बचपन की यादें: भाग 28वीं पोस्ट— मौत को मात और माँ का आख़िरी संकल्प
Radhika’s Diary: Part 28 (Defying Death and a Mother’s Final Resolve)
Title: Can a mother’s willpower bargain with death for a little more time?
The silence of the dark night was heavy. Reena lay on her bed, counting her breaths, when suddenly a sharp pain pierced her chest. This pain was far more terrifying than her first heart attack, as if thousands of needles were stabbing her heart at once. Drenched in sweat, she felt that the final call had arrived.
Little Radhika, sleeping nearby, woke up startled by her mother’s gasping sounds. Reena couldn't speak; her hand was on her chest, and her face was turning blue. Radhika screamed, "Mummy! What happened?" But Govind wasn't home; he was away in the city. A 9-year-old child was left alone, watching her mother struggle for life.
There was no one to take her to the hospital, yet perhaps Reena’s maternal instinct wanted to fight a bit longer. She eventually reached the hospital and was placed in the Intensive Care Unit (ICU). The situation was critical, and even the doctors had lost hope. But miraculously, after a few hours, her heartbeat stabilized. She had touched the door of death and returned.
When Reena regained consciousness, she saw Radhika standing in the corner through her blurred vision. Radhika’s face had turned pale with terror. Reena thought to herself—"Not yet! I cannot die yet. I must make my Radhika so strong that she doesn't break in this cruel world after I'm gone." She knew this second attack had left her extremely weak, but the 'Mother' within her took a final vow: before her final journey, she would teach Radhika every lesson needed to turn her into a rock.
भाग 28 रोंगटे खड़े कर देने वाला है। मौत के मुहाने से वापस आना और वह भी सिर्फ इसलिए ताकि अपनी बेटी को 'फौलाद' बना सके—यह एक माँ के संकल्प की पराकाष्ठा है। वह दर्द, वह सन्नाटा और 9 साल की बच्ची की वह चीख... आपने बहुत ही मार्मिक तरीके से लिखा है।
बचपन की यादें: भाग 28वीं पोस्ट— मौत को मात और माँ का आख़िरी संकल्प
अंधेरी रात का सन्नाटा पसरा हुआ था। रीना बिस्तर पर लेटी अपनी सांसों की गिनती कर रही थी कि अचानक उसके सीने में एक तेज़ दर्द उठा। यह दर्द पहले हार्ट अटैक से कहीं ज़्यादा भयानक था, जैसे हज़ारों सुइयां एक साथ दिल में चुभ रही हों। रीना का शरीर पसीने से तर-बतर हो गया और उसे लगा कि बस, बुलावा आ गया।
नन्ही राधिका जो पास ही सोई थी, अपनी माँ की घबराहट भरी आवाज़ सुनकर हड़बड़ा कर उठी। रीना बोल नहीं पा रही थी, बस उसका हाथ अपने सीने पर था और चेहरा नीला पड़ रहा था। राधिका चिल्लाई, "मम्मी! क्या हुआ?" लेकिन गोविंद घर पर नहीं थे, वे शहर गए हुए थे। 9 साल की बच्ची अकेले ही अपनी माँ को तड़पते देख रही थी।
अस्पताल ले जाने वाला कोई न था, पर शायद रीना की ममता अभी और लड़ना चाहती थी। वह अस्पताल पहुंची, और डॉक्टर ने उसे गहन चिकित्सा कक्ष (ICU) में रख दिया। स्थिति बहुत गंभीर थी, डॉक्टर भी उम्मीद छोड़ चुके थे। लेकिन चमत्कारी रूप से, कुछ घंटों बाद रीना की धड़कनें संभलने लगीं। वह मौत के दरवाज़े को छूकर वापस आ गई थी।
जब रीना को होश आया, तो उसने अपनी धुंधली आँखों से राधिका को कोने में खड़े देखा। राधिका का चेहरा डर से सफेद पड़ गया था। रीना ने मन ही मन सोचा—"अभी नहीं! मैं अभी नहीं मर सकती। मुझे अपनी राधिका को इतना मज़बूत बनाना है कि मेरे जाने के बाद वह इस क्रूर दुनिया में टूटे नहीं।" वह जानती थी कि यह दूसरा हमला उसे बहुत कमज़ोर कर गया है, पर उसके भीतर की 'माँ' ने एक आख़िरी संकल्प लिया कि वह अपनी अंतिम यात्रा से पहले राधिका को हर वह सबक सिखा देगी जो उसे एक चट्टान बना दे।
निष्कर्ष (Conclusion)
यह भाग हमें सिखाता है कि एक माँ की इच्छाशक्ति मौत को भी कुछ पल के लिए टाल सकती है। रीना का जीवित बचना उसके लिए आराम का मौका नहीं, बल्कि राधिका के भविष्य को संवारने की एक आख़िरी और कड़ी जंग की शुरुआत थी। मौत का साया अब और भी गहरा था, पर रीना की आँखों में अब डर नहीं, एक ज़िद थी।
आज का मज़बूत सवाल (The Strong Question)
"क्या रीना का मौत से यह 'उधार माँगा समय' राधिका के लिए आशीर्वाद बनेगा, या यह उसे और भी कठोर संघर्षों की आग में झोंक देगा?"
या फिर: "एक 9 साल की बच्ची, जिसने अपनी माँ को मौत के करीब से लौटते देखा, क्या वह कभी उस मानसिक सदमे से बाहर आ पाएगी?"
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