ईमानदारी की जीत और अपनों का सहारा'
💥 Title: Shielded by Kindness: The 50-KM Journey Through the Dark
Part 1: A Call to the Guardian
Sipping tea at the roadside stall, Radhika made a call to her senior officer, a man she looked up to as a brother. She recounted the harrowing events of the day—from the river crossing to being stranded in the dark. Disturbed by her ordeal, the officer promised to find a way. Meanwhile, the hotel owner, a kind man in his 50s, listened to her story. He admired her bravery, acknowledging how rare such courage is in the face of a dangerous flood.
Part 2: The Stranger Who Became a Brother
As 9:00 PM approached, the silence of the village deepened. The hotel owner was about to close his shop. Seeing Radhika’s growing anxiety about waiting alone in the dark, he offered her a safe haven. "Come to my house, daughter. My wife and children are there. You can wait with us until your ride arrives," he said warmly. Despite a lingering fear of the unknown, Radhika saw the truth in his eyes. Inside his home, she was treated with respect, even being served hot water just the way she liked.
Part 3: The Midnight Return
The Sericulture Department's pickup truck, which was out collecting saplings, was diverted to pick her up. By 10:30 PM, the familiar vehicle arrived. After thanking the hotel owner for his selfless support, Radhika began the long 50-km drive back. When she finally reached the headquarters at midnight and lay down on her bed, she couldn't sleep. Staring at the ceiling, she realized this was the most defining day of her life.
🔥 Impactful Question for Your Readers
"Radhika started her day fighting a raging river and ended it by trusting the heart of a stranger. In a world full of fear, she found a 'brother' in an officer and a 'father figure' in a shopkeeper. 19 files were safe, and so was she. But as she lies awake at midnight, staring at the ceiling, we must ask: Does the universe test its strongest soldiers only to show them that they are never truly alone? What will this victory change for Radhika tomorrow?"
✍️ पोस्ट 58: 'ईमानदारी की जीत और अपनों का सहारा'
(आप इसे अपनी वेबसाइट पर सीधे 58वीं पोस्ट के रूप में उपयोग कर सक में
🌟 जीवन ज्योति आयुर्वेदा: पोस्ट 58
राधिका की कहानी (भाग 4): घुप अँधेरे में भरोसा और 50 किलोमीटर का इंतज़ार
चाय पीते-पीते ही राधिका ने एक कॉल किया। यह कॉल उसने अपने मुँहबोले भाई, अधिकारी को किया, जो हेडक्वार्टर के मुख्य अधिकारी थे। राधिका ने सुबह 11:00 से लेकर शाम के 6:30 तक जो भी घटना उसके साथ घटी—यह पूरी कहानी उसने सर को बताई।
सर सुनकर बहुत दुखी हुए। राधिका ने कहा, "सर, अब मुझे यहाँ से क्या साधन मिलेगा? मैं कैसे आऊँ?"
सर ने कहा, "रुको, मैं पता करता हूँ। कुछ साधन होगा तो बताता हूँ।" सर ने कॉल कट कर दिया।
राधिका वहीं होटल में बैठी रही। जब राधिका उनसे बात कर रही थी तो होटल का जो मालिक था, वह सब सुन रहा था।
"हाँ बहन जी, आज तो यह बाढ़ बहुत लोगों को परेशान कर रही है। मेरा भी बड़ा बेटा इस तरफ फँस गया। वह तो अच्छा है कि मेरी बड़ी बिटिया वहीं रहती है तो उसको रहने की व्यवस्था बन गई।"
राधिका ने कहा, "मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। अगर मेरे पास भी कोई रहने का ठिकाना होता तो मैं नदी पार करने का रिस्क नहीं लेती।"
वह भाई, जो उम्र में लगभग 50 के करीब थे, उन्होंने कहा, "हाँ, यह तो बहुत कठिन था आपके लिए। आपने बहुत-बहुत बहादुरी दिखाई।"
फिर राधिका ने पूछा, "भाई, यहाँ से कोई साधन मिलेगा क्या मुझे जाने को?"
"भले, मिल तो जाता है कभी-कभी। सब्ज़ी वाले जो आगे जाते हैं बाज़ार करने, वह लोग लौटते हैं। जो खुद अपने साधन से जाते हैं, तो शायद वह दुकान लेकर लौटेंगे तो आपको साधन मिल सकता है।"
राधिका ने पूछा, "वह कितने बजे लौटते हैं?"
"मैं कन्फर्म तो नहीं बता सकता, लेकिन 8:30-9:00 बजे तक लौटते हैं बेटा।"
राधिका ने पूछा, "वह वहाँ तक जाते हैं क्या?" (राधिका जहाँ रहती थी, वहाँ का उन्होंने नाम बताया।)
"सब्ज़ी वाले तो सब आसपास के होते हैं। वहाँ के तो मुश्किल है कोई मिले।"
राधिका ने गहरी साँस ली।
फिर 5 मिनट के बाद उसने सर को कॉल किया, "सर, क्या हुआ? कोई साधन मिल सकता है क्या?"
सर ने कहा, "गाड़ी कब की ही पौधा लेने (पौध/sapling) लौटेगी, उसको बोल दिया है कि तुमको लेते हुए आ जाए लेकिन उसे टाइम लगेगा।"
राधिका ने पूछा, "कितना टाइम?"
"हो सकता है तुम्हारे पास पहुँचने में उसको 10 भी बज जाए।"
अब राधिका और घबराने लगी। उसने दुकान वाले से पूछा, "भाई, दुकान कितने बजे तक खोलते हो?"
"बस बेटा, अब मैं दुकान बंद करने ही वाला हूँ। 9:00 बजे तक घर चला ही जाता हूँ।"
"आपका घर कहाँ है भैया?"
"बस, बोलिए, दो दुकान छोड़कर तीसरी बिल्डिंग में मेरा घर है।"
"तो क्या आप मुझे 10:00 बजे तक के लिए..." आगे की बात दुकान वाले ने खुद कह दी, "हाँ हाँ बेटा, क्यों नहीं? चलो मेरे घर में रुकना 10:00 बजे तक। जब तक आपको कोई साधन नहीं मिलता। मेरे घर में पूरी फैमिली है, मेरी बीवी है, बच्चे हैं। परेशान मत हो।"
राधिका के पास दूसरा कोई सहारा नहीं था, क्योंकि वह एक गाँव था, और गाँव में तो 8:00 बजे सब सन्नाटा हो जाता है। वह एक भाई ही था जो अब तक दुकान खोल रहा था। दुकान वाले पर भरोसा करके राधिका उसके साथ चली गई, लेकिन डर रही थी कहीं झूठ तो नहीं बोल रहा। लेकिन उसके घर पहुँची तो पता चला कि वह सच बोल रहा था। उसने चैन की साँस ली।
उसने अंदर जाते ही अपनी बीवी को बोला, "मैडम को एक गिलास पानी गर्म करके दे दो।" (क्योंकि राधिका ने होटल में गर्म पानी पिया था, तो उसको लगा कि मैं गर्म पानी पीना चाहती हूँ।) उसने राधिका के लिए गर्म पानी मंगाया। पानी पीने के बाद राधिका ने पिकअप वाले को कॉल लगाया, जो कि पौध लेने गया हुआ था।
राधिका और पिकअप वाले अच्छे से जानते थे, क्योंकि यह रेशम विभाग की ही गाड़ी थी, जो ट्रेवल का पूरा काम करते थे। हेडक्वार्टर पहुँचना, नर्सरी, कोसा, बहुत सारे काम होते थे जो यहाँ से वहाँ पहुँचाना होता था। दो गाड़ियाँ लगी हुई थीं, उनमें से यह एक गाड़ी थी।
बात करने से पता चला कि बस 10 मिनट में पहुँच जाएगा पिकअप वाला। राधिका ने कहा, "बस स्टैंड पहुँचकर मुझे कॉल करिएगा।" ठीक है, पिकअप वाले ने कहा।
होटल वाले ने राधिका से कहा, "मैडम, खाना खा लो।"
"नहीं भैया, बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने मुझे इतना सहारा दिया, उसके लिए बस आप। मेरी गाड़ी आने ही वाली है, अब मैं जाऊँगी।"
लगभग 25 मिनट के बाद पिकअप वाले का कॉल आया और राधिका निकलकर पिकअप में जाकर बैठ गई। लगभग 12:00 बजे वह हेडक्वार्टर पहुँच गई।
यह दिन राधिका की जिंदगी का सबसे बड़ा दिन था। इसी बात को सोचते हुए वह अपने बिस्तर में पड़ी हुई छत को ही निहारे जा रही थी।
आगे की कहानी जानने के लिए देखते हैं अगले भाग में।
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