​भाग 71 =✍️ पोस्ट 71: 'तीन दिन की भूख और अत्याचार का फल: पत्नी का अंतिम कर्तव्य'

 



राधिका जी, आपके 'भूख और अकेलेपन' के इस दर्द को दर्शाती तस्वीर:

​इस तस्वीर में राधिका को अपने घर के बाहर सीढ़ियों पर बैठा दिखाया गया है, जहाँ वह एक बच्चे से समोसे लेने के लिए पैसे दे रही है। उसके चेहरे पर गहरी उदासी और भूख की झलक है, जबकि पृष्ठभूमि में घर का दरवाज़ा बंद है, जो अपनों की उपेक्षा का प्रतीक है।

यह कहानी का सबसे मर्मस्पर्शी और पीड़ादायक भाग है। राशि या राधिका के कर्तव्य, उपेक्षा, और भावनात्मक अभाव को बहुत ही सजीवता से चित्रित किया है। इस भाग में पत्नी की धार्मिक आस्था और पति के अत्याचारों के बीच का भयानक विरोधाभास सामने आया है।

💥 Title: Three Days of Hunger, Years of Cruelty: A Wife’s Unyielding Duty

Part 1: The Echo of Emptiness

​Radhika sat in a daze, her mind reeling with fears for her children. Would they still have the protective 'awe' their father's presence commanded? Now, orphaned of a father and with a distant mother, would they retain their dignity? The looming question of her 18-year-old son's future education, amidst a hostile in-laws' family (save for his grandmother), weighed heavily on her.

Part 2: The Cruelty of Kin and the Ache of Hunger

​In a society where a widow cannot cook, Radhika found herself starving for three days. Her family, just 5 km away, never brought her food. They called, asking if she'd like to eat, but no one offered the loving gesture of a forced morsel. Her own sister came, but left after making tea for herself, without offering food. Overwhelmed by hunger, Radhika, breaking social norms, gave 20 rupees to a passing boy for samosas—her first meal in four days. The pain of hunger, coupled with family's neglect, etched itself deeper than any joy could.

Part 3: The Fruit of Cruelty and Unwavering Duty

​As she waited for the body, Radhika reflected on her husband's lonely death—a stark consequence of his actions. She remembered the unspeakable cruelties: being locked up and beaten like an animal, being urinated upon, cleaning his human waste more often than her children's. Her solah somvar vrat (16 Mondays fast) for his well-being was always met with brutal beatings—with sticks, shoes, slippers, ropes, even an axe. She had tried every possible honest effort to save her home, even offering to work and sustain him if he only stopped the abuse. All her dreams of a loving husband and a simple happy life lay shattered. The thought of wearing a large mangalsutra now mocked her fate, as she was destined to wear the robes of a widow. "God, what wrong did I do?" was a constant, unanswered question in her mind.

🔥 Impactful Questions for Your Readers (Hindi Translation Included):

राधिका के इस हृदयविदारक संघर्ष पर अपनी राय दें:

  1. "अत्याचारों के बावजूद, राधिका ने एक पत्नी के रूप में अपने कर्तव्य क्यों नहीं छोड़े, बच्चों के लिए या सिंदूर की शक्ति में अटूट विश्वास के लिए?" (Despite the abuse, why did Radhika not abandon her duties as a wife? Was it for the children, or an unwavering belief in the power of Sindoor?)
  2. "तीन दिन तक भूख में रहने के बाद, क्या अपनों की उपेक्षा ने राधिका के मन में कड़वाहट भर दी होगी, या उनकी आत्मा अब भी क्षमा कर सकती है?" (After three days of hunger, did the neglect of her family fill Radhika's heart with bitterness, or can her soul still forgive?)
  3. "क्या राधिका के सपने, जैसे एक बड़ा मंगलसूत्र पहनना या प्यार पाने का अधिकार, अब उसकी विधवा अवस्था में भी पूरे हो सकते हैं?" (Can Radhika's dreams, like wearing a large Mangalsutra or finding love, still be fulfilled in her widowhood?)


✍️ पोस्ट 71: 'तीन दिन की भूख और अत्याचार का फल: पत्नी का अंतिम कर्तव्य'

​🌟 जीवन ज्योति आयुर्वेदा: पोस्ट 71

राधिका की कहानी (भाग 17): 'सिंदूर की आड़' टूटी, भूख का एहसास और एकाकीपन

​राधिका अब अपने घर पर बैठी सुन्न पड़ी हुई थी। उसके दिमाग में हज़ारों ख़याल आ रहे थे और जा रहे थे।

  • बच्चों का भविष्य: अब क्या होगा? बच्चों को वही लाड़-प्यार मिलेगा जो उनके पापा के ज़िंदा रहने पर मिलता था? क्योंकि उनके पापा बहुत ज़िद्दी और झगड़ालू थे और कोई भी उनके बच्चों को कुछ बोल नहीं सकता था। बच्चों को एक आड़ थी, उनके सामने कोई एक हाथ भी नहीं लगा सकता था बच्चों को।
  • बच्चों की इज़्ज़त: क्या वही इज़्ज़त मिलेगी बच्चों को जो उनके पापा के पास रहने से मिलती थी? अब तो उसके बच्चे अनाथ हो गए थे—माँ बच्चों से दूर थी और वह इंसान भी दुनिया से गुज़र चुका था!
  • अकेलापन: बेटी 14 साल की थी और बेटा 18 साल का। बेटे की 12वीं की परीक्षा अभी हुई थी, अब आगे की पढ़ाई कैसे होगी? राधिका के ससुराल में फ़िलहाल आठ लोग रहते थे, पर उन आठ लोगों में से कोई भी मेरे बेटे की भलाई नहीं चाहता था, सिवाय उसकी दादी के।

तीन दिन की भूख और उपेक्षा

​यहाँ पूरे मोहल्ले को पता था कि राधिका के हस्बैंड की मृत्यु हो गई है। ऐसी स्थिति में राधिका अपने घर में भी ख़ुद से कुछ बनाकर नहीं खा सकती थी

​राधिका का घर उसके मम्मी-पापा के घर से महज़ 5 किलोमीटर दूर था, पर फिर भी उसके लिए किसी ने खाना लेकर नहीं आए। फ़ोन लगाकर पूछते थे कि, "खाना लाए, खाओगी?" जिसका पति मर गया हो, वह ख़ुद से बोलेगा कि, "हाँ हम खाएँगे, लाओ।" उस समय तो लोग ज़बरदस्ती प्यार से मुँह में कौर डालते हैं।

​राधिका को तीन दिन हो गए थे—जिस दिन वह हेडक्वार्टर से निकली थी, उस दिन भी सुबह निकल गई थी कि दोपहर में कहीं पर नाश्ता कर लेगी, लेकिन उसको ऐसी ख़बर मिल गई कि वह कुछ नहीं खाई। रात भर अपने माँ-बाप के यहाँ रुकी, फिर भी कुछ नहीं खाई। कल का दिन पूरा बीत गया, आज का दिन भी पूरा बीत गया, लेकिन उसके पेट में दाना नहीं गया। जब वह बना ही नहीं सकती थी, तो खाती क्या!

​उसकी बहन एक दिन देखने के लिए आई, लेकिन उसने भी नहीं सोचा कि मैं दो रोटी बनाकर ले आऊँ। और उल्टे, हाथ धोकर आती है, "तेरी चाय बनाऊँ? कुछ खाएगी?" राधिका के जिगर का दूध इस्तेमाल करके उसने चाय बनाई, पर उसने न खाना बनाया न लाई।

​चाय पिलाकर कुछ समय के बाद चली गई। राधिका को जो दुःख था, वह तो था, लेकिन ऊपर से अब उसे भूख का एहसास हो रहा था। पर वह खाना बनाकर खा नहीं सकती थी।

​वह बाहर गेट पर बैठ गई, आने-जाने वालों को देखने लगी। वहाँ से एक लड़का गुज़रा। उसने उस लड़के को ₹20 दिए और कहा, "बेटे, मेरे लिए समोसे ला दो।" उसने बड़े ध्यान से मुझे देखा, पता नहीं क्या सोचा, पर कुछ नहीं बोला और पैसे लेकर चला गया। थोड़ी देर बाद समोसे लाकर दिए। राधिका ने चार दिन के बाद आज कुछ खाया था।

सुख का कोई भी काम किया हुआ इंसान भूल जाता है, लेकिन दुख में दिया गया दर्द इंसान जीवन भर नहीं भूलता।


अत्याचार का फल और पत्नी का कर्तव्य

​भूखे-प्यासे रोते हुए ही वह दिन निकल रही थी। अभी कुछ निश्चित नहीं हुआ था कि पार्थिव शरीर कब आएगा।

​आज वही बात सोच रही थी कि, देखो, उसकी मृत्यु कैसी हुई! अंत समय में जब लोगों को अपने लोगों की ज़रूरत होती है, उस समय उस इंसान के पास कोई नहीं था। यह कहीं न कहीं उन अत्याचारों का फल था जो उसने राधिका के ऊपर किए थे।

  • ​उसने कई बार राधिका को कमरे में बंद करके जानवरों की तरह मारा था, उसके ऊपर बाथरूम तक की थी
  • ​उसने बच्चों की गंदगी साफ़ करने से ज़्यादा, अपने पति के लेट-बाथ साफ़ करी थी
  • ​वह नौ दिन उपवास रहती थी (नवरात्रि), और जब पूजा करने का समय आता था और अपने कमरे में जाकर देखती थी, तो पूरे बिस्तर पर बाथरूम होता था। कहाँ की पूजा, कहाँ का पाठ! बिस्तर धोकर और घर को ले-बाथ करके पूजा करने के काम में जुट जाती थी। और ऐसे ही उसकी उपवास का उद्यापन हुआ करता था।
  • ​वह 16 सोमवार का व्रत रखती थी अपने पति को अच्छा करने के लिए। जितने सोमवार उपवास रहती थी, उतने सोमवार उसका पति उसको डंडे, जूते, चप्पल, रस्सी, कुल्हाड़ी—जो मिलता, उसी से मारता। एक भी उपवास उसने सुकून से, प्यार से, सम्मान से नहीं काटा।
  • ​ऐसी कोई मन्नत, ऐसा कोई व्रत, ऐसा कोई मंदिर नहीं बचा जहाँ पर उसने अपने पति के स्वभाव अच्छा होने के लिए मन्नत न माँगी हो, दुआ न माँगी हो।

​भले उसकी उम्र चाहे जो भी रही हो, भले ही वह कितना भी दारू पीता रहा हो, लेकिन राधिका ने हमेशा एक पत्नी के रूप में अपना कर्तव्य निभाया था, क्योंकि वह उनके बच्चों की माँ थी और वह इंसान उन बच्चों के बाप थे। उसने हर कोशिश की थी उनके साथ अपने जीवन यापन करने की—हर एक मुमकिन और ईमानदार कोशिश। वह नहीं चाहती थी कि वह अपना घर-गृहस्थी को आग लगाए या छोड़ दे। वह उनके साथ भी ख़ुशी-ख़ुशी रहने को तैयार थी। उसने ख़ुद उससे कह भी दिया था कि, "तुम दारू पीना छोड़ दो, मुझे मारना-पीटना छोड़ दो। मैं बनी-मज़दूरी करके तुमको पाल लूँगी और ख़ुश रहूँगी।" यह राधिका ने सच्चे दिल से कहा था, और वह उसके साथ अपना पूरा जीवन काट भी देती सिर्फ़ बच्चों के लिए।

​वैसे भी तो वह अकेले पूरा जीवन काट ही रही थी बच्चों के लिए। वह पति के लिए भी अपना जीवन पूरा काट देती, लेकिन जब उसके हाथ में सम्मान पर वार हुआ तो क्या करती? उसे अपने पति के जीवन काल का एक पल ऐसा याद नहीं है जिस पल में उसने प्यार से बात की हो या उसमें कहीं एक अंश भी प्यार रहा हो।

​दूसरे के पति को, दूसरे के बच्चों को देखकर राधिका के सीने पर कई बार साँप लोटते थे कि, "काश मेरा पति भी ऐसा होता—मेरा ख़याल रखने वाला, प्यार करने वाला, मेरे बच्चों का ख़याल रखने वाला, मेरे बच्चों को गोद में खिलाने वाला, घर में सब्ज़ी-राशन लाने वाला होता।" क्या यह सपने ग़लत थे राधिका के? एक लड़की के इतने छोटे-छोटे सपने तो होते हैं, लेकिन ये सपने भी राधिका के पूरे नहीं हुए।

​बड़ा मंगलसूत्र पहनने का जो एक सपना देखा था उसने कि, "मैं पैसा कमाकर बड़ा मंगलसूत्र लूँगी," लेकिन बड़ा मंगलसूत्र पहनने से पहले ही उसकी विधवा का चोला पहनने की नौबत आ गई।

​हमेशा उसके दिमाग़ में एक सवाल चलता था कि, "भगवान, मैंने ऐसी कौन सी ग़लती की है जिसकी सज़ा मुझे दे रहे हो? क्या मुझे ख़ुश रहने का अधिकार नहीं है? क्या मुझे किसी का प्यार पाने का अधिकार नहीं है? क्या मैं एक साधारण इंसान की तरह ज़िंदगी नहीं जी सकती?" हज़ारों सवाल राधिका के दिमाग़ में हमेशा चलते रहते थे, लेकिन जवाब में सिर्फ़ जीरो आता था।

​इस भाग में इतना ही। आगे की कहानी जानेंगे अगले भाग में।

​🖋️ निष्कर्ष और कॉमेंट्स के लिए सवाल

निष्कर्ष (Conclusion): राधिका का दर्द केवल पति की मृत्यु का नहीं है, बल्कि उसके पूरे जीवन के अत्याचारों, उपवासों की उपेक्षा, और भूख में भी अपनों से मिले अकेलेपन का है। तीन दिन तक परिवार द्वारा खाना न दिया जाना समाज की उस क्रूर वास्तविकता को दिखाता है जहाँ एक सक्षम स्त्री को भी दुःख में अकेला छोड़ दिया जाता है। राधिका अपने बच्चों के बेहतर भविष्य और अपने टूटे हुए सपनों की कीमत पर भी, अपने पति के लिए कर्तव्यनिष्ठ थी। अब जब डेड बॉडी आने का इंतज़ार है, राधिका के लिए यह अंतिम संस्कार केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अत्याचारों के एक युग का अंत होगा।

आपसे सवाल और कॉमेंट्स के लिए अनुरोध:

  1. ​राधिका ने भूख में भी समोसे क्यों माँगे? क्या वह जानबूझकर यह दिखाना चाहती थी कि अब वह सामाजिक बंधनों (जो खाना नहीं बनाने देते) से थक चुकी है?
  2. ​पति द्वारा किए गए उन भयानक अत्याचारों (बाथरूम करना, पूजा में मारना) के बावजूद भी राधिका ने उसका कर्तव्य क्यों नहीं छोड़ा? क्या यह केवल बच्चों के लिए था, या सिंदूर की शक्ति में उसका अटूट विश्वास था?
  3. ​आपको क्या लगता है, राधिका के बच्चों को क्या वही इज़्ज़त और आड़ अब मिलेगी, जो उनके पिता के कारण मिलती थी?

कृपया कॉमेंट्स में अपनी राय दें!

​🛠️ नए स्क्रीनशॉट्स पर ध्यान (New Screenshots Analysis)

​आपने जो नया स्क्रीनशॉट (1000071278.jpg) भेजा है, वह आपके शानदार काम को दिखाता है:

  • 71 पोस्ट: यह अविश्वसनीय है! आपने इतनी मेहनत से 71 भाग पूरे किए हैं।
  • 165 व्यूज़: आपके ब्लॉग पर कुल 165 व्यूज़ आ चुके हैं, और 'Today' (आज) के 45 व्यूज़ यह दिखाते हैं कि पाठक आपकी कहानी को खोज रहे हैं और उसमें रुचि ले रहे हैं। यह एक बहुत ही सकारात्मक संकेत है!

​💔 71वीं पोस्ट पर ध्यान (The Story Draft)

​मैंने अभी-अभी आपके द्वारा भेजे गए 71वीं पोस्ट के ड्राफ्ट को ध्यान से पढ़ा है (जिसे मैंने पिछले उत्तर में पोस्ट 71 के रूप में सुधार दिया था)।

​आपकी बात सही है, मैंने पोस्ट 71 को सुधार दिया, लेकिन मैंने आपके नए स्क्रीनशॉट पर टिप्पणी नहीं की।

​71वीं पोस्ट का मुख्य बिंदु: कर्तव्य का दर्द



राधिका जी, आपके 'भूख और अकेलेपन' के इस दर्द को दर्शाती तस्वीर:

​इस तस्वीर में राधिका को अपने घर के बाहर सीढ़ियों पर बैठा दिखाया गया है, जहाँ वह एक बच्चे से समोसे लेने के लिए पैसे दे रही है। उसके चेहरे पर गहरी उदासी और भूख की झलक है, जबकि पृष्ठभूमि में घर का दरवाज़ा बंद है, जो अपनों की उपेक्षा का प्रतीक है।

यह पोस्ट हृदय विदारक है, और यह राधिका के चरित्र के सबसे बड़े विरोधाभास को उजागर करती है:

  • अकेलापन: तीन दिन तक भूखा रहना और परिवार (माँ-बाप, बहन) द्वारा कोई खाना न लाना, समाज और अपनों की क्रूर उपेक्षा को दिखाता है।
  • कर्तव्य: पति के भयानक अत्याचारों (कमरे में बंद करके मारना, बाथरूम करना) के बावजूद, राधिका ने एक पत्नी के रूप में अपना कर्तव्य कभी नहीं छोड़ा, यहाँ तक कि उसके अच्छे स्वभाव के लिए व्रत भी रखे।
  • समोसा: भूख के कारण समाज के 'चूल्हा न जलाने' के नियम को तोड़कर एक लड़के से समोसा मंगाना, राधिका के अंदर की आत्मनिर्भरता और थकान को दर्शाता है।

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