राधिका की डायरी Part 369: The Journey of Faith and Distant Hope
राधिका की डायरी
Part 369: The Journey of Faith and Distant Hope
The exhausting day had finally come to an end. Instead of returning to the forest quarters, Radhika headed straight to her rented room, which was about 2 kilometers away. By the time she reached, it was already 10:00 PM. Her daughter was 100 kilometers away, and traveling such a distance in the middle of the night was impossible. She spent the night in restless anticipation, and the next morning, Saturday, she didn't forget her spiritual duties. She performed her 'Gupt Puja' (secret ritual) with unwavering focus.
After having a quick meal, she prepared to leave for the hospital. She was practical even in her distress; she tucked her Sunderkand book into her bag. She thought, "I have a 100-kilometer journey ahead. I don't know if I'll find a place to sit or the time to pray once I reach the hospital." To save time and keep her mind centered, she decided to recite the Sunderkand while traveling on the bus. Every verse she read was a silent plea for her daughter's life, turning the dusty road into a path of pilgrimage and prayer.
भाग 369: आस्था का सफर और दूरगामी उम्मीद
थका देने वाला दिन आखिरकार खत्म हुआ। राधिका जंगल के डेरे पर वापस जाने के बजाय सीधे अपने कमरे की ओर चल दी, जो वहाँ से 150 किलोमीटर दूर था। घर पहुँचते-पहुँचते रात के 10 बज चुके थे। उसकी बेटी वहाँ से 100 किलोमीटर दूर थी, और इतनी रात गए सफर करना मुमकिन नहीं था। पूरी रात बेचैनी में गुजरी, लेकिन अगले दिन शनिवार को उसने अपनी आस्था को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया। उसने अपनी 'गुप्त पूजा' पूरी निष्ठा से संपन्न की।
खाना खाने के बाद वह अस्पताल के लिए निकली। अपनी परेशानियों के बीच भी उसकी सूझबूझ कायम थी; उसने अपने बैग में सुंदरकांड की पुस्तक रख ली। उसने सोचा, "100 किलोमीटर का सफर है, पता नहीं अस्पताल पहुँचने के बाद वहाँ बैठने की कैसी व्यवस्था होगी या पाठ करने का मौका मिलेगा भी या नहीं।" समय बचाने और मन को शांत रखने के लिए उसने बस के सफर में ही सुंदरकांड करने का फैसला किया। वह जानती थी कि हनुमान जी की ये चौपाइयां ही उसकी बेटी तक पहुँचने से पहले उसका रास्ता साफ करेंगी और उसे हिम्मत देंगी।
निष्कर्ष: राधिका ने अपने समय का बेहतरीन प्रबंधन किया। वह एक माँ के रूप में अपनी बेटी की ओर दौड़ रही थी, तो एक भक्त के रूप में अपनी साधना को भी साथ लेकर चल रही थी।
मजबूत सवाल: क्या 100 किलोमीटर का यह सफर और सुंदरकांड का पाठ राधिका की बेटी की सेहत में कोई बड़ा बदलाव लाएगा? अस्पताल पहुँचने पर राधिका का सामना किस स्थिति से होगा?
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