राधिका की डायरी ​Part 357: The First Echo of Divine Justice

 


राधिका की डायरी

Part 357: The First Echo of Divine Justice

​The first month of Radhika’s rigorous penance—her Satyanarayan fasts, the Saturday secret rituals, and the Sunday Nirjala—was now complete. Two days after the Purnima puja, her phone rang. It was her son. His voice carried news that shook Radhika to her core. "Mom," he said, "Aunt’s daughter (Bua’s daughter) just had a major operation. It cost them nearly 70,000 rupees."

​As she hung up, Radhika felt a strange, cold shiver. Her soul whispered, "My prayers have been heard." She immediately called Pandit Ji and narrated the news. Pandit Ji’s voice was calm but firm. "Yes, my child," he replied, "Your intuition is correct. The calamity that was destined for your son has been diverted. The universe has balanced the scales. The heavy financial blow and the suffering intended for your child have now found their way to those who had dug a pit for him." Radhika realized that her one month of suffering and devotion had acted as a shield, returning the negative energy back to its source.

भाग 357: ईश्वरीय न्याय की पहली गूँज

​राधिका की कठिन तपस्या—सत्यनारायण का व्रत, शनिवार की गुप्त पूजा और रविवार का निर्जला उपवास—का पहला महीना आज पूरा हो गया था। पूर्णिमा की पूजा के ठीक दो दिन बाद उसके फोन की घंटी बजी। उसके बेटे का फोन था। बेटे ने जो खबर सुनाई, उसने राधिका को भीतर तक झकझोर दिया। उसने बताया, "मम्मी, उनका अचानक बड़ा ऑपरेशन हुआ है और उनके 70,000 रुपये लग गए हैं।"

​फोन रखते ही राधिका की रूह कांप गई। उसके मन ने गवाही दी—"मेरी पूजा सफल हो गई।" उसने तुरंत पंडित जी को फोन लगाया और यह बात बताई। पंडित जी ने शांत स्वर में कहा, "हाँ बेटा, तुम्हारा अनुमान बिल्कुल सही है। यह तुम्हारी साधना का ही प्रभाव है। जो संकट और जो भारी खर्च तुम्हारे बेटे की जान पर आने वाला था, वह अब उन पर चला गया है जिन्होंने तुम्हारे बेटे के लिए गड्ढा खोदा था। कुदरत ने अपना इंसाफ कर दिया है।" राधिका को समझ आ गया कि उसके एक महीने के कष्टों ने उसके बेटे के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा कवच बना दिया था, जिसने दुश्मन की बुरी नज़र को पलटकर उन्हीं की ओर मोड़ दिया था।

निष्कर्ष: जब एक माँ अपनी संतान के लिए कवच बनती है, तो दुनिया की कोई भी बुरी शक्ति उसे भेद नहीं सकती। राधिका की एक महीने की साधना ने साबित कर दिया कि "जाको राखे साइयाँ, मार सके ना कोय।"

मजबूत सवाल: क्या यह घटना राधिका के विश्वास को इतना मजबूत कर देगी कि वह आने वाले 11 महीनों की और भी कठिन अग्निपरीक्षा को हंसते-हंसते पार कर लेगी?

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