Shant Man ki an Kahi Paheli
उस सुनहरे गार्डन की शांत फिजाओं में जब भावनाओं का ज्वार उठता है, तो कुछ दर्द आँखों की देहलीज़ लांघकर आंसुओं का रूप धर लेते हैं। वे आँसू जब उस गार्डन की सुनहरी मिट्टी पर गिरते हैं, तो वहाँ की धरती उन्हें किसी अनमोल मोती की तरह अपने भीतर समेट लेती है। वहीं दूसरी ओर, कुछ खुशियाँ ऐसी उमंग बनकर आती हैं कि मन का मयूर झूम-झूम कर नाच उठने को बेताब हो जाता है। यह एक ऐसा विरोधाभास है जहाँ एक ही पल में इंसान सिसक भी सकता है और अगले ही पल परमानंद में थिरक भी सकता है। अकेलापन यहाँ दो चेहरों के साथ खड़ा मिलता है। कभी यह उस खौफनाक सन्नाटे जैसा होता है जो हजारों की भीड़ में भी इंसान को घेर लेता है, जहाँ शोर तो बहुत है पर कोई सुनने वाला नहीं। लेकिन इसी गार्डन के एकांत में, वही अकेलापन एक वरदान बन जाता है। यहाँ अकेला होना अधूरा होना नहीं, बल्कि स्वयं में संपूर्ण होना है। जब इंसान दुनिया के मुखौटों को उतारकर इस सुनहरी शांति में खुद से मिलता है, तो उसे उस सुकून का अहसास होता है जिसे वह ताउम्र बाहर ढूँढता रहा। यहाँ खुद से मिलना ही सबसे बड़ी उत्सव बन जाता है। जीवन की उन यादों को, जो कभी टीस देती हैं और कभ...