राधिका की डायरी ​Part 396: The Leap of Faith and the Power of Support

 


राधिका की डायरी

Part 396: The Leap of Faith and the Power of Support

​Radhika asked with genuine curiosity, "Sir, what exactly do I need to do? I don't have any knowledge about these products yet." The consultant smiled and gave her the most comforting answer: "You don't need to know everything on day one. Your job is to introduce us to the people. We will provide the information, and while watching us, you will learn. In the world of Direct Selling, you learn by doing." This assurance was all Radhika needed. When she realized she had a strong support system, her hesitation vanished.

​In a bold move, she decided to hold her first meeting at her workplace, 150 kilometers away from her current location. "If you are ready to support me, then I am ready too," she said firmly. "I want my first meeting to be at my rented room where I work. Why don't you come with me tomorrow with the products?" The consultant was impressed by her proactive approach and immediately agreed. As he left, Radhika felt a new kind of excitement. She was no longer just an employee fighting for files; she was now an entrepreneur on a mission to bring health and prosperity to her field.

भाग 396: विश्वास की छलांग और सहयोग की शक्ति

​राधिका ने बड़ी सादगी से पूछा, "सर, मुझे इसमें क्या करना होगा? मुझे तो अभी इन प्रोडक्ट्स की कोई जानकारी नहीं है।" सर ने मुस्कुराते हुए बहुत ही हौसला बढ़ाने वाली बात कही, "मैम, दुनिया के सारे काम सीखने के बाद ही होते हैं। फिलहाल आपको सिर्फ लोगों से मिलवाना है, जानकारी हम देंगे। हमें देखते-देखते आप खुद सीख जाएंगी। यह डायरेक्ट सेलिंग बिजनेस ही ऐसा है जहाँ काम करते-करते इंसान निपुण हो जाता है।" जब राधिका को लगा कि उसे अकेले नहीं लड़ना है, तो उसका डर खत्म हो गया।

​उसने तुरंत एक बड़ा फैसला लिया। उसने कहा, "ठीक है, अगर आप सपोर्ट करने को तैयार हैं, तो मैं भी तैयार हूँ। मैं अपनी पहली मीटिंग वहीं रखती हूँ जहाँ मैं काम करती हूँ, 150 किलोमीटर दूर। मैं तो कहती हूँ कि कल आप मेरे साथ ही चलिए, हम साथ में प्रोडक्ट्स लेकर चलेंगे।" सर राधिका की इस फुर्ती और हिम्मत को देखकर दंग रह गए और उन्होंने तुरंत हामी भर दी। उनके जाने के बाद राधिका ने एक लंबी सांस ली। अब वह सिर्फ एक कर्मचारी नहीं थी जो फाइलों के पीछे भाग रही थी, बल्कि एक ऐसी उद्यमी बन रही थी जो अपने कार्यक्षेत्र में सेहत और समृद्धि की नई लहर लाने वाली थी।

निष्कर्ष: राधिका ने 'सीखते-सीखते सीखने' के मंत्र को अपना लिया था। 150 किलोमीटर का वह सफर अब केवल नौकरी का सफर नहीं, बल्कि उसके अपने बिजनेस के उदय का सफर होने वाला था।

मजबूत सवाल: क्या राधिका के कार्यक्षेत्र के लोग और वे 25 किसान इस नई जानकारी को अपनाएंगे? और क्या सर के साथ यह पहली ट्रिप राधिका के लिए कामयाबी का नया रास्ता खोलेगी?

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भाग 4 = एक नया मोड़ टर्निंग प्वाइंट

भाग 3 = शुभ दीपावली जैसे दीपावली में दीपक की रोशनी से घर में उजाला हो जाता है वैसे ही मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सब के जीवन से दुख परेशानी चिंता उदासी हमेशा हमेशा के लिए चली जाए खुशी मुस्कुराहट सुख समृद्धि धन वैभव हमेशा हमेशा के लिए रोशनी बन कर आ जाए शुभ दीपावली

' भाग 1= पाँचवी पास ने क्यों शुरू किया आयुर्वेद का बिज़नेस? मेरी कहानी!'