पोस्ट 65: 'शुद्धता का व्रत और रेशम कीटों का पहला जन्म'

  


Post 65: The Sacred Vow—Raising Silk 'Infants' with Purity and Science

Part 1: The Sanctuary of Purity

​The construction was complete, and the 'Chaki' (rearing stands) were ready. Radhika brought the silkworm eggs to the three pioneering farmers. To manage efficiently, she gathered them at one location to demonstrate the meticulous setup. The room wasn't just a workspace; it was treated like a temple.

The Code of Conduct:

  • Sanitization: Every plastic tray was scrubbed with soap and disinfected with a bleaching solution for two days until perfectly dry.
  • Sacred Rules: No one could enter without bathing. Tobacco and cigarettes were strictly forbidden. Even footwear was left outside to prevent contamination.
  • The Law of Purity: Following traditional beliefs and the need for extreme hygiene, women (including Radhika) would not enter the room during their menstrual cycle, as it was believed the delicate eggs could perish.

Part 2: Welcoming the Newborns

​The eggs required consistent warmth to hatch, provided by 500-watt bulbs. Once the tiny larvae emerged, they were treated with the tenderness given to a newborn baby.

  • The First Meal: Just as a baby cannot eat solid food, these tiny creatures couldn't chew tough leaves. Radhika ensured only the softest, topmost mulberry shoots were hand-picked and finely chopped.
  • The Bedding: Trays were lined with double layers of newspaper. The newborns didn't "eat" yet; they merely sucked the juice from the finely minced leaves spread across their beds.

Part 3: The 'Fast' and the 'Sanjeevani'

​As the silkworms grew, they underwent a fascinating biological process—a 24-hour fast (Upaas).

  • The Feverish Transformation: Before every major growth spurt, the worms would stop eating. Their mouths would swell, and they would develop a fever.
  • The Healing Touch: During this "fast," Radhika applied a 'Sanjeevani' (life-giving) medicine—much like Janma-Ghutti for infants. A fine dusting of lime powder was used to cool their bodies and break the fever.

Part 4: Multiplication and Growth

​After the first 8-day fast, the tiny ant-sized creatures grew into small larvae. Their space requirements tripled.

  • The Expansion: One tray soon became three, and eventually, three became nine.
  • Cleaning the Cradle: Their waste, resembling fine tea leaves, had to be cleared regularly. Radhika used a clever technique—placing fresh leaves and paper on top so the worms would climb up, allowing the old waste underneath to be discarded.

​Slowly but surely, the once-empty room began to hum with the sound of thousands of tiny lives growing under Radhika’s watchful eyes.

Conclusion

​Radhika had successfully navigated the delicate first phase of silkworm rearing, blending ancient traditions of purity with modern agricultural science. The eggs had turned into living, breathing creatures. But the real challenge was just beginning—as the worms grew larger, so did their appetite and the risk of disease.

The Question for You

"In an era of fast-paced farming, can the ancient 'Vow of Purity' and the patience of a mother be the secret ingredients to a revolutionary harvest?"

पोस्ट 65: 'शुद्धता का व्रत और रेशम कीटों का पहला जन्म' 

इस पोस्ट की मुख्य ताकतें:

  1. पवित्रता और नियम: महिलाओं का मासिक धर्म के दौरान कमरे में प्रवेश न करना, गुटखा-तंबाकू पर प्रतिबंध, और नहा-धोकर ही प्रवेश करना—यह सब भारतीय संस्कृति में पवित्रता के महत्त्व को दिखाता है, जो पाठकों को गहराई से जोड़ेगा।
  2. वैज्ञानिक प्रक्रिया: ट्रे की सफ़ाई (ब्लीचिंग घोल), पत्तियों का आहार (दूध पिलाने जैसा), व्रत (उपवास), और 'संजीवनी' दवा का उपयोग—यह सब दिखाता है कि राधिका एक अनुभवी और वैज्ञानिक कार्यकर्त्ता है।
  3. विकास का चरण: व्रत के बाद कीड़े के मुँह पर सूजन आना और एक ट्रे का तीन ट्रे में बदलना—यह सब जानकारी कहानी को अत्यधिक प्रामाणिक बनाती है।

🌟 जीवन ज्योति आयुर्वेदा: पोस्ट 65

राधिका की कहानी व्रत, संजीवनी और रेशम के बच्चों का पालन

अब राधिका अंडे लेकर उन तीन किसानों के यहाँ गईं जहाँ भवन निर्माण हो चुका था और चाकी (मचान) की व्यवस्था बन चुकी थी। तीनों जगह एक साथ जाना तो पॉसिबल नहीं था, इसलिए दो किसानों को तीसरे किसान के यहाँ बुला लिया। एक किसान के यहाँ उसने सामने खड़े होकर काम कराया और दो किसानों को समझाया कि इस तरह से चाकी बनाना है।

कीट पालन की प्रारंभिक तैयारी

राधिका ने सबसे पहले तो दो दिन पहले ही सभी को बता दिया था। ट्रे हुआ करती थीं—प्लास्टिक की, जालीदार, मोटी-मोटी, जो एक थाली की तरह होती थी, लगभग दो से ढाई इंच की ऊँचाई, दो फ़ीट चौड़ी और तीन फ़ीट के क़रीब लंबी।

ट्रे की सफ़ाई: उन्होंने ब्लीचिंग का घोल बनाकर ट्रे को पूरी तरह से अच्छे से साफ़ करवा लिया था। अच्छे से निरमा साबुन से धुलवा लिया था किसानों से। और उसके बाद ब्लीचिंग वाला पाउडर जो होता है, उसको पानी में पतला घोलकर सारी ट्रे में छिड़काव करवा दिया था। दो दिन में ट्रे पूरी तरह से ब्लीचिंग के पाउडर को सोख चुकी थी और पूरी तरह से सूख चुकी थी—यानी कि अब तैयार थी कि उसमें कीड़े डाल सकते थे।

ट्रे में बिस्तर: लेकिन सीधे उसके अंदर हम कीड़े नहीं डाल सकते थे, क्योंकि यह जालीदार ट्रे थी। ट्रे के ऊपर न्यूज़पेपर डबल बिछाया जाता था।

पहला आहार: उसके ऊपर जो शहतूत की पत्तियाँ होती थीं, बिल्कुल नाज़ुक-नाज़ुक पत्तियाँ, जो झाड़ की सबसे ऊपर की फूँक होती है, वह वाली पत्तियाँ छाँटकर लाई जाती थीं। जैसे छोटा बच्चा जब जन्म लेता है तो वह दूध अपने से नहीं पी सकता, माँ उसको खुद से पिलाती है—ऐसे ही कोमल-कोमल पत्तियों को छाँटकर लाया जाता था और उसको एकदम बारीक काटा जाता था।

भोजन का कारण: उस समय जो अंडों से कीड़े निकलते थे, वह पत्तियों को खाते नहीं थे, सिर्फ़ उनका रस चूसते थे। तो पहले कटी हुई, बिल्कुल छोटी-छोटी, पतली-पतली पत्तियाँ न्यूज़पेपर के ऊपर बिछा दी जाती थीं।

वह चाकी तब तक रहती थी जब तक कि बच्चा कीट खुद से ही अपना भोजन न करने लगे।

अंडों से कीट निकलने की विधि

अंडों से कीटों को बाहर निकालने के लिए उन्हें गर्माहट चाहिए होती थी, जिसके लिए 500 वॉट का बल्ब जलाया जाता था। इसी गर्माहट के बाद अंडों से कीट बाहर निकलना शुरू होते थे।

कमरे के नियम: उस कमरे में जाने की इजाज़त सिर्फ़ नहा-धोकर ही होती थी। कोई गुटखा-तंबाकू वाला उस कमरे में नहीं जा सकता था।

कीटों की सुरक्षा और नियम

उसके ऊपर जो अंडों वाला पेपर आता था, तो एक ट्रे में सिर्फ़ एक पेपर ही जाता था। पेपर डालने के बाद उसके ऊपर फिर पत्तियाँ बिल्कुल छोटी-छोटी, बारीक-बारीक बिछा दी जाती थीं। इसी तरह से जितनी भी मचान बनी थीं, उनके ऊपर सबसे ऊपर वाली खंड (मचान) में रखा जाता था उनको, ताकि थोड़ी गर्माहट भी मिले और नीचे से कोई कीड़ा या चींटी कोई न चढ़े।

कमरे के नियम: उस कमरे में जाने की इजाज़त सिर्फ़ नहा-धोकर ही होती थी। कोई गुटखा-तंबाकू वाला उस कमरे में नहीं जा सकता था।

पवित्रता: कभी कोई चप्पल पहनकर उस कमरे में नहीं जा सकता था। बाहर मिट्टी से आया हुआ व्यक्ति उसे कमरे में नहीं जा सकता था। और तो और, महिलाएँ (राधिका समेत) जब मासिक धर्म से होती थीं तो 5 दिन तक उस कमरे के अंदर नहीं जाती थीं। यह उन अंडों के पालने का नियम था, क्योंकि ऐसी औरत का उनके ऊपर परछाई पड़ने से ही अंडे मर जाते थे। बहुत ही पवित्रता से उनको पाला जाता था।

कीटों का विकास और व्रत

इसी तरह तीनों किसानों के यहाँ चाकी बनाई गई।

इन कीड़ों की एक खासियत और होती थी: जब वह रेशम बनाने के मोड पर आते थे, तब तक अंडे से उस मोड तक वह तीन बार व्रत रखते थे (उपवास रहते थे)। उस दिन वह कुछ भी नहीं खाते थे।

उपवास का उपचार: जब उनका उपवास हुआ करता था, उस उपवास के समय में उनके ऊपर संजीवनी जैसी दवा (जैसे हम छोटे बच्चों को जन्मघुट्टी पिलाते हैं) डालनी पड़ती थी। जब उनको बुखार आता था, उसके ऊपर से एकदम पाउडर वाला चूना डाला जाता था, जिससे उनका बुखार कम होता था।

रूप-परिवर्तन: 24 घंटे बुखार में रहने के बाद (यानी व्रत में रहने के बाद) फिर वह खाना खाते थे। जब वह व्रत से उठते थे और जब वह खाना चालू करते थे, तो उनका एक और रूप आता था सामने। उनके मुँह पर सूजन आ जाती थी। यह एक प्रकार से उनकी बड़े होने की कोशिश होती थी।

ट्रे बदलना:

पहला व्रत वह 8 दिन के बाद रखते थे। 8 दिन के बाद तक वह काफी मतलब एक छोटी सी चींटी के बराबर निकलते थे और 8 दिन में दाने (ईल्ली) के बराबर हो जाते थे। उन्हें ज़्यादा जगह चाहिए होती थी, तो एक ट्रे से तीन ट्रे में बदलाव होता था।

वह जो लैट्रिन करते थे, वह चाय पत्ती की तरह होती थी, बड़ी-बारीक। तो उसके ऊपर पत्तियाँ डालकर, फिर धीरे से पेपर बिछाकर, फिर पत्तियाँ डालकर—वह जब कीड़े उसके ऊपर चढ़ जाते थे, तब फिर वह पट्टी वाले पेपर को उठाकर दूसरे ट्रे में डाला जाता था, और नीचे जो कचरा होता था उसको फेंक दिया जाता था।

ऐसे हर चार (या आठ) दिन में उनका साफ़ करना पड़ता था। 8 दिन के बाद एक ट्रे से तीन ट्रे, और फिर दूसरे 8 दिन के बाद तीन ट्रे से नौ ट्रे हो जाती थीं। सबसे छोटे कीड़े होते थे तो ऊपर रखते थे, फिर जब ट्रे बढ़ती थीं तो नीचे वाली मचान, फिर और नीचे वाली मचान, फिर और नीचे वाली मचान—पूरा कमरा भर जाता था।

आज के लिए इतना ही। आगे का भाग जानते हैं अगले भाग में।



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