राधिका की डायरी हादसे के बाद: टूटती साँसें, अपनों की आवाज़ और वो खौफनाक मंजर
राधिका की डायरी हादसे के बाद: टूटती साँसें, अपनों की आवाज़ और वो खौफनाक मंजर उस खौफनाक हादसे के बाद, मैं पूरी तरह से अंदर तक डर चुकी थी। मेरी छाती में धड़कनें इतनी तेज चल रही थीं, मानो कोई अंदर हथौड़ा चला रहा हो। डर का वह कंपन मेरी रग-रग में, शरीर के हर एक हिस्से में साफ़ महसूस हो रहा था; मेरी धमनियों में जैसे खून का नहीं, बल्कि एक भयानक तूफान दौड़ रहा था। सड़क पर देखते ही देखते लोगों की एक भारी भीड़ इकट्ठा हो गई। बिना पूरी बात जाने, लोग उस लड़के (पंडित जी के बेटे) को भला-बुरा कहने लगे और उस पर गुस्सा उतारने लगे। लेकिन मेरी स्थिति ऐसी थी कि मैं न तो पूरी तरह बेहोश हो पा रही थी और न ही पूरे होश में थी। मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। ऐसा लग रहा था मानो मैं अभी भी मौत के उस अंधेरे मुँह में ही बैठी हूँ। वहाँ खड़ी कुछ सहृदय महिलाओं ने आगे बढ़कर मुझे सहारा दिया और पकड़कर उठाया। कुछ पुरुषों ने नीचे गिरी मोटरसाइकिल और मेरे बैग्स को संभाला। लोग मुझे तसल्ली दे रहे थे, तभी भीड़ में से एक लड़का दौड़कर गया और मेरे लिए पानी लेकर आया। पानी के दो घूँट गले से नीच...