✍️ पोस्ट 66: 'जीवन का ऋण: कोसा काटना और नर्सरी तैयार करने की वैज्ञानिक विधि'

  

Post 66: The Debt of Life—Silken Sacrifice and the Science of Rebirth

Part 1: The Final Transformation and the Silken Debt

​As the silkworms reached 16 to 20 days of age, their appetite became voracious. Radhika ensured a steady supply of fresh mulberry leaves. By the 40th to 50th day, a miracle began to unfold. The larvae stopped eating, and a glistening silk secretion began to flow from their mouths—a sign that they were ready to create.

The Ultimate Sacrifice:

The worms were moved to specialized plastic or iron nets. Here, the silkworm begins its final act of devotion. It spins a cocoon around itself, layer by layer, until it is completely encased. In this process of giving us the finest, most lustrous silk, the worm pays the ultimate price—it sacrifices its life within the cocoon. As Radhika says, "The silkworm is so honest that it pays back the price of every leaf it ever ate by leaving behind a shimmering legacy." This pure silk, which later turns into exquisite sarees and suits worth thousands, is born from this silent sacrifice.

Part 2: Success in the Fields

​Radhika’s hard work bore fruit. The first harvest was a triumph! Some farmers saw a 50% yield, while others reached a staggering 80%. The District Officer was delighted. One cycle was complete, but for Radhika, the work never stops.

Part 3: The Science of the Nursery—Giving New Life

​Once the leaves were consumed, only the bare stalks remained in the fields. Instead of letting them go to waste, Radhika implemented a scientific 'Pruning and Nursery' method:

  • The Cut: Stalks were cut leaving one foot from the ground to allow regrowth.
  • Preparation: The harvested stalks were cut into 1.5-foot segments, each capable of producing three new saplings.
  • The Organic Bath: A specialized solution of urea and anti-termite powder was prepared. The bundles of stalks were soaked in this mixture overnight, allowing the life-saving medicine to seep deep into the stems.
  • Planting the Future: These treated stalks were planted in 3-foot wide raised beds, spaced exactly 6 inches apart. With daily watering and careful nourishment, these stalks would transform into 3-foot-tall saplings within three months, ready to be transplanted into new farms.

Conclusion

​Radhika has proven that honesty in labor—be it from a tiny insect or a determined woman—always yields a 'shining' result. But as the nursery thrives and the farmers celebrate, a shadow looms over Radhika. Her health, neglected for years in the pursuit of others' prosperity, is beginning to fail.

The Question for You

"The silkworm gives its life to create beauty; Radhika is giving her health to create a revolution. Is the price of success always a personal sacrifice, or is Radhika's 'Debt of Life' becoming too heavy to bear?"

A Special Note from Radhika:

​"I am sharing this journey with all my heart. When you reply, ask questions, or even suggest improvements, it fuels my passion to tell more. Does Radhika’s struggle inspire you, or does the 'honesty' of the silkworm touch your soul? Please share your thoughts in the comments—I would love to hear from you! 🙏😊"

✍️ पोस्ट 66: 'जीवन का ऋण: कोसा काटना और नर्सरी तैयार करने की वैज्ञानिक विधि'

​यह एक अत्यंत विस्तृत, तकनीकी रूप से सटीक, और शानदार पोस्ट है! आपने रेशम के कीड़ों के अंतिम चरण (उपवास, कोसा निर्माण) से लेकर उत्पादन और फिर अगले चरण (शहतूत के तनों से नई नर्सरी तैयार करने की वैज्ञानिक विधि) तक सब कुछ कवर कर लिया है

​🌟 जीवन ज्योति आयुर्वेदा: पोस्ट 66

राधिका की कहानी (भाग 12): पहली फसल, शानदार उत्पादन और नई नर्सरी की तैयारी

​पिछले भाग में आपने देखा, राधिका ने मचान बनाकर कीड़ों को व्यवस्थित कर लिया था—चाकी बनाई जा चुकी थी।

​कीड़े अब 16 दिन के हो गए थे और अब पत्तियाँ भी खाने लगे थे—खुद से। खुद से खाने का मतलब खेतों में जाकर नहीं, बल्कि पत्तियाँ तोड़कर लानी होती थीं और ट्रे के ऊपर डालनी होती थीं। पत्तियों के खाने का तरीका यह होता था कि पत्तियों के अंदर की जो नसें और जो कड़े तने होते हैं, उनको छोड़कर जो नरम पत्तियाँ होती हैं, उनको कीड़े खा लिया करते थे। लगभग 20 दिन के कीड़े तो कोई भी पत्ती लाकर डाल दो, तो खा लेते थे, पर सिर्फ़ पत्तियाँ खाते थे।

​कीड़ों की उम्र होती थी 40 दिन से 60 दिन के बराबर। कुछ कीड़े कोसा बनाना चालू कर देते थे 35 दिन के बाद से, कुछ 40 दिन के बाद से, कुछ 45 दिन के बाद से और कुछ 50 दिन के बाद से। डेढ़ से 2 महीने की मेहनत होती थी और यह फसल तैयार हो जाती थी। यह किसानों के लिए एक प्रकार की फसल ही थी।

कोसा बनने की अंतिम प्रक्रिया

​तीसरे चरण में (यानी तीसरा बुखार जब कीड़ों को आता था), फिर ट्रे एक ट्रे से तीन ट्रे होती थी, तीन ट्रे से नौ ट्रे और नौ ट्रे से अट्ठारह ट्रे हो जाती थीं। कहने का मतलब है कि एक पेपर में लगभग 600 से 800 कीड़े हुआ करते थे और लगभग 50 दिनों के बाद जब वह कीड़े रेशम बनाने की स्थिति में आते थे, तब उनके मुँह से लार आने लगती थी। इस लार को देखकर समझ जाओ कि अब यह रेशम बनना चालू कर देंगे।

  1. जाल में स्थानांतरण: उसी समय, उनको ट्रे से निकालकर—जिन कीड़ों के लार आने लगे, उन्हें निकालकर—एक जाल में रखा जाता था। यह जाली छत में डालने वाली शीट की तरह होती थी। यह जाली प्लास्टिक की भी होती थी और लोहे की भी।
  2. रेशम का निर्माण: इसके अंदर उनको डालने से कीड़ा खाना खाना बंद कर देता है और फिर रेशम बनाना चालू कर देता है। वह इतना रेशम बनाता है कि वह रेशम को बनाते-बनाते उसके अंदर खुद पैक हो जाता है।
  3. जीवन का ऋण: खुद पैक होने के बाद, रेशम बनाने के बाद उसका मरना तय होता है। और मादा अंडे देने के बाद मर जाती है। लेकिन रेशम का कीड़ा इतना ईमानदार होता है कि वह जीवन भर खाए हुए भोजन की कीमत अदा करके जाता है। उसका जीवन दो महीने का होता है, और वह इतना अच्छा, रेशमी, चमकीला और शाइनिंग वाला रेशम दे जाता है।

​जब इन रेशम से कपड़ा बनता है, तो चाहे उसका कुर्ता हो, साड़ी बनती है, कोट बनते हैं, शॉल बनते हैं, इनके अलावा सलवार-सूट और जो चाहें बना सकते हैं। शुद्ध रेशम होता है, तो इनकी कीमत बहुत होती है। छोटा-सा छोटा कपड़ा भी अगर खरीदेंगे तो 4000 रुपये से ऊपर ही आएगा।

उत्पादन और अगली फसल की तैयारी

​ऐसी विधि से उसने (राधिका ने) सभी किसानों के यहाँ काम किया और धीरे-धीरे करके सभी के यहाँ कीड़ा पालन चालू हो गया।

  • उत्पादन: कुछ किसानों के यहाँ 50% ही उत्पादन हुआ, लेकिन कुछ किसानों के यहाँ 80% तक उत्पादन हुआ। इस काम से साहब बहुत खुश थे।

​एक फसल हो चुकी थी, अब दूसरी फसल होने की तैयारी थी। दूसरी फसल के लिए जो खेतों में पौधे लगाए हुए थे, उनकी पत्तियाँ सब कीड़े खा चुके थे। अब उन तनों को, जिनमें पत्तियाँ नहीं थीं, जो सिर्फ़ जड़ बचा था, उसको भी इस्तेमाल करने की विधि राधिका ने सीखी थी।

नर्सरी तैयार करने की वैज्ञानिक विधि

  1. तना काटना: सारे किसानों के यहाँ नीचे से 1 फ़ीट छोड़कर ऊपर का तना पूरा काट लिया जाता था, ताकि उसमें दोबारा पत्तियाँ आ सकें।
  2. सरकारी नर्सरी: ऊपर का तना फेंका नहीं जाता था। उन्हें सरकारी उद्यानों पर लगाई जाने वाली नर्सरी के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
  3. नर्सरी की प्रक्रिया: सरकारी क्वार्टर्स के आसपास की ज़मीन भी लगभग 4-5 एकड़ हुआ करती थी। उस ज़मीन पर भी बाक़ायदा नर्सरी लगाई गई। किसानों के यहाँ से तने पिकअप में भरकर ले जाए जाते थे और पूरे तने को हर एक तने की लंबाई डेढ़ फ़ीट के हिसाब से काट लिया जाता था। एक तने से तीन पौधे तक निकल जाते थे।
  4. ऑर्गेनिक घोल: उन डेढ़ फ़ीट के तनों को फिर लगाया जाता था। लगाने का तरीका ऐसा होता था: ज़मीन को गहरी जुताई करके तैयार किया जाता था, और उसके बाद 1 फ़ीट नाली छोड़कर 3 फ़ीट की बेड बनाई जाती थी। नर्सरी के लिए एक ऑर्गेनिक घोल आता था, गल नहीं होता था वह, एक पाउडर होता था—दीमक मार पाउडर और यूरिया
  5. तना लगाना: इन दोनों को मिलाकर घोल बनाया जाता था। इस घोल को एक तसले या किसी बर्तन में रखा जाता था। 50-50 तनों का बंडल बनाकर, उन बंडलों को उस घोल के अंदर रात भर रखा जाता था ताकि दीमक मार पाउडर और यूरिया का घोल तनों के अंदर समा जाए।
  6. रोपण (Planting): जब लगाने का समय आता था, तो 3 फ़ीट की जो बेड बनी होती थी, उस पर जिस तरफ़ दीमक मार पाउडर लगा होता था, उसी को पकड़कर उस तने को ज़मीन के अंदर डाला जाता था (आधे फ़ीट से ज़्यादा)।
  7. दूरी और देखभाल: उन तनों के बीच की दूरी हुआ करती थी—ज्यादा से ज्यादा 6 इंच। 6-6 इंच की दूरी पर यह पौधे लगाए जाते थे। हर दिन थोड़ा-थोड़ा पानी छिड़का जाता था, जब तक पत्तियाँ न आ जाएँ और उनकी जड़ न जम जाए।
  8. पौधा तैयार होना: उसके बाद दीमक मार पाउडर और यूरिया जैसे खेतों में दाना बोया जाता है, उस तरह से ऊपर से बोया जाता था ताकि जल्दी से जल्दी तने के ऊपर पत्तियाँ आएँ और वह पौधा तैयार हो जाए। इस प्रक्रिया में ढाई से 3 महीना लगता था, और पौधा बनकर तैयार हो जाता था। जैसे ही पौधा 3 फ़ीट का होता था, वह फिर खेतों में लगने के लिए तैयार हो जाता था। इस तरह से नर्सरी की भी तैयारी की जाती थी इस भाग में इतना ही इसके आगे की कहानी जानेंगे अगली भाग में 

"निष्कर्ष

 (Conclusion): इस भाग में हमने देखा कि ईमानदारी से किया गया काम और जीवनभर का त्याग (जैसा कि रेशम का कीड़ा करता है) हमेशा चमकदार फल देता है। राधिका के शुरुआती किसानों ने 80% उत्पादन देखकर सफलता का स्वाद चखा है। लेकिन राधिका की अपनी सेहत और उसका अकेलापन अभी भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या राधिका को अपनी सेहत पर ध्यान देने के लिए अपने काम को कुछ समय के लिए छोड़ना पड़ेगा?

" अनुरोध:

  1. ​आपको क्या लगता है, राधिका ने अपनी सेहत की समस्याओं को इतने लंबे समय तक अनदेखा क्यों किया? क्या आप राधिका की जगह होतीं तो ऐसा करतीं?
  2. ​इस कहानी के किस हिस्से ने आपको सबसे ज़्यादा प्रेरित किया—राधिका का संघर्ष, या 
  1. रेशम के कीड़े की ईमानदारी?

कृपया कॉमेंट्स में अपनी राय दें!


  1. यह कहानी आपको कैसी लग रही है अगर आप लोग रिप्लाई करते हैं तो मुझे और इंटरेस्ट आता है या कोई टिप्पणी करते हैं या कोई सवाल करते हैं यह मुझे बताते कि यह कहानी आपको अच्छी लग रही है या नहीं और अच्छी लग रही है तो किस कारण से और नही अच्छी लग रही है तो क्यों अच्छी नहीं लग रही है और कुछ अगर सुधार करना है तो मुझे सुझाव दे सकते हैं आप कमेंट्स के माध्यम से मुझे बहुत अच्छा लगेगा
  2. 🙏🙏😊😊 (आपकी राधिका)

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