राधिका की डायरी ​Part 389: The Sacred Sanctuary of Six Years

 


राधिका की डायरी

Part 389: The Sacred Sanctuary of Six Years

​This room was not a new arrangement; it was Radhika’s long-held sanctuary. For six years, even while working 150 kilometers away, she had consistently paid its rent from her own hard-earned salary. Though it was located just 5 kilometers from her parental home, Radhika maintained a dignified distance from her parents and brothers. Her self-respect did not allow her to depend on them or deal with the family dynamics that had hurt her in the past. This room was her true 'home'—a space where she owed nothing to anyone.

​Because this room was centrally located, it was only 20 kilometers away for her son. It was the perfect place for a reunion. As she stood in that familiar space, surrounded by the memories of the last six years, she felt a sense of power. The rent she had paid all those years was finally serving its most beautiful purpose: bringing her son back into her arms in a safe, independent environment. Here, she wasn't someone's daughter-in-law or a neglected sister; she was simply a mother, waiting for her world to arrive.

भाग 389: छह वर्षों की संचित पूंजी और स्वाभिमान का घर

​यह कमरा राधिका के लिए कोई नया ठिकाना नहीं था, बल्कि पिछले 6 सालों से उसकी अपनी स्वतंत्र दुनिया थी। भले ही वह काम के सिलसिले में 150 किलोमीटर दूर रहती थी और वहां के कमरे का किराया उसके साहब देते थे, लेकिन उसने इस कमरे को कभी नहीं छोड़ा। वह अपनी तनख्वाह से हर महीने इसका किराया भरती रही क्योंकि इस जगह से उसका गहरा लगाव था। यह उसका अपना कोना था, जहाँ वह खुद की मालिक थी।

​दिलचस्प बात यह थी कि यह कमरा उसके मायके से महज 5 किलोमीटर दूर था, फिर भी उसका अपने मां-बाप या भाइयों से कोई वास्ता नहीं था। उसका स्वाभिमान उसे उनके सामने झुकने या उनकी कड़वाहट सहने की इजाजत नहीं देता था। इसलिए उसने मायके के करीब होते हुए भी अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। आज इसी दूरदर्शिता का फल उसे मिला—उसका बेटा महज 20 किलोमीटर का सफर तय करके यहाँ आ सकता था। 6 साल तक इस कमरे का किराया भरना आज सार्थक हो गया था, क्योंकि यह जगह अब माँ और बेटे के मिलन की गवाह बनने वाली थी, जहाँ न ससुराल का डर था और न मायके का हस्तक्षेप।

निष्कर्ष: राधिका ने सालों पहले जो बीज बोया था, आज उसकी छाँव में वह अपने बेटे का जन्मदिन मनाने वाली थी। उसका वह छोटा सा कमरा आज किसी महल से भी ज्यादा कीमती लग रहा था।

मजबूत सवाल: क्या राधिका का बेटा अपनी माँ के इस स्वाभिमानी ठिकाने की अहमियत समझ पाएगा? और क्या 6 साल बाद इस कमरे में फिर से वही रौनक लौटेगी जो राधिका के संघर्षों के बीच कहीं खो गई थी?

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