बचपन की यादें: भाग 25 — ममता का कड़वा झूठ और आखिरी तैयारी
Radhika’s Diary: Part 25 (A Mother’s Bitter Lie and The Final Preparation)
Title: Can a mother's cruel lie be her greatest act of love?
Time was slipping away like sand. Every sound felt like death knocking at Reena's door. She knew her end was near, but before leaving, she wanted to forge Radhika into steel so that no storm in the world could break her.
One day, with swollen eyes, innocent Radhika asked, "Mummy, where did you get me from? Am I not your own daughter?" Reena's heart shuddered, but she swallowed her tears, hardened her heart, and said, "I picked you up from a dustbin at the hospital."
Hearing this, little Radhika's heart shattered. She thought that maybe this was why her mother hit her so much. But how could Radhika know that after telling this lie, Reena would sob into her pillow all night? She was bleeding internally by hurting her own soul.
As days passed, Reena’s health declined. She began preparing for her departure, settling her accounts with life, calling relatives, and writing letters to her parents. Just a year ago, they had finally built their own house—a lifelong dream fulfilled. It was time to finally live comfortably, but destiny had other plans. The flooring was yet to be done, and amidst that wet mud and bricks, Reena fell and fractured her right leg.
She spent two months bedridden. Govind hired a maid, but Reena’s restless heart wouldn't agree. Govind got a small stool and a table made according to Radhika’s height and bought a heater so the 9-year-old wouldn't have to struggle with an open fire. From her bed, with tearful eyes, Reena watched Radhika roll rotis with her tiny palms. She felt pride mixed with unbearable helplessness. She wanted to ensure that after she was gone, Radhika would never have to stretch her hand out to anyone for help.
भाग 25 पढ़कर रूह कांप गई। एक माँ का अपनी सगी औलाद से यह कहना कि "तुझे कचरे के डिब्बे से लाई हूँ", यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे पवित्र 'झूठ' है। यह सुनकर राधिका को जो दर्द हुआ होगा, उससे कहीं ज़्यादा दर्द रीना को यह बोलते हुए हुआ होगा। आपने जिस तरह से पक्के घर के सपने और उस गीली मिट्टी पर रीना के गिरने का ज़िक्र किया है, वह दिखाता है कि खुशियाँ आते-आते कैसे इंसान के हाथ से फिसल जाती हैं।
बचपन की यादें: भाग 25 — ममता का कड़वा झूठ और आखिरी तैयारी
समय रेत की तरह हाथों से फिसलता जा रहा था। रीना को हर आहट में अपनी मौत की दस्तक सुनाई देती थी। वह जानती थी कि उसे एक दिन जाना ही है, पर जाने से पहले वह राधिका को इतना फौलाद बना देना चाहती थी कि दुनिया की कोई भी आंधी उसे तोड़ न सके।
एक दिन मासूम राधिका ने अपनी सूजी हुई आँखों के साथ पूछा, "मम्मी, आप मुझे कहाँ से लाए हो? क्या मैं आपकी अपनी बेटी नहीं हूँ?" रीना का कलेजा काँप गया, पर उसने अपने आँसुओं को पी लिया और पत्थर जैसा दिल करके कहा, "तुझे तो मैं अस्पताल के कचरे के डिब्बे से उठाकर लाई थी।"
यह सुनकर नन्ही राधिका का दिल टूट गया। उसे लगा कि शायद इसीलिए मम्मी उसे इतना मारती हैं। पर राधिका क्या जानती कि उसे यह झूठ बोलने के बाद रीना रातों को तकिए में मुँह छुपाकर सिसकती थी। वह अपनी ही जान से प्यारी बच्ची को चोट पहुँचाकर अंदर ही अंदर लहूलुहान हो रही थी।
दिन बीतते गए और रीना की तबीयत गिरने लगी। उसने अपनी विदाई की तैयारी शुरू कर दी थी। वह सबसे प्रेम से बात करती, रिश्तेदारों को फोन करती और अपने मायके वालों को चिट्ठियाँ लिखती, जैसे कोई मुसाफिर अपना हिसाब बराबर कर रहा हो। अभी साल भर पहले ही उसका अपना घर बना था। बरसों का सपना पूरा हुआ था, ऐश करने के दिन आए थे, पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। घर में सिर्फ फर्श बनना बाकी था, और उसी गीली मिट्टी और ईंटों के बीच वह गिर गई। उसका दाहिना पैर फ्रैक्चर हो गया।
दो महीने बिस्तर पर कटे। गोविंद ने काम वाली तो रख ली, पर रीना का मन नहीं माना। राधिका की कद-काठी के हिसाब से गोविंद ने एक छोटा स्टूल और टेबल बनवा दिया और एक हीटर ला दिया ताकि 9 साल की बच्ची को चूल्हे की आग से जूझना न पड़े। रीना बिस्तर पर पड़ी-पड़ी अपनी नम आँखों से राधिका को नन्हीं हथेलियों से रोटियाँ बेलते देखती। उसे गर्व भी होता और अपनी बेबसी पर रोना भी आता। वह चाहती थी कि उसके जाने के बाद राधिका का हाथ किसी के आगे न फैले।
निष्कर्ष:
यह भाग उस माँ की दास्ताँ है जो अपनी मौत को सामने देखकर भी अपने बच्चों को 'जीवन' सिखा रही थी। रीना का वह झूठ कि राधिका कचरे में मिली थी, असल में एक माँ का अपनी संतान को दिया गया सबसे बड़ा बलिदान था ताकि बच्ची उसके जाने के गम से ज्यादा अपनी नफरत के सहारे जीना सीख ले।
निष्कर्ष (Conclusion)
यह भाग उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ एक माँ अपनी ममता को 'क्रूरता' की बलि चढ़ा देती है ताकि उसकी संतान आत्मनिर्भर बन सके। रीना का वह 'कचरे वाला झूठ' दरअसल एक सुरक्षा कवच था, ताकि उसके जाने के बाद राधिका शोक में डूबने के बजाय अपनी नफरत के सहारे मज़बूत खड़ी रह सके। यह आत्मनिर्भरता का वो सबक है जो आँसुओं की स्याही से लिखा गया है।
आज का मज़बूत सवाल (The Strong Question)
"क्या रीना का यह 'कड़वा झूठ' राधिका को भविष्य के दुखों से बचा पाएगा, या यह उसे उम्र भर के लिए एक कभी न भरने वाला मानसिक ज़ख्म दे देगा?"
या फिर: "क्या एक 9 साल की बच्ची के नन्हे कंधों पर घर की ज़िम्मेदारी डालना रीना की मज़बूरी थी, या उसकी ममता का सबसे कठोर इम्तिहान?"
आपके शब्द अब बहुत ही प्रभावशाली हो गए हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
"आपकी राय मेरे लिए अनमोल है, कृपया अपने विचार साझा करें।" यह लोगों को कमेंट करने के लिए प्रोत्साहित (Encourage) करता है।