राधिका की डायरी Part 370: The Agony of a Mother and a Divine Realization
राधिका की डायरी
Part 370: The Agony of a Mother and a Divine Realization
The secret Saturday prayers and the Sunderkand during the journey were not just rituals; they were Radhika’s weapons to protect her son from hidden enemies and her daughter from death. After traveling 100 kilometers, when she entered the hospital, her heart shattered. Seeing her 13-year-old daughter lying frail on the hospital bed, her eyes welled up with tears she couldn't hold back. She learned that it was a severe case of ulcers; for eight days, the child hadn't eaten a morsel. She was surviving solely on glucose, as her body rejected everything else.
Her sister-in-law informed her that ₹40,000 had already been spent, and the doctors refused to discharge her as there was no improvement. In that moment of immense pain, a profound thought crossed Radhika’s mind. She realized that if she hadn't made the difficult decision to leave her daughter with her in-laws, she would never have been able to afford this treatment on her meager salary. Her husband was no longer in this world to support them. She whispered to herself, "God’s ways are mysterious." The aunt had no daughter of her own and had the means to provide care that Radhika, despite all her love, could not have managed alone.
भाग 370: ममता का विलाप और ईश्वरीय न्याय की समझ
शनिवार की वह गुप्त पूजा और बस के सफर में सुंदरकांड का पाठ राधिका के लिए केवल रस्म नहीं थी; यह उसके बेटे को दुश्मनों से बचाने और बेटी को मौत के मुँह से खींच लाने की पुकार थी। 100 किलोमीटर का सफर तय कर जब वह अस्पताल पहुँची, तो अपनी 13 साल की जान से प्यारी बेटी को बिस्तर पर बेजान पड़ा देख उसका कलेजा मुँह को आ गया। पता चला कि उसे गंभीर अल्सर हुआ है; 8 दिनों से उसने अन्न का एक दाना नहीं चखा था। वह सिर्फ ग्लूकोज के सहारे सांसें ले रही थी।
उसकी ननद ने बताया कि अब तक 40,000 रुपये खर्च हो चुके हैं और डॉक्टर अभी छुट्टी देने को तैयार नहीं थे क्योंकि हालत में सुधार नहीं था। उस दर्दनाक मंजर के बीच राधिका के मन में एक विचार आया—उसने महसूस किया कि अगर आज उसने अपनी बेटी को अपनी ननद के पास न छोड़ा होता, तो वह अपनी छोटी सी तनख्वाह से इतना बड़ा इलाज कभी नहीं करा पाती। उसका पति अब इस दुनिया में नहीं था जो उसका साथ देता। उसने मन ही मन सोचा, "भगवान जो करते हैं, अच्छे के लिए ही करते हैं।" ननद की अपनी कोई बेटी नहीं थी और राधिका आर्थिक रूप से इतनी सक्षम नहीं थी। आज उसकी बेटी जहाँ थी, कम से कम सुरक्षित हाथों में थी।
उस अस्पताल के कमरे का मंजर वाकई दिल चीर देने वाला रहा होगा। एक माँ के लिए इससे भारी पल कोई नहीं हो सकता जब उसकी संतान बेजान बिस्तर पर पड़ी हो और वह खुद को बेबस महसूस करे।
बेटी के उस मासूम चेहरे को देखकर राधिका का मन तो कर रहा होगा कि वह वहीं ठहर जाए, लेकिन उसके ऊपर जिम्मेदारियों का भी पहाड़ था।
निष्कर्ष: राधिका ने अपनी बेबसी में भी ईश्वर का आभार माना। वह जानती थी कि उसकी बेटी की जान बचाने के लिए उसकी ननद एक फरिश्ता बनकर आई थी, जिसे भगवान ने ही चुना था।
मजबूत सवाल: क्या राधिका की प्रार्थना और वह महंगा इलाज उसकी बेटी को नया जीवन दे पाएगा? क्या वह अल्सर की उस पीड़ा से बाहर निकल पाएगी जिसने उसे 8 दिनों से तड़पाया है?
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
"आपकी राय मेरे लिए अनमोल है, कृपया अपने विचार साझा करें।" यह लोगों को कमेंट करने के लिए प्रोत्साहित (Encourage) करता है।