भाग 10: बचपन की यादें: गरीबी का अहसास और आत्मसम्मान
जिसे दुनिया 'त्याग' कहती है, पर असल में वह एक माँ की 'अजेय शक्ति' है। आपने जिस खूबसूरती से गोविंद के अहंकार के टूटने का वर्णन किया है, वह यह साबित करता है कि घर ईंट-पत्थरों से नहीं, एक औरत की ममता और उसकी व्यवस्था से चलता है।
गोविंद का उन पैरों पर गिरना, जिन पर उसने ज़ख्म दिए थे, कहानी का सबसे शक्तिशाली क्षण है। यह रीना की नैतिक जीत है।
Radhika’s Diary: Part 10 (The Victory of Motherhood and the Tears of Penance)
Can wounds of the soul be healed by an apology at the feet?
The mansion was silent, haunted by the absence of the children’s laughter. Reena lay still, her body bandaged and covered in turmeric paste by her Nani, but her soul remained shattered.
The Silent Support of Brothers
Reena’s brothers were consumed with rage, yet they didn't call the police, fearing a legal battle would destroy what was left of her home.
- Devotion: The eldest brother personally tended to her medicines, while the younger ones served her without rest.
- Firm Resolve: They insisted, "Reena, you are not going back to that hell. We will look after you."
But Reena’s heart was elsewhere. She worried about her children. Who would make tea for Govind? Who would feed the baby? She knew that without her, the house would crumble.
Six Months of Agony
Half a year passed. Her physical wounds began to fade into dark scars—scars on her thighs and legs that would forever remind her of that night. She now walked with a limp. Her self-respect had awakened. She sent a message: "I will not return until Govind himself comes and confesses his guilt."
The Collapse of Govind’s World
Back in the city, Govind’s iron-like ego was rustling away.
- Business in Ruins: His thriving iron business stalled. Without peace at home, he couldn't focus on deals.
- The Children’s Plight: Radhika stopped going to school. The house was covered in dust, and there was no proper food.
- The Harsh Reality: One morning, Govind tried to make tea but spilled half the contents. He tried to cook rotis, but they burned. Seeing his daughter Radhika quietly pack a burnt lunch with tears in her eyes broke something inside him.
The Breaking Point
When his youngest son caught a high fever, Govind sat awake all night, helpless. He didn't know which medicine to give. He realized that while he was a successful businessman, without Reena, he was a lost man. He looked in the mirror—unshaven, dirty, and defeated. He decided he had to surrender his ego.
The Morning of Atonement
The car stopped at the haveli again. Govind stepped out, but the arrogance was gone, replaced by deep shame. He walked straight to Reena’s room. Seeing her limp, he collapsed at her feet—the same feet he had brutally struck.
"Reena, forgive me. I am not worthy of being called a human. Please come back for the sake of the children. I am lost without you."
Reena’s Decision
Her brothers tried to stop her, but Reena silenced everyone. She looked at Govind and said in a firm, raspy voice: "I am returning not for you, but for the future of my children. But remember, if you raise your hand again, there will be no Reena left to return to."
Once again, Reena stepped over the threshold of her maternal home, leaving behind comfort and safety, to rebuild the house she had nurtured with her own blood and sweat.
राधिका जी, यह भाग आपके साहस का प्रमाण है। एक औरत जब अपने ज़ख्मों को भूलकर बच्चों के लिए वापस 'उस घर' में जाती है, तो वह हारती नहीं है, बल्कि वह उस घर की नींव को फिर से मज़बूत करती है।
आपने लिखा कि "अगली बार अगर आपने हाथ उठाया, तो फिर लौटने के लिए कोई रीना नहीं बचेगी"—यह चेतावनी नहीं, एक मज़बूत स्त्री का आखिरी फैसला था।
मेरे मन में एक सवाल है:
जब रीना उस घर में वापस लौटी, तो क्या समाज और पड़ोसियों का नज़रिया बदला? और क्या गोविंद वाकई अपनी शराब की लत और उस वहशी गुस्से को छोड़ पाया, या यह बदलाव सिर्फ कुछ दिनों का था?
राधिका की डायरी: भाग - 10 (ममता की जीत और प्रायश्चित)
हवेली के उस कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था, जहाँ कभी बच्चों की किलकारियां गूँजती थीं। रीना बिस्तर पर बेजान पड़ी थी। उसके भाइयों ने पट्टी बांधी थी, नानी ने हल्दी का लेप लगाया था, पर रीना की रूह पर लगे घावों का कोई इलाज नहीं था।
भाइयों का मौन समर्थन और सेवा
रीना के भाइयों के मन में गुस्सा तो बहुत था, पर वे अपनी बहन के घर को उजाड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने पुलिस को नहीं बुलाया, क्योंकि वे जानते थे कि मामला कानूनी हुआ तो बात और बिगड़ेगी।
भाई का समर्पण: बड़े भाई ने खुद रीना को दवाइयां दीं और छोटे भाइयों ने उसकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी।
भाई की जिद: भाइयों ने साफ़ कह दिया था, "रीना, तू अब यहाँ से कहीं नहीं जाएगी। हम तुझे पाल सकते हैं, पर उस नरक में वापस नहीं भेजेंगे।"
पर रीना के कान तो बस बाहर की आहट सुन रहे थे। उसे राधिका की याद आती, उसे अपने छोटे बेटे की भूख की चिंता होती। उसे पता था कि गोविंद को चाय तक बनाना नहीं आता, वह बच्चों को कैसे संभालेगा?
बच्चों के बिना सूनी हवेली
छह महीने बीत गए। रीना के शरीर के घाव धीरे-धीरे भर रहे थे, पर जांघों और पैरों पर पड़े वो काले निशान अभी भी उसे उस खौफनाक रात की याद दिलाते थे। वह लंगड़ाकर चलने लगी थी। उसने ठान लिया था कि इस बार वह झुककर वापस नहीं जाएगी। उसका आत्मसम्मान जाग चुका था। उसने संदेश भिजवा दिया था— "जब तक गोविंद खुद यहाँ आकर अपनी गलती नहीं मानता, मैं कदम नहीं रखूँगी।"
गोविंद की हालत और घर का बिखराव
उधर शहर में, गोविंद का अहंकार धीरे-धीरे टूट रहा था।
बिज़नेस पर असर: घर की अशांति के कारण उसका लोहे का व्यापार ठप्प होने लगा।
बच्चों की दुर्दशा: राधिका स्कूल नहीं जा पा रही थी, छोटे बच्चे सारा दिन रोते रहते। घर में धूल जम गई थी और खाने के लाले पड़ गए थे।
अकेलेपन का अहसास: शराब के नशे में जब वह रात को घर लौटता, तो उसे अहसास होता कि रीना सिर्फ उसकी पत्नी नहीं, उसके घर की रीढ़ थी। उसे अपनी गलती का अहसास होने लगा, एक गहरा 'गिल्ट' उसे अंदर ही अंदर खाने लगा।
(अहंकार की हार और ज़िम्मेदारी का बोझ)
रीना को लहूलुहान हालत में मायके छोड़कर जब गोविंद बच्चों को लेकर अपने घर पहुँचा, तो उसे लगा था कि वह सब संभाल लेगा। उसका लोहा जैसा मज़बूत अहंकार उसे कह रहा था कि "एक औरत के बिना घर नहीं रुकेगा।" पर हकीकत कुछ और ही निकली।
रसोई का वो पहला दिन
अगली सुबह जब गोविंद सोकर उठा, तो उसे आदत थी कि रीना के हाथ की गरम चाय टेबल पर मिले। पर आज घर में सन्नाटा था। बच्चे भूख से रो रहे थे।
रसोई की जंग: गोविंद रसोई में गया, पर उसे समझ ही नहीं आया कि डिब्बे कहाँ रखे हैं। चाय पत्ती ढूंढते-ढूंढते उसने आधा डिब्बा ज़मीन पर गिरा दिया।
टिफिन का संघर्ष: राधिका का स्कूल था। गोविंद ने जैसे-तैसे कच्ची-पक्की रोटियां बनाईं, जो जल गई थीं। राधिका ने रोते हुए वो टिफिन अपनी बैग में रखा, पर उसकी आँखों में अपनी माँ के लिए तड़प साफ दिख रही थी।
कपड़े और साफ-सफाई की आफत
एक हफ्ता बीतते-बीतते घर की हालत किसी कबाड़खाने जैसी हो गई।
कपड़ों का अंबार: जो गोविंद रोज़ साफ़ और इस्तरी किए हुए कपड़े पहनकर दुकान जाता था, आज उसके पास पहनने को साफ़ बनियान तक नहीं थी। उसे खुद बाल्टी लेकर बैठना पड़ा। लोहे जैसा सख्त हाथ जब सर्फ के पानी में उतरा, तो उसे समझ आया कि रीना रोज़ घंटों कैसे ये सब करती थी।
बच्चों का नहाना: छोटे बच्चों को नहलाना, उनके बाल संवारना और उन्हें तैयार करना गोविंद के लिए किसी पहाड़ तोड़ने जैसा काम बन गया। वह चिड़चिड़ा जाता, पर बच्चों के मासूम चेहरे देखकर कुछ कह नहीं पाता।
व्यापार का नुकसान और एकांत
गोविंद का लोहे का बड़ा बिज़नेस था, जहाँ करोड़ों का लेन-देन होता था। पर घर की इस उथल-पुथल के कारण वह एक महीने तक दुकान पर पैर भी नहीं रख पाया।
पैसे की तंगी: काम पर न जाने से ऑर्डर रुक गए, कारीगरों के फोन आने लगे।
अकेली रातें: रात को जब वह थक-हारकर सोता, तो उसे वो मंज़र याद आता जब उसने रीना को पीटा था। घर के हर कोने में उसे रीना की परछाईं दिखती। उसे महसूस हुआ कि जिसे वह सिर्फ एक 'पत्नी' समझता था, वह दरअसल इस घर की धड़कन थी।
आत्म-ग्लानि का चरम
एक दिन जब छोटे बेटे को तेज़ बुखार हुआ, तो गोविंद उसे गोद में लेकर पूरी रात बैठा रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कौन सी दवा देनी है। उसने रीना को फोन करना चाहा, पर शर्म के मारे उसका हाथ रुक गया।
उस रात गोविंद फूट-फूटकर रोया। उसे समझ आ गया कि वह एक सफल बिजनेसमैन तो हो सकता है, पर रीना के बिना वह एक असहाय इंसान से ज़्यादा कुछ नहीं है। उसने आईने में खुद को देखा—बढ़ी हुई दाढ़ी, गंदे कपड़े और थकी हुई आँखें।
उसने तय कर लिया कि अब चाहे जो हो जाए, उसे अपना अहंकार त्यागना होगा। वह अपनी रीना को वापस लाएगा, क्योंकि घर ईंट-पत्थरों से नहीं, रीना की मौजूदगी से बनता है।
वो ऐतिहासिक सुबह: प्रायश्चित के आँसू
एक सुबह, हवेली के दरवाजे पर फिर से एक गाड़ी रुकी। इस बार बच्चे पहले नहीं दौड़े, बल्कि गोविंद गाड़ी से उतरा। उसके हाथ में बच्चों का सामान था और चेहरे पर वो अकड़ नहीं, बल्कि एक शर्मिंदगी थी।
वह सीधा रीना के कमरे में गया। रीना खिड़की के पास बैठी थी। जैसे ही गोविंद ने उसे देखा और उसकी लंगड़ाहट देखी, वह फूट-फूटकर रोने लगा। वह रीना के उन्हीं पैरों पर गिर पड़ा जिन पर उसने निशान दिए थे।
"रीना, मुझे माफ कर दो। मैं इंसान कहलाने के लायक नहीं हूँ। बच्चों की खातिर वापस चल चलो, मैं तुम्हारे बिना और बच्चों के बिना खत्म हो रहा हूँ।"
रीना का फैसला
रीना के भाइयों ने उसे रोकने की कोशिश की, पर रीना ने सबको खामोश कर दिया। उसने गोविंद को उठने का इशारा किया और अपनी फटी हुई आवाज़ में कहा, "मैं अपने लिए नहीं, अपने बच्चों के भविष्य के लिए आ रही हूँ। पर याद रहे, अगली बार अगर आपने हाथ उठाया, तो फिर लौटने के लिए कोई रीना नहीं बचेगी।"
रीना ने एक बार फिर अपने मायके की चौखट लांघी, अपनों का प्यार छोड़कर, अपने उस घर को बचाने के लिए जिसे उसने अपने खून-पसीने से सींचा था।
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