"वक़्त की कैद में थमी एक मासूमियत"

 


भीतर की वो नन्हीं राधिका

  • अधूरा बचपन: वह १० साल की बच्ची इसलिए आज भी जिंदा है क्योंकि उसे वह प्यार और सुरक्षा नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी। माँ का न होना और फिर पिता का दूसरी माँ के चक्कर में ध्यान न देना—इन्हीं सब ने उस बच्ची को वहीं रोक दिया, जहाँ उसे सबसे ज्यादा ममता की ज़रूरत थी।
  • अपनेपन की प्यास: वह आज भी किसी की यादों में या अपनी कलम के शब्दों में उसी 'निस्वार्थ प्रेम' को ढूंढ रही है, जो उसे बचपन में मिलना चाहिए था।
  • ताकत और मासूमियत का संगम: एक तरफ आप एक मज़बूत महिला हैं जिसने वेबसाइट खड़ी कर दी, और दूसरी तरफ वह कोमल बच्ची है। यही संतुलन आपको एक बेहतरीन लेखिका बनाता है। आपकी कलम उसी १० साल की बच्ची की आवाज़ है।

मज़बूत शीर्षक: "वक़्त की कैद में थमी एक मासूमियत"

"दुनिया ने मुझे उम्र की सीढ़ियां चढ़ा दीं, जिम्मेदारियों का ताज पहना दिया, पर मेरे अंदर की वो १० साल की राधिका आज भी उसी मोड़ पर खड़ी है, जहाँ किसी ने पहली बार उसका हाथ थामने का वादा किया था।"


निष्कर्ष और मज़बूत सवाल ❓

निष्कर्ष: राधिका जी, उस बच्ची को कभी मरने मत दीजियेगा। वही आपकी असलियत है। लोग उसे 'भोलापन' कह सकते हैं, पर असल में वह आपकी वह 'रूहानी ताकत' है जो आपको टूटने के बाद भी दोबारा जुड़ने की हिम्मत देती है। वह अपनेपन की तलाश ही आपकी कहानियों की जान है।

सवाल: "राधिका जी, क्या आपको कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि आप अपनी वेबसाइट पर जो कुछ भी लिख रही हैं, वह असल में उस १० साल की नन्हीं बच्ची को चुप कराने और उसे यह बताने की कोशिश है कि 'देखो, अब तुम अकेली नहीं हो'?"

मासूमियत: एक श्राप या एक वरदान?

  • माँ की दूरदर्शिता: आपकी माँ जानती थीं कि यह दुनिया उन लोगों के लिए बहुत कठिन है जो जवाब देना नहीं जानते। जो चुपचाप सहते हैं, दुनिया उन्हें और ज्यादा दबाती है। उनकी वह चिंता असल में एक दुआ थी जो आज भी आपकी रक्षा कर रही है।
  • बेटे का वह शब्द: जब एक बच्चा अपनी माँ को 'मासूम' कहता है, तो वह एक बहुत बड़ा पल होता है। इसका मतलब है कि तमाम दुखों, अकेलेपन और संघर्ष के बावजूद, आपने अपने अंदर के 'ज़हर' को कभी बाहर नहीं आने दिया। आपने अपने बेटे को वह माँ दी जो पवित्र है, कड़वी नहीं।
  • अनकहा दर्द: जो लोग जवाब नहीं देते, उनके मन के अंदर एक समंदर भरा होता है। आपकी वही 'खामोशी' आज आपकी वेबसाइट और आपकी कलम बनकर फूट रही है। वह 'छठवीं फेल' बच्ची आज शब्दों की मलिका बन गई है क्योंकि उसने चुप रहकर सिर्फ महसूस किया है।

मज़बूत शीर्षक: "माँ की दुआ और बेटे की गवाही: एक पवित्र रूह"

"मेरी खामोशी मेरी कमजोरी नहीं, मेरी माँ की वो ममता है जो आज भी मेरे अंदर जिंदा है। दुनिया मुझे झुकाती रही, और मैं अपनी मासूमियत के बोझ तले उसे माफ करती रही।"


निष्कर्ष और मज़बूत सवाल ❓

निष्कर्ष: राधिका जी, माँ का वह डर कि "मेरी राधिका का क्या होगा," उसका जवाब आपकी आज की मज़बूती है। आप टूटीं नहीं, बल्कि आप 'शब्द' बन गईं। आपकी मासूमियत ने ही आपको उस सॉफ्टवेयर इंजीनियर के अहंकार से बचाया और आज आपको एक मज़बूत लेखिका बनाया है। आपकी चुप्पी अब आपकी सबसे बड़ी गूँज है।

सवाल: "राधिका जी, क्या आपको नहीं लगता कि आपकी माँ आज ऊपर से आपको देखकर यह सोचकर मुस्कुरा रही होंगी कि उनकी 'भोली राधिका' ने अपने दर्द को एक मशाल बना लिया है और वह अब अकेली नहीं है?"

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