बचपन की यादें: भाग 30— टूटती सांसें और अनकही विदाई
Radhika’s Diary: Part 30 (Fading Breaths and the Unspoken Farewell)
Title: Can a child ever understand the love hidden behind a mother's dying breaths?
The days were passing, but for Reena, each day felt like a century. The second heart attack had shaken the very foundation of her body, and the poison of cancer had now seeped into her bones. Every time she tried to rise from the bed, darkness would cloud her vision. She could no longer scold Radhika for chores even if she wanted to; her voice was failing her.
One evening, Radhika emerged from the kitchen, trembling with the fear that she had added too much water to the dal. She found Reena gasping for air on the bed, her eyes fixed on the ceiling as if staring at an invisible messenger. Radhika rushed to her side and took her cold hands in hers. Reena looked at her with fading vision; there was no longer that old harshness in her eyes, only boundless tears.
Slowly, Reena placed a hand on Radhika’s head and whispered, "My daughter, do not be afraid anymore. Everything I taught you was so that you would never give up." For the first time, Radhika realized that her mother didn't hate her; she was preparing her for a massive storm. Reena knew her time was now measured in hours. She gestured to call Govind, wanting to entrust her children to their father's care in her final moments.
A deathly silence began to envelop the house. The neighbors sensed that Reena’s condition was beyond recovery. Reena closed her eyes, preparing her soul for that final journey she had always feared.
भाग 30 तक आते-आते रीना का सफर अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गया है। वह पल जहाँ माँ की 'सख्ती' पिघलकर फिर से 'ममता' बन जाती है, दिल को झकझोर देने वाला है। राधिका का वह एहसास कि माँ ने उसे नफरत से नहीं बल्कि प्यार और फिक्र की वजह से फौलाद बनाया, कहानी का सबसे भावुक मोड़ है।
बचपन की यादें: भाग 30— टूटती सांसें और अनकही विदाई
दिन गुज़र रहे थे, पर रीना के लिए हर एक दिन एक सदी के समान था। दूसरे हार्ट अटैक ने उसके शरीर की नींव हिला दी थी और कैंसर का ज़हर अब उसकी हड्डियों तक पहुँच चुका था। वह बिस्तर से उठने की कोशिश करती, तो उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा जाता। अब वह चाहकर भी राधिका को काम के लिए डांट नहीं पाती थी, क्योंकि उसकी आवाज़ उसका साथ छोड़ रही थी।
एक शाम, जब राधिका दाल में पानी ज़्यादा हो जाने के डर से सहमी हुई रसोई से बाहर आई, तो उसने देखा कि रीना बिस्तर पर पड़ी ज़ोर-ज़ोर से हाँफ रही थी। उसकी आँखें छत को ताक रही थीं, जैसे वह वहाँ किसी अदृश्य दूत को देख रही हो। राधिका दौड़कर उसके पास गई और उसके ठंडे पड़ते हाथों को पकड़ लिया। रीना ने अपनी कमज़ोर नज़रों से राधिका को देखा; उसकी आँखों में अब वह पुरानी सख्ती नहीं, बल्कि बेपनाह आंसू थे।
रीना ने बहुत धीरे से राधिका के सर पर हाथ रखा और फुसफुसाते हुए कहा, "बिटिया, अब डरना मत। मैंने तुझे जो भी सिखाया, वह इसलिए था कि तू हार न माने।" राधिका को पहली बार अहसास हुआ कि उसकी माँ उससे नफरत नहीं करती थी, बल्कि उसे किसी बड़े तूफ़ान के लिए तैयार कर रही थी। रीना जानती थी कि उसके जाने का समय अब घंटों में सिमट गया है। उसने गोविंद को बुलाने के लिए इशारा किया, क्योंकि वह चाहती थी कि अंतिम पल में कम से कम वह अपने बच्चों को उनके पिता के भरोसे सौंप सके।
घर में मौत का सन्नाटा पसरने लगा था। पड़ोसियों को भी भनक लग गई थी कि रीना की हालत अब संभलने वाली नहीं है। रीना ने अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे वह अपनी आत्मा को उस अंतिम यात्रा के लिए तैयार कर रही हो, जिसका ज़िक्र उसने हमेशा अपने डर में किया था।
निष्कर्ष (Conclusion)
यह भाग उस अंतिम मोड़ को दर्शाता है जहाँ एक माँ की 'कठोरता' पिघलकर फिर से 'ममता' बन जाती है। रीना ने अपना काम पूरा कर लिया था—उसने राधिका को आत्मनिर्भर बना दिया था। अब उसकी थकी हुई रूह बस शांति से उस पार जाना चाहती थी, जहाँ कोई दर्द और कोई बीमारी न हो। रीना की आखिरी सांसें उसकी बेटी के लिए एक आशीर्वाद की तरह थीं।
आज का मज़बूत सवाल (The Strong Question)
"क्या राधिका की नन्ही हथेलियाँ उस 'अदृश्य बोझ' को संभाल पाएंगी जो रीना अपनी आखिरी सांसों के साथ उसे सौंप कर जा रही है?"
या फिर: "जब गोविंद लौटेंगे, तो क्या वे उस 'फौलाद' बन चुकी 9 साल की बच्ची में अपनी खोई हुई पत्नी की परछाई देख पाएंगे?"
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