राधिका की डायरी Part 344: Precision and Protection in the Wild

 

राधिका की डायरी

Part 344: Precision and Protection in the Wild

Even with the physical strain of her Nirjala Upvas, Radhika’s mind remained sharp and focused on the task at hand. She organized the laborers with military precision, deploying two men under each tree to ensure thorough cleaning and prevent any negligence. Time was of the essence, as the 'Kosa' (silk cocoon) eggs were expected to arrive within the next two to three days. Unlike the previous batch raised indoors, this time the cultivation was happening in the open forest, making the silkworms vulnerable to predators like crows and other birds.

To counter this threat, Radhika devised an ingenious yet simple alarm system. She purchased empty tin oil canisters from the local village grocery store. Near each tree, she hung a piece of the tin, connected to a heavy wooden stick. A long rope was tied to this setup, reaching all the way down to the ground. The plan was simple: the moment a bird approached to feast on the silkworms, the workers would pull the rope, causing the wooden stick to strike the tin canister. The resulting loud, bell-like clang would be enough to startle and drive the birds away, ensuring the safety of her precious crop.

भाग 344: जंगल में सुरक्षा और सटीक प्रबंधन

निर्जला उपवास की शारीरिक थकान के बावजूद, राधिका का दिमाग अपने काम को लेकर पूरी तरह चौकन्ना था। उसने किसी भी प्रकार की लापरवाही को रोकने के लिए मज़दूरों को बड़ी कुशलता से व्यवस्थित किया; हर पेड़ के नीचे दो-दो आदमी तैनात कर दिए ताकि सफाई का काम पूरी पारदर्शिता से दिखाई दे। समय कम था, क्योंकि अगले दो-तीन दिनों के भीतर 'कोसा' के अंडे आने वाले थे। पिछली बार की तरह इस बार कोसा घर के भीतर नहीं, बल्कि खुले जंगल में पालना था, जहाँ कौवों और अन्य पक्षियों से कीड़ों को बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी।

पक्षियों से बचाव के लिए राधिका ने एक बहुत ही सरल लेकिन असरदार तकनीक अपनाई। उसने गाँव की किराने की दुकान से तेल के खाली टिन के डिब्बे खरीदे। हर झाड़ के पास उसने टिन का एक टुकड़ा लटका दिया और उसके पास एक मोटी लकड़ी बाँध दी। इस पूरी व्यवस्था से एक लंबी रस्सी बाँधी गई जो ज़मीन तक लटक रही थी। योजना यह थी कि जैसे ही कोई पक्षी कीड़ों को खाने के लिए नज़दीक आए, मज़दूर ज़मीन से ही उस रस्सी को खींचेंगे। रस्सी खिंचते ही लकड़ी टिन से टकराएगी और घंटे जैसी तेज़ आवाज़ होगी, जिससे डरकर पक्षी तुरंत उड़ जाएंगे। राधिका की इस जुगाड़ ने जंगल में सुरक्षा का एक मज़बूत घेरा तैयार कर दिया था।

निष्कर्ष: राधिका ने यह साबित कर दिया कि प्रबंधन केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि हाजिरजवाबी और सीमित संसाधनों का सही उपयोग है। अपनी भक्ति के साथ-साथ वह अपनी कर्मभूमि के प्रति भी पूरी तरह समर्पित थी।

मजबूत सवाल: क्या राधिका की यह 'टिन और रस्सी' वाली तकनीक सैकड़ों पेड़ों पर फैले कोसा के कीड़ों को चालाक पक्षियों से बचा पाएगी, या जंगल की चुनौतियाँ उसकी उम्मीदों से कहीं ज़्यादा बड़ी साबित होंगी?

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भाग 4 = एक नया मोड़ टर्निंग प्वाइंट

भाग 3 = शुभ दीपावली जैसे दीपावली में दीपक की रोशनी से घर में उजाला हो जाता है वैसे ही मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सब के जीवन से दुख परेशानी चिंता उदासी हमेशा हमेशा के लिए चली जाए खुशी मुस्कुराहट सुख समृद्धि धन वैभव हमेशा हमेशा के लिए रोशनी बन कर आ जाए शुभ दीपावली

' भाग 1= पाँचवी पास ने क्यों शुरू किया आयुर्वेद का बिज़नेस? मेरी कहानी!'