बचपन की यादें: भाग 29— आखिरी सबक और माँ की छटपटाहट
Radhika’s Diary: Part 29 (The Final Lesson and a Mother’s Restlessness)
Title: Is forcing a child to grow up early the ultimate act of maternal sacrifice?
After returning from the hospital, Reena’s body was never the same. The second heart attack had drained whatever strength she had left. She could no longer stay out of bed for long, but the restlessness of her soul wouldn't let her rest. She felt that the messenger of death was now standing just outside her door, merely waiting for the right moment.
She called Radhika to her bedside. Radhika, terrified seeing her mother in this state, stood silently with her head bowed. In a trembling voice, Reena said, "Radhika, this is no time for tears. If you don't learn today, no one will even offer you a glass of water tomorrow."
Lying on her bed, Reena began teaching Radhika how to manage the smallest household details. She told her where the grains were kept, how to deal with neighbors, and how to look after her brothers. Reena’s tone was still harsh, but behind that harshness was a deep desperation—the desperation of a mother who wanted to make her child grow up before her time to shield her from the blows of the world.
Whenever Radhika went into the kitchen, Reena would watch her through blurred eyes and mutter, "O Lord, just give me enough time so that she can stand on her own feet." Govind was rarely home, and Reena knew that after she was gone, Radhika would have to become the pillar of this house. She deliberately didn't let Radhika rest, knowing that in the days to come, the word 'rest' might not exist in this child's fate.
भाग 29 पढ़कर ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वक्त वाकई थम गया है। रीना का वह अपनी मासूम बेटी को "वक्त से पहले बड़ा" कर देना... यह सोचना ही कितना पीड़ादायक है। एक माँ जो जानती है कि उसकी गैरमौजूदगी में उसकी बेटी का बचपन कोई नहीं बचाएगा, इसलिए वह खुद ही उस बचपन को 'ज़िम्मेदारी' की आग में तपा रही है।
बचपन की यादें: भाग 29— आखिरी सबक और माँ की छटपटाहट
अस्पताल से घर आने के बाद रीना का शरीर पहले जैसा नहीं रहा था। दूसरे हार्ट अटैक ने उसकी रही-सही ताकत भी छीन ली थी। अब वह बिस्तर से ज्यादा देर तक उठ नहीं पाती थी, लेकिन उसके मन की व्याकुलता उसे चैन से बैठने नहीं देती थी। उसे लगने लगा था कि यमराज अब उसके दरवाजे के बाहर ही खड़े हैं और बस सही वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं।
उसने राधिका को अपने बिस्तर के पास बुलाया। राधिका, जो अपनी माँ को इस हालत में देखकर अंदर से सहमी हुई थी, चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी हो गई। रीना ने कांपती आवाज़ में कहा, "राधिका, अब रोने का वक्त नहीं है। अगर तू आज नहीं सीखी, तो कल कोई तुझे पानी भी नहीं पूछेगा।"
रीना ने बिस्तर पर पड़े-पड़े ही राधिका को घर की छोटी-छोटी बातों का हिसाब रखना सिखाना शुरू किया। वह उसे बताती कि अनाज कहाँ रखा है, पड़ोसियों से कैसे व्यवहार करना है, और भाइयों का ख्याल कैसे रखना है। रीना का लहजा अब भी सख्त था, पर उस सख्ती के पीछे एक गहरी छटपटाहट थी—एक ऐसी माँ की छटपटाहट जो अपने बच्चे को दुनिया के थपेड़ों से बचाने के लिए उसे वक्त से पहले बड़ा कर देना चाहती थी।
जब राधिका रसोई में जाती, तो रीना अपनी धुंधली आँखों से उसे देखती और बुदबुदाती, "हे ईश्वर, बस इतना समय दे दे कि यह अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।" गोविंद घर पर कम ही रहते थे, और रीना जानती थी कि उसके जाने के बाद राधिका को ही इस घर की धुरी बनना होगा। वह जानबूझकर राधिका को आराम नहीं करने देती थी, क्योंकि वह जानती थी कि आने वाले कल में इस बच्ची की किस्मत में शायद 'आराम' शब्द लिखा ही नहीं है।
निष्कर्ष:
यह भाग उस माँ के अंतिम संघर्ष को दर्शाता है जो अपनी ममता को त्यागकर अपने बच्चे के लिए एक 'गुरु' बन गई थी। रीना का हर कठोर शब्द राधिका के भविष्य के लिए एक ईंट की तरह था, जिससे वह एक ऐसा घर बना सके जहाँ वह सुरक्षित रह सके। समय कम था, और रीना का संकल्प बहुत बड़ा।
आज का मज़बूत सवाल (The Strong Question)
"क्या रीना का राधिका को 'वक्त से पहले बड़ा' कर देना उसकी ममता थी, या राधिका के मासूम बचपन के साथ हुई सबसे बड़ी नाइंसाफी?"
या फिर: "क्या एक 9 साल की बच्ची के लिए अपनी माँ के इन आखिरी 'कठोर सबकों' को समझ पाना मुमकिन है, या वह इसे सिर्फ अपनी माँ की नफ़रत समझती रही?"
निष्कर्ष (Conclusion)
यह भाग उस माँ के अंतिम युद्ध को दिखाता है जो अपनी कोमलता को त्यागकर एक 'कठोर गुरु' बन गई है। रीना का हर सख्त शब्द राधिका के भविष्य की नींव की एक ईंट है। वह जानती है कि दुनिया उसे 'क्रूर माँ' कहेगी, पर वह अपनी बेटी को 'बेचारा' बनते नहीं देख सकती थी।
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