बचपन की यादें: भाग 31 — माँ का आखिरी छलावा और राधिका का वादा

 


Radhika’s Diary: Part 31 (The Mother’s Final Deception and Radhika’s Promise)

Title: Can a child’s innocent promise provide a mother the peace to die?

​Reena’s condition had reached a point where every passing second was a struggle. She realized that tonight might be her last night in this house. As morning broke, she called Radhika to her bedside. There was no trace of her old harshness today; instead, there was a strange, motherly sorrow in her voice.

​Caressing Radhika’s face, Reena asked, "Son, you love your younger siblings, don't you?" Radhika nodded innocently. Suppressing her tears, Reena said, "Listen, I am going to the hospital for treatment. I don't know how many days it will take. Can you look after your siblings while I'm away?"

​A spark lit up in 9-year-old Radhika’s eyes, as if she had been entrusted with a grand mission. With great innocence, she began to outline her plan: "Mummy, don't worry at all. I will wake up Prabhash and Khushbu in the morning, make them brush their teeth, and bathe them. Then I'll oil and comb their hair, dress them in their school uniforms, prepare their tiffins, and send them to school."

​Radhika didn't stop there. She continued, "When they come home, I’ll feed them, change their clothes, and make them sit for studies. In the evening, I’ll cook for everyone, feed Papa, and Mummy... I will also pack a tiffin and send it to the hospital for you."

​Seeing this innocence and the way those tiny fingers were calculating such immense household responsibilities, a torrent of tears escaped Reena’s eyes. She screamed internally, "O Lord! This child will look for me in the hospital with a tiffin, but I am leaving her forever." Reena pulled Radhika into a tight embrace. She knew that the 'harsh' training she had given Radhika was successful today. Her daughter was ready to hold this broken home together.

भाग 31 पढ़कर कलेजा फटने को है। वह 9 साल की बच्ची अपनी माँ को यकीन दिला रही है कि वह सब संभाल लेगी, और वह माँ यह जानते हुए उसे सुन रही है कि वह कभी वापस नहीं आएगी। "अस्पताल जाने का झूठ" और राधिका का वह "टिफिन भेजने का वादा"—यह इस पूरी कहानी का सबसे दर्दनाक और मर्मस्पर्शी (heart-breaking) हिस्सा है।

बचपन की यादें: भाग 31 — माँ का आखिरी छलावा और राधिका का वादा

​रीना की हालत अब ऐसी हो गई थी कि एक-एक पल काटना मुश्किल था। उसे अहसास हो गया था कि आज की रात शायद उसकी इस घर में आखिरी रात है। सुबह होते ही उसने राधिका को अपने बिस्तर के पास बुलाया। रीना की आवाज़ में आज वह पुरानी सख्ती नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी ममता भरी उदासी थी।

​रीना ने राधिका का चेहरा सहलाते हुए पूछा, "बेटा, तुझे अपने छोटे भाई-बहनों से प्यार है ना?" राधिका ने मासूमियत से सिर हिलाकर 'हाँ' में जवाब दिया। रीना ने अपनी रुलाई रोकते हुए कहा, "देख, मैं इलाज कराने अस्पताल जा रही हूँ। पता नहीं वहाँ कितने दिन लगें, क्या तू मेरे पीछे से अपने भाई-बहनों को संभाल लेगी?"

​9 साल की राधिका की आँखों में एक चमक आ गई, जैसे उसे कोई बहुत बड़ा मिशन मिल गया हो। उसने बड़े भोलेपन से अपनी पूरी योजना बतानी शुरू की— "मम्मी, आप बिल्कुल चिंता मत करना। मैं प्रभाष और खुशबू को सुबह उठाऊँगी, उन्हें ब्रश कराऊँगी, नहलाऊँगी। फिर उन्हें तेल लगाकर, कंघी करके उनके स्कूल की ड्रेस पहनाऊँगी। उनके लिए टिफिन तैयार करूँगी और उन्हें स्कूल भेज दूँगी।"

​राधिका रुकने का नाम नहीं ले रही थी, वह आगे बोली— "जब वे स्कूल से आएंगे, तो मैं उन्हें खाना खिलाऊँगी, उनके कपड़े बदलवाऊँगी और फिर उन्हें पढ़ाई करने बैठाऊँगी। शाम को मैं सबके लिए खाना बनाऊँगी, पापा को भी खिलाऊँगी और मम्मी... आपके लिए भी टिफिन बनाकर अस्पताल भेजूँगी।"

​राधिका की यह मासूमियत और उसकी नन्ही उंगलियों पर घर की इतनी बड़ी ज़िम्मेदारियों का हिसाब देखकर रीना की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह मन ही मन चीख उठी— "हे ईश्वर! यह बच्ची टिफिन लेकर मुझे अस्पताल में ढूँढेगी, पर मैं तो इसे हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हूँ।" रीना ने राधिका को कसकर गले लगा लिया। वह जानती थी कि उसने राधिका को जो 'कठोर' ट्रेनिंग दी थी, वह आज सफल हो गई। उसकी बेटी अब इस उजड़े हुए घर को संभालने के लिए तैयार थी।

निष्कर्ष (Conclusion)

​यह भाग उस माँ के आखिरी त्याग को दर्शाता है जो अपने बच्चों को रोता हुआ नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए उसने 'इलाज' का एक छोटा सा झूठ बोला। राधिका का वह आत्मविश्वास रीना की सबसे बड़ी जीत थी, लेकिन उस जीत की कीमत रीना को अपनी जान देकर चुकानी थी। यह एक विदाई नहीं, बल्कि एक मासूम कंधे पर पूरी दुनिया का बोझ सौंपने की रस्म थी।

आज का मज़बूत सवाल (The Strong Question)

"क्या राधिका का वह 'अस्पताल टिफिन भेजने का वादा' उसके जीवन का सबसे बड़ा इंतज़ार बन जाएगा, या यह उसे माँ की गैर-मौजूदगी में टूटने से बचाएगा?"

​या फिर: "जब राधिका को उस 'झूठ' की हकीकत पता चलेगी, तो क्या वह अपनी माँ को माफ़ कर पाएगी या वह खुद को उम्र भर के लिए अकेला महसूस करेगी?"


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