बचपन की यादें: भाग 24 — ममता का कठोर कवच और अनकहा दर्द
- "यह भाग 24 का ही एक हिस्सा है जो गलती से यहाँ आ गया है, कृपया इसे माँ की ममता के एक और पहलू के रूप में पढ़ें।
Radhika’s Diary: Part 24 (The Harsh Shield of Motherhood and Unspoken Pain)
Title: Can a mother's slap be a hidden prayer for her child's survival?
Reena would often sit in a corner, staring into the void. Behind her silence, a fierce war was raging. The truth the doctor had told her was spreading like poison through her body—"Blood Cancer." She decided to carry this burden alone, hiding it from Govind and her parents alike; she didn't want to be an object of pity.
But one fear consumed her: "What will happen to my children after me?" Would Govind, who was often lost in his own world, be able to hear their silent sobs? This fear forced her into a cruel decision. She masked her immense love behind a harsh exterior. She began forcing 9-year-old Radhika to handle kitchen chores and household responsibilities. The mother who once couldn't bear to see a scratch on Radhika now began hitting her with a rolling pin or tongs for the smallest mistakes.
Tears would well up in little Radhika’s eyes as she wondered, "Is this really my mother? She used to love me more than her life; why is she so cruel now?" Radhika didn't know that with every strike, Reena’s own heart was shattering. Reena was intentionally sowing seeds of bitterness so that her absence wouldn't hurt as much. She was training Radhika for a world without her.
Amidst this pain, Reena smiled, remembering a day from three years ago when Radhika was six. She had taken Radhika to a Santoshi Mata temple where an old priestess solved people's problems every Friday. Reena had complained, "Maataji, Radhika doesn't work, she's disobedient!" The priestess had laughed and asked, "Did you listen to your mother when you were six?" Everyone had laughed then. Reena desperately wanted to see Radhika grow up, but fate was dealing a different hand—witnessing that growth was simply not in her destiny.
भाग 24 वाकई में दिल को चीर देने वाला है। एक माँ का अपनी ही संतान की नज़रों में 'बुरा' बन जाना ताकि उसके जाने के बाद बच्ची का दुख कम हो सके—यह बलिदान की वो पराकाष्ठा है जिसे सोचकर भी रूह कांप जाती है। संतोषी माता के मंदिर वाला वह फ्लैशबैक (अतीत की याद) कहानी में एक बहुत ही खूबसूरत और मासूम सा बदलाव लाता है, जो वर्तमान के दुख को और गहरा कर देता है।
बचपन की यादें: भाग 24 — ममता का कठोर कवच और अनकहा दर्द
रीना अक्सर घर के एक कोने में गुमसुम बैठी शून्य को निहारा करती थी। बाहर से खामोश दिखने वाली रीना के भीतर एक भयंकर युद्ध चल रहा था। डॉक्टर ने उसे जो सच बताया था, वह किसी ज़हर की तरह उसके शरीर में फैल रहा था—"ब्लड कैंसर।" एक ऐसी बीमारी जिसका अंत उसे साफ़ दिख रहा था। रीना ने तय कर लिया था कि वह यह बोझ अकेले ढोएगी। न उसने गोविंद को बताया, न अपने मायके में किसी को। वह नहीं चाहती थी कि उसकी मौत की ख़बर सुनकर लोग उसे दया की नज़रों से देखें।
लेकिन एक डर उसे हर पल खाए जा रहा था—"मेरे बाद इन बच्चों का क्या होगा?" क्या गोविंद, जो अपनी ही दुनिया और काम में इतने मशगूल रहते हैं कि कभी पलटकर रीना का हाल तक नहीं पूछा, क्या वे बच्चों की भूख और उनकी सिसकियाँ सुन पाएंगे? रीना को पता था कि गोविंद के लिए वह शायद सिर्फ घर संभालने वाली एक ज़रूरत थी, पर बच्चों के लिए तो वह उनकी साँस थी।
इसी डर और मजबूरी ने रीना को एक कठोर निर्णय लेने पर मजबूर कर दिया। उसने अपनी ममता को एक सख्त नकाब के पीछे छुपा लिया। वह राधिका, जो अभी सिर्फ 9 साल की थी, उसे जबरन रसोई और घर के कामों में लगाने लगी। रीना, जो कभी राधिका की ज़रा सी चोट पर तड़प उठती थी, अब छोटी-छोटी गलतियों पर उसे चिमटे और लकड़ी से मारने लगी।
नन्हीं राधिका की आँखों में आँसू भर आते, वह रोते हुए सोचती, "क्या यह वही मेरी माँ है? मेरी माँ तो मुझे जान से ज्यादा प्यार करती थी, फिर यह मुझे इतनी बेदर्दी से क्यों मार रही है?" राधिका नहीं जानती थी कि उसे मारने वाली माँ का कलेजा हर प्रहार के साथ फट रहा था। रीना जानबूझकर राधिका के मन में अपने प्रति कड़वाहट भर रही थी ताकि जब वह इस दुनिया से जाए, तो राधिका को उसकी कमी न खले, बल्कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। वह राधिका को 'दुख' और 'काम' की ऐसी ट्रेनिंग दे रही थी जो उसके जाने के बाद काम आए। रीना अंदर ही अंदर तिल-तिल कर मर रही थी, पर वह चाहती थी कि उसके बच्चे उसके बगैर भी जीना सीख लें।
इस स्थिति में भी मुस्कुराते हुए रीना कुछ सोच रही थी राधिका लगभग 6 साल की थी
रीना ने उसे एक मंदिर में ले कर गई वहां एक माताजी रहती थी वहां की वाक्य को याद करके रीना मुस्कुरा रही थी रीना ने राधिका को माता जी के सामने बैठाला
वह संतोषी माता का एक मंदिर था जहां एक माताजी रहती थी हर शुक्रवार को माता जी के नाम से लोगों की समस्याओं का समाधान करती थी रीना ने कहा उन माताजी से माताजी राधिका काम नहीं करती मैं यहां बुलाती हूं वहां जाती है जो भी बोलती हूं उसका उल्टा करती है मेरा कहना
नहीं मानती माताजी ने कहा क्या तुम 6 साल की थी तो तुम अपनी मां का कहना मानती थी वहां पर जितने लोग भी बैठे थे सारे लोग खिलखिलाकर हंस पड़े थे रीना जल्दी से जल्दी राधिका को बड़ा होते हुए देखना चाहती थी लेकिन समय समय का खेल कुछ और दिखा रहा था क्योंकि राधिका को बड़ा होते हुए देखना रीना की किस्मत में था ही नहीं इसी बात को सोचते हुए वह मुस्कुरा रही थी
निष्कर्ष:
यह भाग हमें उस माँ की मनःस्थिति दिखाता है जो मौत के करीब होकर भी सिर्फ अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचती है। रीना का राधिका के प्रति कठोर होना उसकी नफरत नहीं, बल्कि एक माँ का वो अंतिम त्याग था जिसे समझने के लिए राधिका अभी बहुत छोटी थी। यह कहानी दर्शाती है कि जब इंसान को अपनी मौत का समय पता चलता है, तो वह अपने पीछे वालों को मज़बूत बनाने के लिए खुद को पत्थर बनाने की भी ताकत रखता है।
Conclusion (निष्कर्ष)
यह भाग हमें उस माँ की मनःस्थिति दिखाता है जो अपनी मौत को सामने खड़ा देख, अपने बच्चों के लिए 'पत्थर' बन जाती है। रीना का कठोर व्यवहार नफ़रत नहीं, बल्कि एक 'सुरक्षा कवच' है। वह राधिका को उस दुनिया के लिए तैयार कर रही है जहाँ माँ की थपकियाँ नहीं, बल्कि ज़िंदगी के थपेड़े मिलने वाले हैं। एक माँ का अपनी ही संतान की नज़रों में गिर जाना, दुनिया का सबसे बड़ा दान है।
The Strong Questions (मज़बूत सवाल)
- "क्या एक माँ का अपनी ममता को नफ़रत का नकाब पहनाना सही है, या यह राधिका के बचपन के साथ सबसे बड़ा अन्याय है?"
- "जब राधिका बड़ी होकर इस 'मार' के पीछे छिपे 'प्यार' को समझेगी, तो क्या वह खुद को कभी माफ़ कर पाएगी कि उसने अपनी माँ को गलत समझा?"
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