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राधिका की डायरी ​घर वापसी, आंसुओं का सैलाब और एक बेटे का आख़िरी फ़ैसला

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  राधिका की डायरी ​ घर वापसी, आंसुओं का सैलाब और एक बेटे का आख़िरी फ़ैसला ​रात के ठीक ८:०० बजे मैं बस में बैठ गई। गाड़ी अच्छी और आरामदायक थी, कहने को तो वह एक लग्ज़री बस थी जहाँ इंसान आराम से सो सकता था। लेकिन उस भयानक हादसे का मेरे दिमाग पर इतना गहरा असर पड़ा था कि मेरी आँखों से नींद और चैन पूरी तरह उड़ चुके थे। जब भी आँखें बंद करती, वही बस का पहिया और अपनी थमी हुई साँसें याद आ जातीं। ९-१० घंटे का वह लंबा, डरावना और कशमकश से भरा सफर काटते हुए सुबह के ठीक ५:३० बजे मैं अपने शहर पहुँची। ​बस स्टैंड पहुँचते ही मैंने अपने बेटे को कॉल किया, वह पहले से ही वहाँ मेरा इंतज़ार कर रहा था। सुबह की हल्की धूप में अपने बेटे का चेहरा देखते ही मेरी आँखों में आँसू छलक आए। मन किया कि दौड़कर उसके गले लग जाऊँ और जी भरकर रो लूँ। लेकिन मैंने बड़ी मुश्किल से अपने जज्बात पर काबू रखा, आँसुओं को अंदर ही समेटा और चुपचाप उसके साथ घर के लिए निकल गई। घर पहुँचकर मैंने ज़िंदगी की सबसे लंबी और चैन की साँस ली। बेटे ने बिना कुछ पूछे आदर से पानी लाकर दिया और सफर की थकान के कारण वह खुद सोने चला गया। मैंने भी थोड़ा आर...

राधिका की डायरी ​अकेलापन, अनकहे आँसू और एक माँ का डर

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  राधिका की डायरी में ​ अकेलापन, अनकहे आँसू और एक माँ का डर ​शाम के ठीक ६:४० बजे मैं बस स्टैंड पहुँच चुकी थी। ८:०० बजे की बस के लिए अभी मेरे पास काफी वक्त था। घबराहट और कमजोरी के कारण पैर काँप रहे थे, इसलिए मैं वहीं पास की एक ट्रैवल एजेंसी की दुकान पर बैठ गई और अपनी टिकट कटवा ली। मुझे बदहवास देखकर एजेंसी के मालिक ने सहूलियत के लहजे में कहा, "मैडम, यह बस रास्ते में कहीं भी खाना खाने के लिए नहीं रुकेगी। आपके पास अभी काफी समय है, आप चाहें तो पास से कुछ खाकर आ सकती हैं।" ​उसने तो सीधे मन से कहा था, लेकिन मेरे भीतर तो विचारों का एक ऐसा बवंडर चल रहा था जहाँ भूख-प्यास की कोई जगह ही नहीं थी। मेरे दिमाग में एक के बाद एक हजारों खौफनाक ख्याल आ रहे थे और जा रहे थे। मैं सोच रही थी कि जो भयानक हादसा आज टल गया, अगर वह सच हो जाता तो क्या होता? अगर आज मुझे कुछ हो जाता, तो मेरे बच्चों का क्या होता? उन्हें इस पहाड़ी इलाके में कैसे पता चलता? मेरा बेटा क्या करता, मेरी बेटी कैसे संभालती? उनकी ज़िंदगी कैसी हो जाती? और अगर मैं मरती नहीं, बल्कि उम्र भर के लिए अपाहिज हो जाती, तो इस मतलबी दुनिया में ...

राधिका की डायरी ​हादसे के बाद: टूटती साँसें, अपनों की आवाज़ और वो खौफनाक मंजर

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  राधिका की डायरी ​ हादसे के बाद: टूटती साँसें, अपनों की आवाज़ और वो खौफनाक मंजर ​उस खौफनाक हादसे के बाद, मैं पूरी तरह से अंदर तक डर चुकी थी। मेरी छाती में धड़कनें इतनी तेज चल रही थीं, मानो कोई अंदर हथौड़ा चला रहा हो। डर का वह कंपन मेरी रग-रग में, शरीर के हर एक हिस्से में साफ़ महसूस हो रहा था; मेरी धमनियों में जैसे खून का नहीं, बल्कि एक भयानक तूफान दौड़ रहा था। ​सड़क पर देखते ही देखते लोगों की एक भारी भीड़ इकट्ठा हो गई। बिना पूरी बात जाने, लोग उस लड़के (पंडित जी के बेटे) को भला-बुरा कहने लगे और उस पर गुस्सा उतारने लगे। लेकिन मेरी स्थिति ऐसी थी कि मैं न तो पूरी तरह बेहोश हो पा रही थी और न ही पूरे होश में थी। मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। ऐसा लग रहा था मानो मैं अभी भी मौत के उस अंधेरे मुँह में ही बैठी हूँ। वहाँ खड़ी कुछ सहृदय महिलाओं ने आगे बढ़कर मुझे सहारा दिया और पकड़कर उठाया। कुछ पुरुषों ने नीचे गिरी मोटरसाइकिल और मेरे बैग्स को संभाला। लोग मुझे तसल्ली दे रहे थे, तभी भीड़ में से एक लड़का दौड़कर गया और मेरे लिए पानी लेकर आया। पानी के दो घूँट गले से नीच...

राधिका की डायरी ​मौत के पहियों के बीच: जब हौसले ने दी ज़िंदगी को नई उड़ान

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  राधिका की डायरी ​ मौत के पहियों के बीच: जब हौसले ने दी ज़िंदगी को नई उड़ान ​पंडित जी के कॉम्प्लेक्स से विदा लेने का समय आ चुका था। जाने से पहले मैंने पूरी श्रद्धा के साथ पंडित जी के पैर छुए। उन्होंने स्नेहपूर्वक मेरे सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद देते हुए कहा, "खूब तरक्की करो बेटी, तुम्हारा कल्याण हो! तुम समाज में एक बहुत बड़ा बदलाव ला रही हो।" उनका वह आशीर्वाद मेरे भीतर एक नई ऊर्जा भर गया। 50 किलोमीटर दूर मुख्य बस स्टैंड तक का सफर तय करना था और समय तेजी से भागा जा रहा था। मेरी सहूलियत को देखते हुए पंडित जी ने अपने बड़े बेटे को आवाज लगाई और मुझे मोटरसाइकिल से बस स्टैंड तक छोड़ने के लिए कहा। ​मेरे पास दो बैग थे—एक भारी बैग जिसमें मेरे कपड़े और जरूरत का सामान था, उसे मैंने अपनी पीठ पर संभाल लिया, और दूसरा बैग जिसमें मेरा सबसे कीमती औजार यानी मेरा लैपटॉप और बिजनेस की किताबें थीं, उसे आगे सुरक्षित रख दिया गया। मोटरसाइकिल पहाड़ी रास्तों को पार करते हुए आगे बढ़ रही थी। हवाएँ तेज थीं और मन में बस समय पर पहुँचने की कशमकश। ​अभी हम बस स्टैंड से कुछ ही दूरी पर थे कि अचानक सामने का मं...

राधिका की डायरी ​आख़िरी पड़ाव: समय के साथ दौड़ और नए संकल्प ​शिमला के उस बड़े सेमिनार हॉल से निकलने के बाद,

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  राधिका की डायरी ​ आख़िरी पड़ाव: समय के साथ दौड़ और नए संकल्प ​शिमला के उस बड़े सेमिनार हॉल से निकलने के बाद, मेरी व्यस्तता अभी ख़त्म नहीं हुई थी। मेरा अगला और आख़िरी पड़ाव था—पंडित जी का कॉम्प्लेक्स। वहाँ पहुँचते ही पंडित जी के छोटे भाइयों के साथ एक और छोटी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण मीटिंग तय हुई। यह मीटिंग ठीक वैसी ही थी जैसी अब तक होती आ रही थी—वही जाना-पहचाना प्रोडक्ट प्लान, बिजनेस प्लान, और कामयाबी के '4 Basics'। हालाँकि समय कम था, लेकिन वहाँ बैठे लोगों की उत्सुकता ने उस छोटी सी जगह को भी एक बड़े मंच में बदल दिया था। ​घड़ी की सुइयाँ लगातार टिक-टिक कर रही थीं। मुझे हर हाल में वहाँ से शाम 5:00 बजे निकलना था, क्योंकि मुझे आगे 50 किलोमीटर का सफर तय करके रात 8:00 बजे की मुख्य बस पकड़नी थी। घर लौटने की जल्दी और बिजनेस को सही अंजाम तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी के बीच एक अजीब सी दौड़ चल रही थी। मीटिंग समाप्त करते ही, मैंने कुछ ज़रूरी ब्रोशर पंडित जी के हाथों में थमाए और अपना विजिटिंग कार्ड उन्हें देते हुए कहा, "यह सिर्फ एक कार्ड नहीं, हमारे साथ की शुरुआत है।" अपने बैग को संभ...

राधिका की डायरी ​मंच से परे: श्रोताओं से लीडर्स बनने तक का सफर

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  राधिका की डायरी ​ मंच से परे: श्रोताओं से लीडर्स बनने तक का सफर ​जैसे ही मेरे आखिरी शब्दों की गूँज सेमिनार हॉल में शांत हुई, मैं सामने बैठे लोगों के चेहरों पर एक साफ़ बदलाव देख सकती थी। "शुरुआत कैसे करें" की उलझन अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी और उसकी जगह '4 Basics' की साफ़ समझ ने ले ली थी। 'ना' को एक अवसर में बदलने और अपनी डाउनलाइन को एक बच्चे की तरह संभालने वाले फॉर्मूले ने हर एक व्यक्ति के दिल को छू लिया था। ​जब मैं मंच से नीचे उतरी, तो तालियों की गड़गड़ाहट सिर्फ औपचारिकता नहीं थी; वह लोगों के अंदर जागे नए आत्मविश्वास की दहाड़ थी। डिस्ट्रीब्यूटर्स की एक बड़ी भीड़ ने तुरंत मुझे घेर लिया, उनकी आँखों में बड़े सपने थे और उनके हाथों में नोट्स से भरी डायरियाँ थीं। ​तीसरी रो से बहुत ध्यान से सुन रहे एक बुजुर्ग सज्जन भावुक आँखों के साथ मेरे पास आए। उन्होंने कहा, "राधिका जी, मैं एक साल से इस इंडस्ट्री में हूँ, लेकिन आज मुझे समझ आया कि मेरी टीम क्यों नहीं बढ़ रही थी। मैं सिर्फ लोगों को जोड़ रहा था, लेकिन मैं कभी वो ज़िम्मेदार 'अपलाइन' नहीं बन पाया जिसकी...

राधिका की डायरी ​कामयाबी के चार स्तंभ (4 Basics): एक डिस्ट्रीब्यूटर से लीडर बनने तक का सफर

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  राधिका की डायरी ​ कामयाबी के चार स्तंभ (4 Basics): एक डिस्ट्रीब्यूटर से लीडर बनने तक का सफर अब हम बात करेंगे फॉर बेसिक पर  अभी तक हमने समझा कि काम क्या करनाहै और उसमें क्या मिलेगा  अब हम समझेंगे कि इसकासिस्टम क्या है  हमने जॉइनिंग तो कर ली और यह भी जान लीजिए कि हमको क्या मिलेगा लेकिन अब क्या करें  1 पहला ऑप्शन है अभी आपके पास की आपके रिश्तेदारी में से आपके आसपास के लोगों में ऐसे जाने वाले भाषण और आपके स्ट्रेंज में से जितने भी लोग आपके आसपास हैं सब्जी वाला दूध वाला डॉक्टर सारे लोगों की एक लिस्ट बनाना है लिस्ट कितनी बड़ी होगी कामयाबी इतनी बड़ी होगी  2 दूसरा जो भी हमारी लिस्ट बनी हुई है उनके पास एक के बाद एक उनसे मिलने जाना है जैसा हमने आज प्लान देखा बिजनेस को समझा प्रोडक्ट को समझा वैसा ही उनको समझाना है जरूरी नहीं है कि 10 लोगों को समझाया 10 लोग आ जाएंगे नहीं नेगेटिव नहीं होना 10 में से हो सकता है पांच लोग आए हो सकता है चार लोग हो सकता है एक ही आई उसने अपने को टेंशन नहीं लेनी है no यानी नेक्स्ट लोग ना सुन के टूट जाते हो गया बात खत्म अब नहीं होगा हमारा वजन ख...