संदेश

राधिका की डायरी: ममता की छांव, डर की विदाई और एक माँ की सीख

चित्र
  राधिका की डायरी: ममता की छांव, डर की विदाई और एक माँ की सीख ​जैसे ही राधिका उस दुर्घटना स्थल पर पहुँची, अपने बेटे को सही-सलामत देखकर मानों उसकी थमी हुई साँसें वापस लौट आईं। उसके पैरों तले से जो ज़मीन खिसक गई थी, वह अब स्थिर हो गई थी। बिना एक पल गंवाए, राधिका ने अपने बेटे को दौड़कर कसकर गले लगा लिया। उसका रोम-रोम फिक्र से भर गया था; उसने बेटे के हाथ, पैर, चेहरा—हर जगह छू-छूकर देखना शुरू कर दिया कि कहीं कोई गहरी चोट तो नहीं लगी, कहीं से खून तो नहीं बह रहा। ​लेकिन इन सबसे अलग, २१ साल का उसका जवान बेटा पूरी तरह काँप रहा था। यह काँपना चोट के कारण नहीं, बल्कि गहरे डर के कारण था। उसके दिमाग में बस यही बात घूम रही थी कि 'अभी-अभी तो बाइक की पहली किस्त भी पूरी नहीं हुई और मैंने गाड़ी तोड़ डाली। अब मम्मी बहुत गुस्सा होंगी, बहुत डांटेंगी।' उसका चेहरा अपराधबोध और डर से पीला पड़ गया था। ​तभी राधिका ने उस खौफनाक माहौल को अपने प्यार से शांत किया। उसने अपने बेटे को डांटने या गाड़ी टूटने का दोष देने के बजाय, बड़ी कोमलता और प्यार से कहा, "गाड़ी टूट गई तो टूट जाने दो बेटा, कोई बात नहीं। ...

​राधिका की डायरी: रिजेक्शन का सामना, अनहोनी की दस्तक और माँ का इम्तिहान

चित्र
​ राधिका की डायरी: रिजेक्शन का सामना, अनहोनी की दस्तक और माँ का इम्तिहान ​इसि तरहा धीरे-धीरे, कदम दर कदम हमारा काम आगे बढ़ता रहा। कहते हैं ना कि सफलता की राह कभी सीधी नहीं होती। इस लोकल फील्ड वर्क के दौरान कई बार मुझे बहुत उदास भी होना पड़ता था। फील्ड में हर रोज़ नए लोगों से मिलना और उनके सीधे 'रिजेक्शन' (अस्वीकृति) का सामना करना दिल को तोड़ देता था। लोग कभी बात नहीं सुनते थे, तो कभी बिना सुने ही मना कर देते थे। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने रिजेक्शन का एक नया मतलब निकाला—मेरे लिए 'No' (ना) का मतलब सिर्फ इनकार नहीं, बल्कि 'Next Opportunity' (अगला अवसर) था। मैं हर 'ना' को अगले कस्टमर तक पहुँचने की सीढ़ी समझकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ती रही। ​लेकिन ज़िंदगी जब एक तरफ संभल रही होती है, तो दूसरी तरफ से कोई न कोई बड़ी परीक्षा आपके सामने आकर खड़ी हो जाती है। ​वह एक आम दिन था, मैं अपने काम के सिलसिले में एक बेहद ज़रूरी मीटिंग में बैठी हुई थी। यह मीटिंग एक सरकारी अस्पताल के एक सम्मानित आयुर्वेदिक डॉक्टर के केबिन में चल रही थी। हम बहुत ही गंभीरता से अपने का...

राधिका की डायरी पहली कमाई की महक, ज़िम्मेदारियों का ताना-बाना और मुस्कुराता परिवार

चित्र
  राधिका की डायरी  पहली कमाई की महक, ज़िम्मेदारियों का ताना-बाना और मुस्कुराता परिवार ​आखिरकार, मेरे बेटे ने अपने जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत कर ही दी। उसकी दिनचर्या अब पूरी तरह बदल चुकी थी। सुबह ठीक 8:00 बजे से लेकर दोपहर 1:00 बजे तक वह पूरी एकाग्रता के साथ अपनी कंप्यूटर क्लास करता था। अपनी पढ़ाई के प्रति उसकी यह लगन देखकर मेरा दिल गर्व से भर जाता था। लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती थी; दोपहर 1:00 बजे जैसे ही कंप्यूटर क्लास ख़त्म होती, वह बिना एक पल गंवाए अपने डिलीवरी बॉय के काम के लिए निकल पड़ता था। ​मगर इस नए रास्ते में भी एक अड़चन आ खड़ी हुई। डिलीवरी बॉय की नौकरी के लिए ड्राइविंग लाइसेंस का होना अनिवार्य था, जो अभी हमारे पास नहीं था। इस मुश्किल को हल करने के लिए मुझे खुद आगे आना पड़ा। मैं अपने बेटे के साथ उसके ऑफिस गई और मुझे उसके बॉस से सीधे बात करनी पड़ी। मैंने आरटीओ (RTO) से मिली सरकारी रसीद उनके सामने रखी और बेहद शालीनता से कहा, "सर, यह लाइसेंस की पावती (Receipt) है। कृपया आप अभी इससे काम चला लीजिए, असली लाइसेंस 15 दिनों के भीतर बनकर मिल जाएगा।" उनके बॉस बहुत भल...

राधिका की डायरी ज़िम्मेदारियों का बोझ, बेटे का त्याग और अधूरी राहें

चित्र
  राधिका की डायरी  ज़िम्मेदारियों का बोझ, बेटे का त्याग और अधूरी राहें ​बेटा मुझसे गुस्सा नहीं था, वह तो बस अपनी माँ की सुरक्षा को लेकर गहरे डर और फिक्र में डूबा हुआ था। इसी फिक्र और ममता के वश में आकर उसने मुझसे कह दिया था कि मैं अब फील्ड का काम नहीं करूँगी। लेकिन ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई यह है कि घर बैठकर चूल्हा नहीं जलता। अगर हम दूर के सफर पर नहीं जा सकते थे, तो क्या हुआ? हम अपने लोकल (स्थानीय) इलाके में रहकर तो फील्ड का काम जारी रख ही सकते थे। आखिर मेरे पति जो काम बीच में अधूरा छोड़कर इस दुनिया से चले गए थे, उसे पूरा करने का बीड़ा मैंने ही तो उठाया था। उस अधूरे काम को अंजाम तक पहुँचाना मेरा फ़र्ज़ भी था और मजबूरी भी। ​वैसे भी, खर्चों की एक लंबी कतार हमारे सामने खड़ी थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि बेटे की नई बाइक की किस्त आने वाली थी। इसके अलावा, बेटे का ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवाना बेहद ज़रूरी था, जिसके लिए आधे पैसे मैं पहले ही जमा कर चुकी थी और बाकी के आधे पैसे अब जमा करने थे। अभी-अभी जो मैं फील्ड का काम करके लौटी थी, उससे कुछ पैसे कमाकर लाई थी। मैंने घर आकर बेटे को बताया कि ...

राधिका की डायरी ​घर वापसी, आंसुओं का सैलाब और एक बेटे का आख़िरी फ़ैसला

चित्र
  राधिका की डायरी ​ घर वापसी, आंसुओं का सैलाब और एक बेटे का आख़िरी फ़ैसला ​रात के ठीक ८:०० बजे मैं बस में बैठ गई। गाड़ी अच्छी और आरामदायक थी, कहने को तो वह एक लग्ज़री बस थी जहाँ इंसान आराम से सो सकता था। लेकिन उस भयानक हादसे का मेरे दिमाग पर इतना गहरा असर पड़ा था कि मेरी आँखों से नींद और चैन पूरी तरह उड़ चुके थे। जब भी आँखें बंद करती, वही बस का पहिया और अपनी थमी हुई साँसें याद आ जातीं। ९-१० घंटे का वह लंबा, डरावना और कशमकश से भरा सफर काटते हुए सुबह के ठीक ५:३० बजे मैं अपने शहर पहुँची। ​बस स्टैंड पहुँचते ही मैंने अपने बेटे को कॉल किया, वह पहले से ही वहाँ मेरा इंतज़ार कर रहा था। सुबह की हल्की धूप में अपने बेटे का चेहरा देखते ही मेरी आँखों में आँसू छलक आए। मन किया कि दौड़कर उसके गले लग जाऊँ और जी भरकर रो लूँ। लेकिन मैंने बड़ी मुश्किल से अपने जज्बात पर काबू रखा, आँसुओं को अंदर ही समेटा और चुपचाप उसके साथ घर के लिए निकल गई। घर पहुँचकर मैंने ज़िंदगी की सबसे लंबी और चैन की साँस ली। बेटे ने बिना कुछ पूछे आदर से पानी लाकर दिया और सफर की थकान के कारण वह खुद सोने चला गया। मैंने भी थोड़ा आर...

राधिका की डायरी ​अकेलापन, अनकहे आँसू और एक माँ का डर

चित्र
  राधिका की डायरी में ​ अकेलापन, अनकहे आँसू और एक माँ का डर ​शाम के ठीक ६:४० बजे मैं बस स्टैंड पहुँच चुकी थी। ८:०० बजे की बस के लिए अभी मेरे पास काफी वक्त था। घबराहट और कमजोरी के कारण पैर काँप रहे थे, इसलिए मैं वहीं पास की एक ट्रैवल एजेंसी की दुकान पर बैठ गई और अपनी टिकट कटवा ली। मुझे बदहवास देखकर एजेंसी के मालिक ने सहूलियत के लहजे में कहा, "मैडम, यह बस रास्ते में कहीं भी खाना खाने के लिए नहीं रुकेगी। आपके पास अभी काफी समय है, आप चाहें तो पास से कुछ खाकर आ सकती हैं।" ​उसने तो सीधे मन से कहा था, लेकिन मेरे भीतर तो विचारों का एक ऐसा बवंडर चल रहा था जहाँ भूख-प्यास की कोई जगह ही नहीं थी। मेरे दिमाग में एक के बाद एक हजारों खौफनाक ख्याल आ रहे थे और जा रहे थे। मैं सोच रही थी कि जो भयानक हादसा आज टल गया, अगर वह सच हो जाता तो क्या होता? अगर आज मुझे कुछ हो जाता, तो मेरे बच्चों का क्या होता? उन्हें इस पहाड़ी इलाके में कैसे पता चलता? मेरा बेटा क्या करता, मेरी बेटी कैसे संभालती? उनकी ज़िंदगी कैसी हो जाती? और अगर मैं मरती नहीं, बल्कि उम्र भर के लिए अपाहिज हो जाती, तो इस मतलबी दुनिया में ...

राधिका की डायरी ​हादसे के बाद: टूटती साँसें, अपनों की आवाज़ और वो खौफनाक मंजर

चित्र
  राधिका की डायरी ​ हादसे के बाद: टूटती साँसें, अपनों की आवाज़ और वो खौफनाक मंजर ​उस खौफनाक हादसे के बाद, मैं पूरी तरह से अंदर तक डर चुकी थी। मेरी छाती में धड़कनें इतनी तेज चल रही थीं, मानो कोई अंदर हथौड़ा चला रहा हो। डर का वह कंपन मेरी रग-रग में, शरीर के हर एक हिस्से में साफ़ महसूस हो रहा था; मेरी धमनियों में जैसे खून का नहीं, बल्कि एक भयानक तूफान दौड़ रहा था। ​सड़क पर देखते ही देखते लोगों की एक भारी भीड़ इकट्ठा हो गई। बिना पूरी बात जाने, लोग उस लड़के (पंडित जी के बेटे) को भला-बुरा कहने लगे और उस पर गुस्सा उतारने लगे। लेकिन मेरी स्थिति ऐसी थी कि मैं न तो पूरी तरह बेहोश हो पा रही थी और न ही पूरे होश में थी। मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। ऐसा लग रहा था मानो मैं अभी भी मौत के उस अंधेरे मुँह में ही बैठी हूँ। वहाँ खड़ी कुछ सहृदय महिलाओं ने आगे बढ़कर मुझे सहारा दिया और पकड़कर उठाया। कुछ पुरुषों ने नीचे गिरी मोटरसाइकिल और मेरे बैग्स को संभाला। लोग मुझे तसल्ली दे रहे थे, तभी भीड़ में से एक लड़का दौड़कर गया और मेरे लिए पानी लेकर आया। पानी के दो घूँट गले से नीच...