राधिका की डायरी ​Part 418: The Heavy Chains of Debt and Devotion

 


राधिका की डायरी

Part 419: The Heavy Chains of Debt and Devotion

​As the lockdown stretched on, Radhika’s anxiety began to peak. The burden of debt was suffocating. She had two active loans amounting to ₹65,000, and the monthly installment (EMI) for her ₹26,000 smartphone was a heavy weight on her small savings. Added to this were the house rent, electricity bills, and the cost of daily rations. Nothing was easy.

​But the biggest challenge wasn't just survival; it was her spiritual commitment. Her one-year 'Tapasya' for her son’s well-being was at a crucial stage. She had to perform the 'Rudrabhishek,' which would cost between ₹5,000 to ₹10,000. On top of that, her promise of 12 monthly Satyanarayan Pujas followed by a grand 'Udyapan' (concluding ceremony) was pending. Radhika stood at a crossroads—should she pay her bills or fulfill her vows to God for her son’s sake? Her heart was heavy, but her faith was still fighting.

भाग 419: कर्ज का बोझ और भक्ति की अग्निपरीक्षा

​जैसे-जैसे लॉकडाउन खिंचता जा रहा था, राधिका की चिंता अब गहरे डर में बदलने लगी थी। उसके कंधों पर कर्ज का बोझ उसे चैन से सोने नहीं दे रहा था। दो-दो जगहों से लिया गया ₹65,000 का लोन, ऊपर से ₹26,000 के मोबाइल की भारी किस्त—ये सब उसकी छोटी सी बचत को निगल रहे थे। कमरे का किराया, बिजली का बिल और राशन का इंतजाम करना अब पहाड़ जैसा लगने लगा था। कुछ भी आसान नहीं था।

​लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तो उसके सामने वह 1 साल की तपस्या थी जो वह अपने बेटे के लिए कर रही थी। उसे रुद्राभिषेक करना था, जिसमें कम से कम 5 से 10 हजार रुपये का खर्च था। इसके अलावा, हर महीने होने वाली सत्यनारायण की कथा और 12 कथाओं के बाद होने वाला बड़ा 'उद्यापन' भी उसके सामने खड़ा था। राधिका एक ऐसे दोराहे पर थी जहाँ एक तरफ दुनिया की जरूरतें थीं और दूसरी तरफ भगवान को दिया गया वह वचन, जो उसने अपने बेटे की सलामती के लिए मांगा था। मन भारी था, पर राधिका को भरोसा था कि जो ईश्वर रास्ता कठिन करता है, वही हाथ थामकर पार भी लगाता है।

निष्कर्ष: जब इंसान के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, तब उसकी आस्था ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है।

आज का विशेष सवाल: साथियों, क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा वक्त आया है जब आर्थिक तंगी और आपके उसूलों या धर्म के बीच जंग छिड़ गई हो? ऐसी स्थिति में आपने किसे चुना—अपनी जरूरतों को या अपने अटूट विश्वास को? कमेंट में अपनी कहानी जरूर बताएं।

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