आज इसे जताने के लिए कोई सामने नहीं है।"

निष्कर्ष (Conclusion)

यह कहानी एक निस्वार्थ प्रेम और उसके बाद की तन्हाई को दर्शाती है। यह हमें सिखाती है कि किसी के चले जाने के बाद भी उनसे जुड़ी यादें और उनके प्रति सम्मान खत्म नहीं होता। सच्चा प्यार सिर्फ पाने का नाम नहीं है, बल्कि उस इंसान की यादों को संजोकर गरिमा के साथ जीने का नाम है।

आज का सवाल (Question of the Day)

"क्या सच्चा प्यार समय की दूरियों और इंसान की अनुपस्थिति के बावजूद जीवित रह सकता है, या समय के साथ भावनाओं का बदलना अनिवार्य है?"

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