संदेश

​राधिका की डायरी: ममता की परीक्षा, अनहोनी का डर और एक माँ का अनकहा दर्द

चित्र
  ​राधिका की डायरी: ममता की परीक्षा, अनहोनी का डर और एक माँ का अनकहा दर्द ​बेटे के चले जाने के बाद, मैं कुछ देर के लिए अकेली बैठी रही। मन में एक अजीब सी हलचल और साथ ही एक गहरा संतोष भी महसूस हो रहा था। चलो, आखिरकार एक हफ़्ता गुज़र ही गया था। बाइक पूरी तरह सुधरकर वापस आ गई थी और बेटे ने दोबारा अपनी डिलीवरी बॉय की नौकरी भी शुरू कर दी थी। मेरे लिए सबसे बड़ी राहत और सुकून की बात यह थी कि मैंने अपनी तरफ से उस बाइक की पहली किस्त भी पूरी तरह चुका दी थी। रोज़मर्रा के घरेलू खर्चों को लेकर फिलहाल कोई बड़ी दिक्कत या आर्थिक तंगी सामने नहीं थी, यह सोचकर मेरे व्याकुल मन को थोड़ी तसल्ली मिली। ​तभी अचानक मेरी सोच का रुख मेरी प्यारी बेटी 'खुशी' की तरफ मुड़ गया। पिछले कुछ समय से उसके सालाना पेपर चल रहे थे। मैंने मन ही मन अंदाज़ा लगाया कि अब तक तो उसके सारे एग्जाम खत्म हो चुके होंगे। अब मुझे उसे वापस घर लाने के लिए लेने भी जाना था। मेरी बेटी अपनी बुआ के साथ रहती थी और वह हर साल गर्मियों की छुट्टियों में ही हमारे पास यहाँ आया करती थी। मैंने सोचा कि चलो अब समय हो गया है, उसे बुला लेती हूँ। लेकिन ...

राधिका की डायरी ​ममता का संतोष और बेटे की उड़ान / THE MOTHER'S JOY AND THE SON'S FLIGHT

चित्र
  राधिका की डायरी ​ममता का संतोष और बेटे की उड़ान / THE MOTHER'S JOY AND THE SON'S FLIGHT ​जब बेटे ने पेटी खोलकर देखा, तो उसमें ₹20,000 के नोट चमक रहे थे। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत पैसे निकाले और उन्हें अपनी उंगलियों पर गिनना शुरू कर दिया। नोटों को गिनते हुए बेटे के चेहरे पर एक ऐसी खुशी थी जो राधिका ने बहुत समय से नहीं देखी थी। बेटा पैसे गिनते हुए उत्साह से बोला, "मम्मी, इतने पैसे मैंने इस गाँव में एक साथ कभी नहीं देखे!" ​बेटे के मुंह से यह बात सुनकर राधिका की आँखों में आँसू छलक आए। वे आँसू दुख के नहीं, बल्कि एक माँ के संतोष के थे। अपने गहने खोने का दर्द उस वक्त बिल्कुल गायब हो गया जब उसने देखा कि उसका बेटा उन पैसों को गिनकर कितना खुश हो रहा था। पैसे गिनने के बाद बेटे ने उन्हें वापस संभालकर रख दिया और बोला, "सुबह इसमें से ₹15,000 लेकर जाऊंगा।" राधिका ने मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है बेटा।" ​अगली सुबह बेटा उठा और हमेशा की तरह पहले अपनी कंप्यूटर क्लास गया। दोपहर एक बजे जब वह क्लास से लौटा, तो उसने जल्दी-जल्दी खाना खाया और तुरंत अपनी ...

राधिका की डायरी ​माँ का आँचल और एक माँ का झूठ

चित्र
  राधिका की डायरी ​माँ का आँचल और एक माँ का झूठ ​राधिका को अच्छी तरह पता था कि सरकारी दफ्तरों के वादों पर भरोसा करना वैसा ही है जैसे सूखे में बारिश का इंतज़ार करना। पैसा तो आता, लेकिन तब नहीं जब घर की जरूरत या कोई मुसीबत सामने खड़ी हो। जब उसके भाई साहब 'पेमेंट बनवाता हूँ' कहकर चले गए, तो राधिका समझ गई कि अब उसे खुद ही कोई रास्ता निकालना होगा। ​अगले दिन, जैसे ही बेटा कंप्यूटर क्लास के लिए निकला, राधिका ने अपनी लोहे की पेटी खोली। पेटी में उसकी ज़िंदगी भर की जमापूंजी के नाम पर बस कुछ ही जेवर थे—एक छोटा सा सोने का हार, एक जोड़ी मोटी झुमकी और चांदी की पायल। राधिका ने भारी मन से लेकिन मजबूत हौसले के साथ पेटी से वो सोने की झुमकी निकाल ली, जो करीब एक तोले की थी। पेटी को वैसे ही बंद करके, झुमकी को अपने पर्स में छुपाया और वह घर से निकल पड़ी। ​सुनार की दुकान पर पहुंचकर उसने अपनी वो झुमकी २०,००० रुपये में गिरवी रख दी। यह कदम उठाना बहुत जरूरी था ताकि बाइक की मरम्मत के १५,००० रुपये और आने वाली ५,००० रुपये की किस्त का तुरंत इंतजाम हो सके। रही बात उसके घर के बाकी खर्चों की—जैसे कमरे का किर...

राधिका की डायरी: मर्यादा की कशमकश, रिश्तों की चाय और एक उम्मीद का दीया

चित्र
  राधिका की डायरी: मर्यादा की कशमकश, रिश्तों की चाय और एक उम्मीद का दीया ​फ़ोन रखने के बाद, मैं बड़ी बेसब्री से शाम का इंतज़ार करने लगी कि कब 'साहब' घर आएंगे। मेरे मन में कशमकश चल रही था, इसीलिए मैंने फ़ोन पर अपनी आर्थिक परेशानी या पैसों को लेकर कोई बात नहीं की थी। मैं चाहती थी कि जब वे घर आएँ, तो हम इत्मीनान से आमने-सामने बैठकर बात कर सकें। मेरे स्वाभिमान को यह बिल्कुल गंवारा नहीं था कि उन्हें ज़रा भी ऐसा लगे कि मैं केवल पैसे मांगने के लिए या किसी स्वार्थ के कारण उन्हें कॉल कर रही हूँ। आख़िर एक बहन होने के नाते मेरा इतना तो कर्तव्य और अधिकार बनता ही है कि मैं अपने भाई को अपने घर बुलाकर आदर-सत्कार कर सकूँ, उन्हें चाय-नाश्ता करा सकूँ। यही सब सोचते हुए राधिका अपनी उलझनों को दिल में दबाए बैठी थी। ​तभी घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई और मेरा बेटा कंप्यूटर क्लास से वापस आ गया। वह सुबह से पैदल गया था, इसलिए बुरी तरह थक चुका था। आते ही उसने थके हुए स्वर में कहा, "मम्मी, बहुत भूख लगी है, जल्दी से खाना दे दो।" मैंने तुरंत उसकी थाली सजाई और उसे प्यार से खाना परोस कर दिया। जब वह खा...

​राधिका की डायरी: मुश्किलों में हौसला, भाई का संबल और समझदारी की सीख

चित्र
  ​राधिका की डायरी: मुश्किलों में हौसला, भाई का संबल और समझदारी की सीख ​बाइक दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण हमारे सामने एक नई व्यावहारिक समस्या खड़ी हो गई थी। अब गाड़ी पूरी तरह बिगड़ चुकी थी, जिसकी वजह से मेरे बेटे को सुबह अपनी कंप्यूटर क्लास के लिए मजबूरन पैदल ही जाना पड़ा। सिर्फ इतना ही नहीं, जो डिलीवरी बॉय का काम उसने इतनी मेहनत और ज़िद से शुरू किया था, वह काम भी गाड़ी न होने के कारण पूरी तरह रुक गया था। घर में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। तभी अचानक मेरे बेटे ने अपनी आँखें झुकाए हुए बेहद ग्लानि भरे स्वर में मुझसे कहा, "मम्मी, मुझे और ज़्यादा देखकर गाड़ी चलानी चाहिए थी ना? मेरी ही गलती थी।" ​मैंने उसकी तरफ देखा, उसके मन में चल रहे पछतावे को महसूस किया और एक माँ की तरह प्यार से समझाते हुए कहा, "हाँ बेटा, बिल्कुल देखकर चलानी चाहिए। और सिर्फ देखकर ही नहीं, बल्कि रोड के सभी नियमों (Traffic Rules) का पूरी तरह पालन भी करना चाहिए। हमेशा याद रखो, जाने के समय अपनी लेफ्ट (बाएँ) की तरफ से जाना चाहिए और आने के समय हमेशा राइट (दाएँ) की तरफ से आना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि जब भ...

राधिका की डायरी: ममता की छांव, डर की विदाई और एक माँ की सीख

चित्र
  राधिका की डायरी: ममता की छांव, डर की विदाई और एक माँ की सीख ​जैसे ही राधिका उस दुर्घटना स्थल पर पहुँची, अपने बेटे को सही-सलामत देखकर मानों उसकी थमी हुई साँसें वापस लौट आईं। उसके पैरों तले से जो ज़मीन खिसक गई थी, वह अब स्थिर हो गई थी। बिना एक पल गंवाए, राधिका ने अपने बेटे को दौड़कर कसकर गले लगा लिया। उसका रोम-रोम फिक्र से भर गया था; उसने बेटे के हाथ, पैर, चेहरा—हर जगह छू-छूकर देखना शुरू कर दिया कि कहीं कोई गहरी चोट तो नहीं लगी, कहीं से खून तो नहीं बह रहा। ​लेकिन इन सबसे अलग, २१ साल का उसका जवान बेटा पूरी तरह काँप रहा था। यह काँपना चोट के कारण नहीं, बल्कि गहरे डर के कारण था। उसके दिमाग में बस यही बात घूम रही थी कि 'अभी-अभी तो बाइक की पहली किस्त भी पूरी नहीं हुई और मैंने गाड़ी तोड़ डाली। अब मम्मी बहुत गुस्सा होंगी, बहुत डांटेंगी।' उसका चेहरा अपराधबोध और डर से पीला पड़ गया था। ​तभी राधिका ने उस खौफनाक माहौल को अपने प्यार से शांत किया। उसने अपने बेटे को डांटने या गाड़ी टूटने का दोष देने के बजाय, बड़ी कोमलता और प्यार से कहा, "गाड़ी टूट गई तो टूट जाने दो बेटा, कोई बात नहीं। ...

​राधिका की डायरी: रिजेक्शन का सामना, अनहोनी की दस्तक और माँ का इम्तिहान

चित्र
​ राधिका की डायरी: रिजेक्शन का सामना, अनहोनी की दस्तक और माँ का इम्तिहान ​इसि तरहा धीरे-धीरे, कदम दर कदम हमारा काम आगे बढ़ता रहा। कहते हैं ना कि सफलता की राह कभी सीधी नहीं होती। इस लोकल फील्ड वर्क के दौरान कई बार मुझे बहुत उदास भी होना पड़ता था। फील्ड में हर रोज़ नए लोगों से मिलना और उनके सीधे 'रिजेक्शन' (अस्वीकृति) का सामना करना दिल को तोड़ देता था। लोग कभी बात नहीं सुनते थे, तो कभी बिना सुने ही मना कर देते थे। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने रिजेक्शन का एक नया मतलब निकाला—मेरे लिए 'No' (ना) का मतलब सिर्फ इनकार नहीं, बल्कि 'Next Opportunity' (अगला अवसर) था। मैं हर 'ना' को अगले कस्टमर तक पहुँचने की सीढ़ी समझकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ती रही। ​लेकिन ज़िंदगी जब एक तरफ संभल रही होती है, तो दूसरी तरफ से कोई न कोई बड़ी परीक्षा आपके सामने आकर खड़ी हो जाती है। ​वह एक आम दिन था, मैं अपने काम के सिलसिले में एक बेहद ज़रूरी मीटिंग में बैठी हुई थी। यह मीटिंग एक सरकारी अस्पताल के एक सम्मानित आयुर्वेदिक डॉक्टर के केबिन में चल रही थी। हम बहुत ही गंभीरता से अपने का...

राधिका की डायरी पहली कमाई की महक, ज़िम्मेदारियों का ताना-बाना और मुस्कुराता परिवार

चित्र
  राधिका की डायरी  पहली कमाई की महक, ज़िम्मेदारियों का ताना-बाना और मुस्कुराता परिवार ​आखिरकार, मेरे बेटे ने अपने जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत कर ही दी। उसकी दिनचर्या अब पूरी तरह बदल चुकी थी। सुबह ठीक 8:00 बजे से लेकर दोपहर 1:00 बजे तक वह पूरी एकाग्रता के साथ अपनी कंप्यूटर क्लास करता था। अपनी पढ़ाई के प्रति उसकी यह लगन देखकर मेरा दिल गर्व से भर जाता था। लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती थी; दोपहर 1:00 बजे जैसे ही कंप्यूटर क्लास ख़त्म होती, वह बिना एक पल गंवाए अपने डिलीवरी बॉय के काम के लिए निकल पड़ता था। ​मगर इस नए रास्ते में भी एक अड़चन आ खड़ी हुई। डिलीवरी बॉय की नौकरी के लिए ड्राइविंग लाइसेंस का होना अनिवार्य था, जो अभी हमारे पास नहीं था। इस मुश्किल को हल करने के लिए मुझे खुद आगे आना पड़ा। मैं अपने बेटे के साथ उसके ऑफिस गई और मुझे उसके बॉस से सीधे बात करनी पड़ी। मैंने आरटीओ (RTO) से मिली सरकारी रसीद उनके सामने रखी और बेहद शालीनता से कहा, "सर, यह लाइसेंस की पावती (Receipt) है। कृपया आप अभी इससे काम चला लीजिए, असली लाइसेंस 15 दिनों के भीतर बनकर मिल जाएगा।" उनके बॉस बहुत भल...

राधिका की डायरी ज़िम्मेदारियों का बोझ, बेटे का त्याग और अधूरी राहें

चित्र
  राधिका की डायरी  ज़िम्मेदारियों का बोझ, बेटे का त्याग और अधूरी राहें ​बेटा मुझसे गुस्सा नहीं था, वह तो बस अपनी माँ की सुरक्षा को लेकर गहरे डर और फिक्र में डूबा हुआ था। इसी फिक्र और ममता के वश में आकर उसने मुझसे कह दिया था कि मैं अब फील्ड का काम नहीं करूँगी। लेकिन ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई यह है कि घर बैठकर चूल्हा नहीं जलता। अगर हम दूर के सफर पर नहीं जा सकते थे, तो क्या हुआ? हम अपने लोकल (स्थानीय) इलाके में रहकर तो फील्ड का काम जारी रख ही सकते थे। आखिर मेरे पति जो काम बीच में अधूरा छोड़कर इस दुनिया से चले गए थे, उसे पूरा करने का बीड़ा मैंने ही तो उठाया था। उस अधूरे काम को अंजाम तक पहुँचाना मेरा फ़र्ज़ भी था और मजबूरी भी। ​वैसे भी, खर्चों की एक लंबी कतार हमारे सामने खड़ी थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि बेटे की नई बाइक की किस्त आने वाली थी। इसके अलावा, बेटे का ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवाना बेहद ज़रूरी था, जिसके लिए आधे पैसे मैं पहले ही जमा कर चुकी थी और बाकी के आधे पैसे अब जमा करने थे। अभी-अभी जो मैं फील्ड का काम करके लौटी थी, उससे कुछ पैसे कमाकर लाई थी। मैंने घर आकर बेटे को बताया कि ...

राधिका की डायरी ​घर वापसी, आंसुओं का सैलाब और एक बेटे का आख़िरी फ़ैसला

चित्र
  राधिका की डायरी ​ घर वापसी, आंसुओं का सैलाब और एक बेटे का आख़िरी फ़ैसला ​रात के ठीक ८:०० बजे मैं बस में बैठ गई। गाड़ी अच्छी और आरामदायक थी, कहने को तो वह एक लग्ज़री बस थी जहाँ इंसान आराम से सो सकता था। लेकिन उस भयानक हादसे का मेरे दिमाग पर इतना गहरा असर पड़ा था कि मेरी आँखों से नींद और चैन पूरी तरह उड़ चुके थे। जब भी आँखें बंद करती, वही बस का पहिया और अपनी थमी हुई साँसें याद आ जातीं। ९-१० घंटे का वह लंबा, डरावना और कशमकश से भरा सफर काटते हुए सुबह के ठीक ५:३० बजे मैं अपने शहर पहुँची। ​बस स्टैंड पहुँचते ही मैंने अपने बेटे को कॉल किया, वह पहले से ही वहाँ मेरा इंतज़ार कर रहा था। सुबह की हल्की धूप में अपने बेटे का चेहरा देखते ही मेरी आँखों में आँसू छलक आए। मन किया कि दौड़कर उसके गले लग जाऊँ और जी भरकर रो लूँ। लेकिन मैंने बड़ी मुश्किल से अपने जज्बात पर काबू रखा, आँसुओं को अंदर ही समेटा और चुपचाप उसके साथ घर के लिए निकल गई। घर पहुँचकर मैंने ज़िंदगी की सबसे लंबी और चैन की साँस ली। बेटे ने बिना कुछ पूछे आदर से पानी लाकर दिया और सफर की थकान के कारण वह खुद सोने चला गया। मैंने भी थोड़ा आर...