राधिका की डायरी अकेलापन, अनकहे आँसू और एक माँ का डर
राधिका की डायरी में अकेलापन, अनकहे आँसू और एक माँ का डर शाम के ठीक ६:४० बजे मैं बस स्टैंड पहुँच चुकी थी। ८:०० बजे की बस के लिए अभी मेरे पास काफी वक्त था। घबराहट और कमजोरी के कारण पैर काँप रहे थे, इसलिए मैं वहीं पास की एक ट्रैवल एजेंसी की दुकान पर बैठ गई और अपनी टिकट कटवा ली। मुझे बदहवास देखकर एजेंसी के मालिक ने सहूलियत के लहजे में कहा, "मैडम, यह बस रास्ते में कहीं भी खाना खाने के लिए नहीं रुकेगी। आपके पास अभी काफी समय है, आप चाहें तो पास से कुछ खाकर आ सकती हैं।" उसने तो सीधे मन से कहा था, लेकिन मेरे भीतर तो विचारों का एक ऐसा बवंडर चल रहा था जहाँ भूख-प्यास की कोई जगह ही नहीं थी। मेरे दिमाग में एक के बाद एक हजारों खौफनाक ख्याल आ रहे थे और जा रहे थे। मैं सोच रही थी कि जो भयानक हादसा आज टल गया, अगर वह सच हो जाता तो क्या होता? अगर आज मुझे कुछ हो जाता, तो मेरे बच्चों का क्या होता? उन्हें इस पहाड़ी इलाके में कैसे पता चलता? मेरा बेटा क्या करता, मेरी बेटी कैसे संभालती? उनकी ज़िंदगी कैसी हो जाती? और अगर मैं मरती नहीं, बल्कि उम्र भर के लिए अपाहिज हो जाती, तो इस मतलबी दुनिया में ...