राधिका की डायरी ​Part 401: The Heavy Chains of System and Family

 


राधिका की डायरी

Part 401: The Heavy Chains of System and Family

​Despite her unwavering persistence, the Janpad Panchayat office failed Radhika once again. No files were cleared today. The exhaustion of the 40-kilometer journey and the cold indifference of the bureaucrats were beginning to take a toll on her spirit. Disheartened, she returned to her room and sought refuge in her 'Sunderkand' path, letting the divine verses heal her frustration. But the real blow came during her nightly call to her son. His voice was heavy with pain as he confessed, "Mom, it feels like a prison here. The people in this house are suffocating me."

​Radhika’s heart ached for her child, but her mind remained sharp. She didn't let her emotions cloud her judgment. She gave him a clear and strategic instruction: "My son, come to me whenever you can't take it anymore. But remember, don't worry about clothes or belongings; leave them behind if you must. Just make sure you bring all your original documents with you." She knew that clothes could be bought again, but his identity and academic records were the keys to his freedom from that 'jail.' Even in her pain, Radhika was planning a permanent escape for her son.

भाग 401: व्यवस्था की बेड़ियाँ और ममता की पुकार

​इतनी भाग-दौड़ और उम्मीद के बावजूद, आज भी जनपद पंचायत से राधिका को खाली हाथ ही लौटना पड़ा। वे फाइलें टस से मस नहीं हुईं। 40 किलोमीटर के सफर की थकान और दफ्तर की बेरुखी ने उसे भीतर तक परेशान कर दिया था। भारी मन से वह अपने कमरे पर लौटी और शांति के लिए सुंदरकांड का पाठ करने लगी। लेकिन असली दर्द तो अभी बाकी था। जब उसने रात को अपने बेटे से बात की, तो बेटे का गला रुंध गया। उसने कहा, "मम्मी, यहाँ दम घुटता है। ये घर वाले मुझे बहुत परेशान कर रहे हैं, मुझे यहाँ जेल जैसा लगता है।"

​बेटे की तड़प सुनकर राधिका की ममता तड़प उठी, लेकिन उसने खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उसने बड़ी समझदारी से बेटे को रास्ता दिखाया, "बेटा, जब तुम्हारा मन करे, तुम यहाँ आ जाना। लेकिन एक बात याद रखना, वहाँ से निकलते वक्त कपड़ों की फिक्र मत करना, उन्हें वहीं छोड़ देना। बस अपने सारे असली 'डॉक्यूमेंट्स' (दस्तावेज) साथ लेकर निकलना।" राधिका जानती थी कि कपड़े तो दोबारा खरीदे जा सकते हैं, लेकिन उसकी पहचान और पढ़ाई के कागज ही उसे उस नरक से हमेशा के लिए आजाद दिलाएंगे। राधिका अब केवल अपनी लड़ाई नहीं, बल्कि अपने बेटे की रिहाई की योजना भी बना रही थी।

निष्कर्ष: राधिका ने समझ लिया था कि अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है। एक तरफ फाइलों की जंग थी और दूसरी तरफ अपने बेटे को उस 'जेल' से आजाद कराने की चुनौती।

मजबूत सवाल: क्या राधिका का बेटा हिम्मत जुटाकर उन दस्तावेजों के साथ माँ के पास पहुँच पाएगा? और क्या जनपद पंचायत की वे फाइलें कभी पास होंगी या राधिका को कोई और कड़ा कदम उठाना पड़ेगा?

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