राधिका की डायरी Part 345: The Triumph of the Weary Soul

 

राधिका की डायरी

Part 345: The Triumph of the Weary Soul

By the time the sun dipped below the horizon, Radhika’s body was screaming for rest. The day’s hard labor in the forest, coupled with the grueling Nirjala fast, had drained her physical strength. Yet, her spirit remained unyielding. Throughout her journey back home, her lips never stopped moving, silently vibrating with the sacred mantra. Upon reaching her small room, she didn't collapse onto her bed. Instead, she washed her face, spread a simple mat on the floor, and sat down to begin the Sundarkand path.

Reciting the Sundarkand is a spiritual marathon that usually takes nearly two hours, a task daunting even for someone well-rested. But for Radhika, who hadn't even had a drop of water all day, it was a test of pure willpower. She did not falter; she did not surrender to the exhaustion. For two straight hours, her voice rose in devotion. Only after completing the prayers did she prepare a small portion of Sabudana Khichdi to break her fast. As she finally lay down to sleep, her body found rest, but her consciousness remained awake, the rhythm of "Om Namo Bhagavate Vasudevaya" echoing in her heart even in her dreams.

भाग 345: थकी हुई आत्मा की विजय

सूरज ढलने तक राधिका का शरीर थकान से चूर हो चुका था। जंगल की कड़ी मेहनत और ऊपर से निर्जला उपवास ने उसकी शारीरिक शक्ति पूरी तरह सोख ली थी। फिर भी, उसका आत्मबल अडिग था। घर वापस आते समय भी उसके होंठ कभी नहीं रुके, वे निरंतर पवित्र मंत्र के जाप से थरथराते रहे। अपने छोटे से कमरे में पहुँचकर वह बिस्तर पर नहीं गिरी। इसके बजाय, उसने मुँह-हाथ धोया, ज़मीन पर एक साधारण चटाई बिछाई और सुंदरकांड का पाठ करने बैठ गई।

सुंदरकांड का पाठ करना एक आध्यात्मिक मैराथन की तरह है जिसमें लगभग दो घंटे लगते हैं, जो एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता है। लेकिन राधिका के लिए, जिसने पूरे दिन पानी की एक बूंद तक नहीं पी थी, यह उसकी शुद्ध इच्छाशक्ति की परीक्षा थी। वह डगमगाई नहीं; उसने थकान के आगे घुटने नहीं टेके। पूरे दो घंटे तक उसकी आवाज़ भक्ति में लीन रही। पाठ पूरा करने के बाद ही उसने व्रत खोलने के लिए थोड़ी सी साबूदाने की खिचड़ी बनाई। जब वह आखिरकार सोने के लिए लेटी, तो उसका शरीर तो शांत हो गया, लेकिन उसकी चेतना जागृत रही—सोते समय भी उसके मन में "ओम नमो भगवते वासुदेवाय" की गूँज चलती रही।

निष्कर्ष: भक्ति जब चरम पर होती है, तो वह शरीर की सीमाओं को लांघ जाती है। राधिका ने यह साबित कर दिया कि एक माँ के लिए अपने बच्चे की सुरक्षा का संकल्प उसकी भूख, प्यास और थकान से कहीं अधिक शक्तिशाली है।

मजबूत सवाल: क्या राधिका की यह अटूट मानसिक शक्ति उसके शरीर को एक साल तक सहारा दे पाएगी, या आने वाले 'शनिवार की गुप्त पूजा' उसके संयम की और भी कठिन परीक्षा

 लेगी?

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