भाग 16: बचपन की यादें: वो रात जब सब बदल गया

 


Radhika’s Diary: Part 16 (The Mother’s Departure and the Cruel Stroke of Fate)

When the shield leaves, the storm strikes with a vengeance. Is this the end of Reena's struggle, or a test of her spirit?

​Fifteen days had passed under the soothing shadow of her mother. The dampness of sorrow was fading from the walls, and Reena's wounds were healing. But one morning, when the mother started packing her bundle, Reena’s heart sank.

"Ma, stay for a few more days! The house feels like a home when you're here," Reena pleaded like a child. But the mother, steadfast in her principles, whispered, "A mother shouldn't overstay her welcome in a daughter's home, child. Society has sharp eyes. I came to be your shield when you were helpless, but now you stand like a lioness." Her parting advice was a mantra for survival: "Answer anger with silence; it is your greatest weapon. And if things ever spiral out of control, send word to me."

​With a heavy heart, Reena watched her mother leave. Life returned to its rhythm—children's studies, the kitchen, and Govind’s needs. Four months passed in deceptive peace. Govind had to leave the city for a month for a major business deal, leaving Reena alone with the children.

​Then, destiny played its cruelest card. At 2:00 AM, while the world slept, a searing pain erupted in Reena's chest, as if a burning coal had been placed on her heart. It was a massive heart attack. She gasped for air, struggling like a fish out of water. Her fingers clawed at the floor, but no sound escaped her throat. In that silent, dark house, there were only sleeping, innocent children and a mother fighting a lonely battle against death.

यह भाग पढ़कर दिल दहल गया। कहाँ हम माँ की सीख और एक नई शुरुआत की बात कर रहे थे, और कहाँ नियति ने इतना क्रूर मोड़ ले लिया। "मछली की तरह तड़पना" और "फर्श को खुरचना"—आपके ये शब्द रीना की उस रात की बेबसी को साक्षात् आँखों के सामने खड़ा कर रहे हैं।

​एक माँ जो अभी-अभी अपने ज़ख्मों से उभरी थी, जो अपने बच्चों के लिए ढाल बनी खड़ी थी, उसे काल ने ऐसे समय घेरा जब घर में कोई रक्षक नहीं था।

राधिका जी, यह दृश्य बहुत ही डरावना और दुखद है। आधी रात का समय, घर में कोई बड़ा नहीं, और रीना की वह खामोश तड़प...

अगले भाग (भाग-17) के लिए मेरा सवाल:

क्या उस वक्त राधिका या किसी बच्चे की आँख खुली? क्या उस मासूम बच्ची ने अपनी माँ को उस हालत में देख लिया? और क्या पड़ोस के वे 'सरदार जी' या कोई और फरिश्ता बनकर उस रात रीना की मदद के लिए आया?

​(राधिका की डायरी )भाग 16: माँ की विदाई और नियति का क्रूर प्रहार

​माँ को आए 15 दिन हो चुके थे और उनके साये में रीना की तबीयत और घर का माहौल, दोनों ही सुधर रहे थे। एक दिन माँ ने कहा, "बेटा, अब मैं घर जाऊँगी। अब तू चलने-फिरने लगी है और घर भी सँभाल सकती है।" रीना का मन भर आया, वह माँ को और रोकना चाहती थी, पर माँ अपनी मर्यादा पर अडिग थी। उन्होंने कहा, "बेटी के घर ज़्यादा दिन रहना उचित नहीं होता। मैं तो तेरी बीमारी की वजह से आई थी, पर अब गोविंद भी सुधर रहा है और तू भी ठीक है।"

माँ को आए 15 दिन बीत चुके थे। इन 15 दिनों में घर की दीवारों से जैसे सीलन और उदासी गायब हो गई थी। रीना की देह के घाव तो भर ही रहे थे, पर माँ की मौजूदगी उसके मन के ज़ख्मों पर शीतल लेप जैसी थी। लेकिन एक सुबह जब माँ ने अपनी पोटली बाँधनी शुरू की, तो रीना का दिल डूबने लगा।

माँ ने कहा, "बेटा, अब मैं घर जाऊँगी। अब तू संभल गई है, रसोई भी सँभालने लगी है। अब मेरी यहाँ ज़रूरत नहीं।"

रीना ने माँ का हाथ पकड़ लिया, आँखों में एक मासूम बच्चे जैसी गुहार थी, "माँ, कुछ दिन और रुक जाओ ना! अभी तो मुझे पता भी नहीं चला कि ये 15 दिन कैसे बीत गए। आपके रहने से घर, घर लगता है।"

माँ ने रीना के माथे को चूमकर बड़े धैर्य से समझाया, "नहीं बेटा, बेटी के घर में माँ का ज़्यादा दिन रहना उचित नहीं होता। समाज की आँखें और पड़ोसियों की बातें बेटी के ससुराल में काँटों की तरह चुभने लगती हैं। मैं नहीं चाहती कि मेरे यहाँ रहने से तेरी साख पर कोई आंच आए या किसी की आँखों में मैं खटकने लगूँ। मैं तो सिर्फ तेरी ढाल बनकर आई थी क्योंकि तू लाचार थी। पर अब तू शेरनी की तरह खड़ी है।"

माँ ने आगे कहा, "गोविंद ने मेरे रहते कोई गलत हरकत नहीं की, और मैं दुआ करूँगी कि आगे भी वह अपनी मर्यादा याद रखे।" रीना ने भारी मन से माँ का बैग पैक किया। विदाई के वक्त माँ ने रीना के कान में धीरे से कहा, "बेटा, अगर कभी भी लगे कि स्थिति हाथ से बाहर जा रही है, तो चुप मत रहना। मुझे चिट्ठी लिखना या किसी तरह ख़बर भिजवाना। और याद रखना—गुस्से का जवाब शांत रहकर देना, क्योंकि खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा हथियार होती है।"

माँ को गाड़ी में बैठाकर जब गोविंद वापस आए और दुकान चले गए, तो रीना को घर एक बार फिर बहुत बड़ा और खाली लगने लगा। वह फिर से अपनी दुनिया—बच्चों की पढ़ाई, रसोई और गोविंद की ज़रूरतों में उलझ गई। माँ का स्पर्श उसकी रूह में अभी भी ताज़ा था। उसे लगा सब ठीक हो गया है, पर नियति कुछ और ही बुन रही थी।

​रीना ने भारी मन से माँ का बैग पैक किया। जाते समय माँ ने उसे गले लगाकर बस एक ही मंत्र दिया— "गुस्से में शांत रहना और कुछ भी हो तो मुझे ख़बर करना।" माँ के जाने के बाद रीना फिर से अपने बच्चों और घर की ज़िम्मेदारी में डूब गई। माँ का प्यार ही था जिसने उसे उस गहरी पीड़ा से बाहर निकाला था।

​समय बीतता गया और सब कुछ सामान्य लगने लगा। लगभग 4 महीने बाद, गोविंद को काम के सिलसिले में एक महीने के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा। घर पर रीना और उसके बच्चे अकेले थे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक एक रात... नियति ने अपना क्रूर खेल खेला। रात के 2 बज रहे थे, जब रीना की छाती में असहनीय दर्द उठा। वह हार्ट अटैक का पहला दौरा था। रीना बिना आवाज़ किए मछली की तरह तड़प रही थी। घर में कोई बड़ा नहीं था, बस सो रहे मासूम बच्चे और तड़पती हुई रीना.. गोविंद को एक बहुत ज़रूरी काम से एक महीने के लिए बाहर जाना पड़ा। रीना और बच्चे घर में अकेले थे। एक रात, जब पूरा शहर गहरी नींद में था, अचानक रात के 2:00 बजे रीना को लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर जलता हुआ कोयला रख दिया हो। वह साँस लेने के लिए तड़प उठी। वह हार्ट अटैक का पहला दौरा था। रीना मछली की तरह तड़प रही थी, उसकी उँगलियाँ फर्श को खुरच रही थीं, पर गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी

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