राधिका की डायरी ​Part 384: The Cold Corridors of Janpad Panchayat

 


राधिका की डायरी

Part 384: The Cold Corridors of Janpad Panchayat

​After getting the final signatures from her seniors at the Headquarters, where she was respected for her hard work, Radhika moved towards the real battlefield: the Janpad Panchayat Office. While her own department stood by her, the Janpad Office was a different world altogether. Here, she was just another employee among hundreds, and her 25 files were just a pile of paper for the clerks. She had to get these files verified and cleared by the CEO, a process known for its sluggishness and bureaucratic delays.

​Day after day, Radhika stood outside the CEO’s cabin. Sometimes the officer was in a meeting, and other times he was "on tour." The clerks would point to a mountain of files and say, "Your turn will come." Radhika watched as people tried to use influence or money to move their papers, but she stood firm with her honesty. She would wait for hours, her legs aching, but her mind fixed on the 25 farmers who were waiting for a miracle. She knew that every trip to the Janpad was a test of her patience, and she was determined not to let those files gather dust.

भाग 384: जनपद पंचायत की सर्द गलियाँ और अंतहीन इंतज़ार

​अपने हेडक्वार्टर में अपने साहब से उन फाइलों पर हस्ताक्षर करवाने के बाद, जहाँ उसकी मेहनत की कद्र थी, राधिका असली युद्धभूमि की ओर बढ़ी: जनपद पंचायत कार्यालय। उसका अपना विभाग तो उसके साथ था, लेकिन जनपद दफ्तर एक अलग ही दुनिया थी। यहाँ वह सैकड़ों कर्मचारियों के बीच महज़ एक और नाम थी, और उसकी 25 फाइलें वहां के बाबुओं के लिए सिर्फ कागजों का ढेर थीं। उसे इन फाइलों को सीईओ (CEO) से पास करवाना था, एक ऐसी प्रक्रिया जो अपनी सुस्ती और देरी के लिए बदनाम थी।

​दिन दर दिन, राधिका सीईओ के केबिन के बाहर खड़ी रहती। कभी साहब मीटिंग में होते, तो कभी "दौरे पर।" बाबू फाइलों के पहाड़ की ओर इशारा करते हुए कहते, "आपका नंबर आएगा, इंतज़ार कीजिए।" राधिका देखती कि कैसे लोग रसूख या पैसों के दम पर अपनी फाइलें आगे बढ़वा रहे थे, लेकिन वह अपनी ईमानदारी पर अडिग रही। वह घंटों खड़ी रहती, उसके पैर दुखने लगते, लेकिन उसका ध्यान उन 25 किसानों पर था जो किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठे थे। वह जानती थी कि जनपद के ये चक्कर उसके धैर्य की परीक्षा हैं, और वह उन फाइलों को धूल नहीं फांकने देगी।

निष्कर्ष: राधिका ने समझ लिया था कि किसानों के हक के लिए सिर्फ फील्ड पर पसीना बहाना काफी नहीं है, बल्कि दफ्तरों की इस सुस्त व्यवस्था से लड़ना भी उतना ही जरूरी है।

मजबूत सवाल: क्या राधिका की खामोश तपस्या उस अहंकारी दफ्तर के बाबुओं का दिल पिघला पाएगी? क्या सीईओ साहब इन 25 गरीब किसानों की फाइलों पर बिना किसी रुकावट के अपनी मुहर लगा देंगे?

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