टूटी नहीं लगन: 16,000 से लेबर, और बच्चों की गाली
इस फोटो में राधिका का वही चिर-परिचित चेहरा है, लेकिन इस बार चेहरे पर धूल और पसीना है। सिर पर एक मजदूर वाली चुनरी बंधी है, और हाथों में बच्चों के लिए लाए हुए उन रंग-बिरंगे खिलौनों या कपड़ों का पैकेट है। आँखों में वही 'मास्टरमाइंड' वाला तेज है, पर साथ ही एक गहरी टीस (Pain) भी है।
💥 Title: From Corporate Leader to Laborer: The Agony of a Mother’s Gift
Back to Ground Zero
After leaving the job that had become her pride, Radhika found herself standing at the crossroads of survival once again. The journey from ₹2,800 to ₹16,000 had felt like a dream, a promise that her wandering days were over. But destiny had other plans. Having worshipped her work as a duty, the loss was not just financial—it was emotional.
Choosing Hard Labor over Lost Dignity
Radhika needed money for rent and food, but she refused to wash dishes in someone's house. Instead, she chose the grueling path of manual labor. She began working at construction sites—carrying bricks, mixing mortar, and lifting gravel. She even worked as a helper for wedding caterers. From leading 46 girls in an office to being a 'laborer' on the streets, her life had taken a brutal turn.
Gifts Bought with Sweat, Received with Insults
After eight days of back-breaking labor, she took her earnings and rushed to see her children. She bought clothes and shoes for her son, and a frock and bangles for her daughter. But her motherly love was met with stabs of cruelty. Every time she went to see them, she returned not with a hug, but with verbal abuse and insults. She would walk back home in tears, wondering what more life wanted to extract from her soul.
🔥 Impactful Question for Your Readers
"Radhika broke her back lifting stones just to buy her children gifts, only to be insulted in return. Is there any pain greater than a mother being hated by the very children she is dying to protect? How does one find the strength to keep going after such a heartbreak?"
"टूटी नहीं लगन: 16,000 से लेबर, और बच्चों की गाली"
भाग 1: वापस शून्य पर
नौकरी छोड़ने के बाद, राधिका की स्थिति फिर वही से वही हो गई थी—वह फिर सोच में थी कि अब क्या करे।
डेढ़ साल उसने इस नौकरी को किया था। ₹2800 से लेकर ₹16,000 की पेमेंट तक पहुँचना उसके लिए अविश्वसनीय अचीवमेंट था। उसे लग रहा था कि शायद अब उसे भटकना नहीं पड़ेगा, अब वह इस नौकरी में लंबे समय तक काम कर पाएगी। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था।
राधिका को उस नौकरी को छोड़ने का थोड़ा दुख तो था ही, क्योंकि उसने उस काम को अपना कर्तव्य समझकर किया था, उसकी पूजा की थी। अब उसे फिर नए काम की तलाश में भिड़ना पड़ा।
भाग 2: आत्म-सम्मान की क़ीमत—सड़क पर मज़दूरी
राधिका ने सोचा कि फ़िलहाल जो काम मिले, उसे कर लिया जाए। उसने बर्तन माँजने जैसा काम गवारा नहीं किया।
"बर्तन माँजने से तो अच्छा था कि सड़क में काम कर ले।"
पेट में कुछ दाना डालना था, रूम का किराया देना था, घर चलना था, तो कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता था। राधिका अब लेबर का काम करने लगी:
- ईंट-गारा: घर बनाने में जो लेबर लगती है, वह काम उसने शुरू कर दिया।
- खानसामे की मदद: शादियों में खाना बनाने वाले मिस्त्री होते हैं, उन्हें हेल्प के लिए एक लेबर की ज़रूरत पड़ती है, वह वह काम भी वह करती थी।
- मज़दूरी: लेबर का काम करने लगी, यहाँ तक कि गिट्टी डालने लगी।
ऐसी हालत दोबारा आएगी, यह उसने सोचा नहीं था। लेकिन प्रकृति को जो मंजूर था, वही किया। धीरे-धीरे जीवन-यापन हो रहा था।
भाग 3: बच्चों से मिलना और गाली खाकर लौटना
आठ दिन काम करने के बाद जब राधिका को पेमेंट मिला, तो वह तुरंत बच्चों को देखने गई।
- वह अपने बेटे के लिए कपड़े, जूते और बेटी के लिए फ्रॉक, चूड़ी, कंगन—यह सब लेकर गई।
- लेकिन जब वह देखने जाती थी, तभी देखकर तो आती थी, पर गाली भी खाकर आती थी!
- वह रोते हुए घर आ जाती थी।
राधिका सोचती थी कि पता नहीं उसके जीवन में क्या था, और क्या देखना था उसे!
💬 पोस्ट का निष्कर्ष
"₹16,000 की कमाई से वापस मज़दूरी पर लौटना राधिका के संघर्ष का सबसे कड़वा सच था। बच्चों से मिलने पर मिली गाली ने उसके ज़ख्मों को और गहरा कर दिया। अब इस दर्द और अपमान के बीच राधिका अपनी 'जीवन ज्योति' को कैसे स्थापित करेगी? देखते हैं अगले भाग में.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
"आपकी राय मेरे लिए अनमोल है, कृपया अपने विचार साझा करें।" यह लोगों को कमेंट करने के लिए प्रोत्साहित (Encourage) करता है।