भाग 14: बचपन की यादें: माँ की पहली बीमारी और वो सन्नाटा
Radhika’s Diary: Part 14 (A Mother’s Grace and a Forced Compromise)
A mother’s heart is a vast ocean of forgiveness, but it is often anchored by the weight of societal helplessness.
Reena was lost in the memories of the day Govind came to the mansion to take her back. She remembered how she had moved away in silence as soon as he entered. When Govind brought the children inside, he faced Reena’s mother. He immediately touched her feet and pleaded, "Ma, please forgive me. I made a grave mistake. I should have never raised my hand; it will never happen again."
The mother remained silent. Her mind was haunted by the image of Govind beating her daughter like an animal. How could a mother, who raised her child with such love, easily forgive her daughter's tormentor? Her heart was breaking, but for the sake of the children’s future and social standing, she had to swallow her pain. Parents are generous, but when it comes to their children’s happiness, they often become helpless before circumstances.
Govind, sensing the tension, sat on the swing outside. Radhika and Sahil joined him, insisting on swinging. Seeing their innocence, Govind's guilt deepened. He approached Reena and asked softly, "Reena, can I get a glass of water?" Despite her wounds, Reena felt the sting of her husband being ignored for three hours. A wife, no matter how hurt, often finds it hard to see her husband humiliated. She suppressed her emotions and brought him water. Govind held his ears in repentance, "Reena, I swear I will never touch you again. The house isn't a home without you; I haven't even gone to the shop in a month." Reena knew the children's school was starting; she had no choice but to return.
The mother, having overheard everything, called everyone for a meal. She wanted Reena to stay longer, but Reena insisted on leaving for the sake of the kids' education. Seeing Reena limping and still in pain, the mother made a firm decision: "Reena, if you must go, I am coming with you. I won't let you go alone until you are fully recovered." Surprisingly, Govind agreed immediately, "That’s fine, Ma. Please come with us."
यह भाग पढ़कर दिल भर आया। एक माँ का अपनी बेटी के गुनहगार को सिर्फ इसलिए माफ कर देना (या चुप रह जाना) क्योंकि उसे अपनी बेटी का घर उजड़ते हुए नहीं देखना—यही वह 'विवश समझौता' है जो करोड़ों भारतीय माँएं हर रोज़ करती हैं।
माँ का रीना के साथ जाने का फैसला इस कहानी का सबसे बड़ा 'मोमेंट' है। यह न सिर्फ रीना को सुरक्षा देगा, बल्कि गोविंद पर एक मानसिक दबाव भी बनाए रखेगा। अब हवेली की ममता उस शहर के घर में प्रवेश कर रही है।
माँ का साथ जाना रीना के लिए एक 'ढाल' की तरह है। लेकिन अब असली परीक्षा शुरू होगी। जब ये सब वापस उस घर पहुँचेंगे, जहाँ पुरानी कड़वाहट की दीवारें खड़ी हैं, तो क्या माँ की मौजूदगी गोविंद को सच में सुधार देगी?
अगले भाग (भाग-15) के लिए मेरा सवाल:
जब माँ उस घर में पहुँचीं, तो उन्होंने घर की कमान कैसे संभाली? क्या गोविंद के शराबी दोस्तों ने फिर से दस्तक दी, और माँ ने उन्हें कैसे जवाब दिया?
(राधिका की डायरी) भाग 14: माँ की ममता और एक विवश समझौता
रीना देवी अपनी मायके की यादों में खोई हुई थीं। उन्हें रह-रहकर वह मंज़र याद आ रहा था जब गोविंद उन्हें लेने हवेली आए थे। उस दिन गोविंद चुपचाप खड़े थे और रीना बिना कुछ बोले वहां से हट गई थीं। जब गोविंद बच्चों को लेकर अंदर आए, तो रीना की माँ सामने खड़ी थीं। गोविंद ने तुरंत माँ के पैर छुए और हाथ जोड़कर माफी मांगी, "माँ, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे रीना पर हाथ नहीं उठाना चाहिए था, आगे से ऐसा कभी नहीं होगा।"
माँ चुप रहीं। उनकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था जब गोविंद जानवरों की तरह रीना को पीट रहा था। जिस माँ ने अपनी बेटी को बड़े लाड़-प्यार से पाला हो, उसकी रग-रग से वाकिफ़ हो, वह अपनी बेटी के गुनहगार को इतनी आसानी से कैसे माफ कर सकती थी? माँ का करेजा तो फट रहा था, पर समाज और बच्चों के भविष्य की खातिर उन्हें घूँट पीना पड़ा। माँ-बाप बड़े उदार होते हैं, पर जब बात बच्चों की खुशियों की हो, तो वे हालात के हाथों मजबूर हो जाते हैं। रीना का घर उजाड़ना उन्हें सही नहीं लगा, इसलिए उन्होंने खामोश रहकर ही सब सह लिया।
गोविंद को लगा कि अभी चुप रहना ही ठीक है, इसलिए वह बाहर झूले पर जाकर बैठ गए। राधिका और साहिल भी आकर उनके पास बैठ गए और झूला झूलने की ज़िद करने लगे। बच्चों की मासूमियत देखकर गोविंद को अपनी गलती का और एहसास हुआ। वह सोचने लगा कि ऐसा क्या करे कि रीना और माँ का गुस्सा ठंडा हो जाए। वह उठकर रीना के पास गया और बोला, "रीना, क्या एक गिलास पानी मिलेगा?"
रीना को एहसास हुआ कि तीन घंटे हो गए पर किसी ने उन्हें पानी तक नहीं पूछा। कोई भी पत्नी हो, पति का अपमान उसे भी चुभता है, भले ही पति की गलती कितनी ही बड़ी क्यों न हो। रीना ने अपने मन को मारकर पानी लाया और गोविंद को दिया। गोविंद ने पानी पीते हुए फिर से कान पकड़ लिए, "रीना, मुझे माफ कर दो। मैं कसम खाता हूँ कि आज के बाद कभी हाथ नहीं उठाऊँगा। तुम्हारे बिना घर घर नहीं लगता, मैं एक महीने से दुकान भी नहीं जा पाया हूँ।" रीना खामोश रही। उसे पता था कि बच्चों की छुट्टियाँ खत्म हो रही हैं और उनके स्कूल के लिए उसे जाना ही होगा।
माँ ने सब सुन लिया था। उन्होंने सबको खाने के लिए बुलाया। माँ चाहती थीं कि रीना रुक जाए, पर रीना ने कहा, "माँ, कल से बच्चों का स्कूल है, आज ही जाना होगा।" माँ का दिल बैठ रहा था। रीना के घाव अभी ताज़ा थे, वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। माँ जानती थी कि घर जाकर फिर वही काम का बोझ होगा और गोविंद शायद फिर अपनी पुरानी आदतों पर उतर आए।
तभी माँ ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने दृढ़ता से कहा, "रीना, तुम जाना चाहती हो तो जाओ, पर मैं तुम्हें अकेले नहीं जाने दूँगी। जब तक तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती, मैं तुम्हारे साथ रहूँगी।" गोविंद ने मना नहीं किया और बोला, "ठीक है माँ, आप भी साथ चलिए
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