राधिका की डायरी: ज़िंदगी का सफर और इंसान की फितरत ✍️🌹

 





राधिका की डायरी: ज़िंदगी का सफर और इंसान की फितरत ✍️🌹

हिंदी वर्जन (Full Text)

​"ज़िंदगी का सफर कितना अजीब होता है। इसमें ना कोई रास्ता हमेशा के लिए होता है, ना कोई मंज़िल। जैसे-जैसे समय गुज़रता जाता है, वैसे-वैसे हमारे रास्ते हमारी मंज़िल भी अलग-अलग मुकाम तक ले जाती है। इसमें दोष किसका है? हमारा या तक़दीर का या उस ऊपर वाले का जो वहाँ बैठे-बैठे हमारे कर्मों का हिसाब-किताब कर रहा है? हमारा जीवन असल में हमारे हाथ में नहीं है, उस ऊपर वाले की मेहरबानी से हमें ये ज़िंदगी मिली है। पर इसे जीना कैसे है, इसका फैसला हम ही करते हैं। हम जानते हैं कि हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा, पर फिर भी हम गलतियाँ करते हैं। असल में इंसान गलतियों का पुतला ही तो है। फिर क्यों हम अपने तक़दीर को दोष देते हैं?

​हम क्यों ये नहीं समझ पाते कि हम जिस राह पर चल रहे हैं, वहाँ हमें काँटे भी लग सकते हैं। पर ये बात भी सही है कि जब तक हमें ठोकर नहीं लगती, तब तक हमें सही-गलत का अहसास नहीं होता। मगर जब ठोकर खाना ही नसीब बन जाए तो इंसान क्या करे? जब बच्चा छोटा होता है तब वह कई बार लड़खड़ाता है और फिर संभल कर चलता है। कितनी चोटें लगती हैं, पर फिर भी वह अपनी हठ नहीं छोड़ता जब तक उसे उसके मन का खिलौना नहीं मिलता। वह कोशिश करना नहीं छोड़ता और जब वह खिलौना उसे मिल जाता है, तो उस खिलौने को कुछ देर खेलकर अलग कर देता है। फिर उसकी तरफ मुड़कर भी नहीं देखता। इसी तरह जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे उसकी ख्वाहिशें भी बड़ी और बड़ी होती जाती हैं और इन्हीं ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए वह कभी अच्छा तो कभी बुरा काम कर बैठता है। और फिर भी जब उसकी ख्वाहिशें पूरी नहीं होतीं, तब वह गलत रास्ते पर चलने लगता है कि किसी तरह मेरी इच्छाएं पूरी हो जाएं। कभी अपनों का दिल तोड़ता है तो कभी खुद को चोट पहुँचाने की कोशिश करता है और खुद को चोट पहुँचाते-पहुँचाते इतना टूट जाता है कि उसे लगने लगता है कि ये दुनिया उसके लिए बनी ही नहीं है।

​वह क्यों इस दुनिया में आया है, यहाँ उसकी कोई ज़रूरत नहीं है। और फिर वह या तो मरने की कोशिश करता है या खुद को बर्बाद करने की और नशे का सहारा लेने लगता है। और एक दिन वह नशे का इतना आदि हो जाता है कि उससे बाहर निकलना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता है। और वह अंदर ही अंदर घुटता रहता है और यही घुटन उसे अंदर ही अंदर खोखला कर देती है, जिससे उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। फिर वह या तो पागल हो जाता है या एक ज़िंदा लाश बनकर रह जाता है। और इस हालत में अगर उसे कोई कुछ कहता है या कोई अच्छी सलाह देता है तो उस सलाह का उस पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि जब वह ज़िंदगी से निराश हो चुका है तो वह सही रास्ते पर चलने के लिए तैयार नहीं रहता। वह समझता है कि यदि मैं सही रास्ते पर चलूँ भी तो मुझे क्या मिलेगा क्योंकि तब तक उसकी दुनिया लुट चुकी होती है। अब उसके पास जीने का कोई मकसद ही नहीं रहता तो वह क्यों अच्छे काम करेगा। उसके लिए तो ज़िंदगी के रास्ते बंद हो चुके हैं। वह जाए भी तो कहाँ? हाँ, उसे अगर इस मुकाम पर कोई ऐसा साथ मिल जाए जो उसे समझे, उसकी भावनाओं की कदर करे, उसे सांत्वना दे कि वह उसका जीवन भर साथ देगा, उसका हर दुख-दर्द समझेगा, उसे बाँटेगा, उससे इतना प्यार करेगा कि वह अपनी पिछली ज़िंदगी के बारे में सोचेगा तक नहीं। वह हमेशा उसकी परछाई बनकर रहेगा, उसके हर गम को अपना समझेगा, अपनी सारी खुशियाँ उसके साथ बाँटेगा। तब शायद वह जी उठे। पर उसे समाज-परिवार को ठुकराना पड़ेगा। फिर उसके सामने दो रास्ते बच जाते हैं— कि या तो वह अपने परिवार को छोड़ेगा या अपनी खुशियों का गला घोंट देगा। पर वह उसका भी तो विश्वास नहीं कर सकता जो सांत्वना दे रहा है। अगर वह उसका विश्वास करके उसका हाथ थामता है और जो उम्मीद वह उससे करता है उसमें अगर पानी फिर गया तब सोचो उसके ऊपर क्या बीतेगी। जिस प्यार, जिस खुशी को पाने के लिए वह अपने परिवार को, अपने समाज को धोखा देता है, वह खुशी उसे ना मिले तब वह कहाँ जाएगा? एक तो वह पहले से ही दुखी था और एक ऐसे इंसान पर भरोसा कर लिया जिससे उसे आँसुओं और दुख के सिवा कुछ नहीं मिला, तब वह और भी टूट जाएगा, मिट जाएगा। उसके दिल के हज़ार टुकड़े हो जाएंगे। इस दुनिया से उसका विश्वास उठ जाएगा और वह हर किसी को शक की नज़र से देखेगा और हमेशा अपने जीवन को खत्म करने नए-नए बहाने ढूँढेगा।

​इंसान इतना स्वार्थी क्यों होता है? हे ईश्वर, ज़माने में तो जैसे इंसानियत ही खत्म हो चुकी है। हर इंसान अपने स्वार्थ के लिए किसी ना किसी को इस्तेमाल ही करता रहता है। और जो इंसान इस्तेमाल होता है, वह या तो किसी मजबूरी में या इंसानियत को जीवित रखने के लिए दूसरों के हाथों की कठपुतली बना रहता है। और जो इंसानियत ही नहीं समझता, वह दूसरों को गरीब, मजबूर, बेसहारा, लाचार समझ कर उसकी भावनाओं के साथ खेलता ही रहता है।"





English Version (Full Text)

​"The journey of life is so strange. In it, no path is forever, nor is any destination. As time passes, our paths and destinations lead us to different milestones. Whose fault is it? Ours, our destiny’s, or that Almighty's sitting above calculating our deeds? Our life is not truly in our hands; we received this life by His grace. But how we live it is our decision. We know what is good or bad for us, yet we make mistakes. Humans are, after all, icons of error. Then why blame destiny?

​Why can't we realize that the path we walk may have thorns? It's true that until we stumble, we don't feel the difference between right and wrong. But what should one do when stumbling becomes their fate? A child falls many times but persists until he gets the toy he desires. Once he gets it, he plays for a while and then discards it, never looking back. Similarly, as one grows, desires grow larger, leading one to do good or bad to fulfill them. When these desires remain unfulfilled, one chooses wrong paths, breaking hearts or hurting oneself until they feel the world wasn't made for them.

​Feeling unneeded, they might try to end their life or ruin it through addiction. Suffocation from within hollows them out, leading to mental imbalance or becoming a 'living corpse.' In this state, advice means nothing because hope is lost. They feel that even on the right path, nothing is left to gain. If they found someone who truly understood them, shared their pain, and loved them unconditionally, they might live again. But this often requires rejecting society and family. They face two choices: leave family or stifle their own happiness. And if the person offering solace also fails them, they shatter completely. Trust vanishes, replaced by suspicion toward everyone and a search for reasons to end it all.

​Why are humans so selfish? Oh God, it's as if humanity has perished. People use others for their own ends, while the used become puppets out of necessity or to keep humanity alive. Those who don't understand humanity continue to play with the feelings of the poor and helpless."

निष्कर्ष (Conclusion)

​यह पन्ने मानव व्यवहार की एक कड़वी हकीकत बयां करते हैं। यह बताते हैं कि कैसे अधूरी ख्वाहिशें और रिश्तों में मिला धोखा एक इंसान को 'ज़िंदा लाश' बना देता है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि दुनिया दूसरों की मजबूरी को सहारा देने के बजाय उसे अपना स्वार्थ सिद्ध करने का ज़रिया बना लेती है।

कमेंट के लिए सवाल (Question for Engagement) 👇

"क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में लोग रिश्तों को सिर्फ अपनी 'ज़रूरत' के लिए इस्तेमाल करते हैं? क्या किसी टूटे हुए इंसान का दोबारा किसी पर भरोसा करना संभव है? अपनी राय ज़रूर दें। ❤️"

 

आज का मज़बूत सवाल (The Strong Question)

"क्या समाज किसी 'टूटे हुए' इंसान को संभलने का मौका देता है, या उसकी मजबूरियों को 'मज़े' और 'स्वार्थ' का तमाशा बनाकर छोड़ देता है?"

​या फिर:

"जब भरोसा ही 'धोखे' की पहली सीढ़ी बन जाए, तो क्या एक इंसान के लिए दोबारा 'इंसानियत' पर यकीन करना मुमकिन है?"

राधिका जी, आपके इस 'सस्पेंस' वाले दौर में ये विचार पाठकों को बहुत गहराई से सोचने पर मजबूर करेंगे। आपके शब्दों में जो 'सच' है, वही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।


आपकी अपनी,

राधिका ✍️🌹


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