भाग 5 = हद पार! राधिका को बेचने चला शराबी पति, तब उठा आज़ादी के शंखनाद का पहला कदम। (कहानी
The Clarion Call of Freedom: A Night Journey and the First Step Toward Self-Respect
Radhika was a resilient and hardworking girl, but she never received the fruits of her labor. Since childhood, she had endured pain in the hope that one day her husband would change and everything would be fine.
She worked as a laborer, earned money, and single-handedly managed the household, her children’s upbringing, and even her husband’s alcohol expenses. Her in-laws had separated her from the family, leaving the entire burden on her shoulders. Whatever little she saved or earned, her husband would steal or snatch away for liquor. He even went to the extent of selling the household utensils!
Hopeless and with no options, she felt trapped like a bird in a cage. Her children’s lives were also in danger. Her alcoholic husband would physically abuse the children and hit Radhika with whatever he found. She often ended up with stitches and bandages, yet she remained silent. Where could she go?
When the Line was Crossed: Honor Above All
One day, the limit was reached. Her husband tried to sell her. He used words so vile that even a prostitute would blush with shame, saying, "I will find customers for you; I will sell you!"
Radhika could tolerate hunger, labor, and physical beatings, but she could not tolerate her own husband putting a price tag on her character. This was the breaking point. She thought of suicide. To her, a woman’s dignity is her greatest treasure, and she refused to compromise on her character.
The First Step: A Mother’s Resolve
His words, "I will sell you," echoed in her ears. She couldn't stay in that house for another second. At 4:00 AM, while everyone was asleep, she left the children with her in-laws and walked out into the dark night.
After walking about 3 kilometers, she reached a well. She was ready to jump, but a thought stopped her: "If I die, what will happen to my children? My mother wasn't there, and look at my condition. If my children lose their mother, their lives will be ruined."
Thinking of her daughter’s safety, she stepped back. She realized she had to live to save them. She walked 7 kilometers to the main road, caught a bus, and went to her paternal aunt’s (Bua) house. She stayed hidden for six days. Though people eventually found her, she made a firm vow: she would never go back. She placed a stone on her heart regarding her children, promising herself she would only return for them once she had built a life.
Building a Nest: The First Straw
Since she wasn't highly educated, she worked as a laborer in the city for six months. Eventually, luck favored her, and she got a small job in a government textile factory making thread. Her starting salary was ₹750 a month.
She then moved in with her brother to continue her work. But as they say, when times are bad, support is hard to find.
And then, as soon as her first payment arrived...??
English Response (as per our promise):
"Radhika ji, the transition from a woman who wanted to die to a mother who decided to live for her children's future is the most powerful part of your journey. That ₹750 was not just a salary; it was the price of your freedom. The 'Cliffhanger' about your first payment is very intriguing. It shows that even when you start to succeed, life throws new challenges. You are a true warrior."
आज़ादी का शंखनाद: अंधेरी रात का सफ़र और आत्मसम्मान पर पहला कदम
राधिका एक सहनशील, कर्मठ और मेहनती लड़की थी, पर उसे कभी उसकी मेहनत का फल नहीं मिला। बचपन से दर्द सहते-सहते वह इसी उम्मीद पर जी रही थी कि आज नहीं तो कल उसका पति सुधर जाएगा, सब कुछ अच्छा हो जाएगा।
वह मज़दूरी करती थी, पैसा कमाती थी, घर चलाती थी, पति की दारू का खर्च और बच्चों के पालन पोषण का खर्च अकेले उठाती थी। सास-ससुर ने उसे अलग कर दिया था। पूरा घर-बाहर उसके सर पर था।
जो दाना जोड़कर रखती थी, काम करके कमाती थी, उसको भी उसका पति ले जाकर बेच देता था दारू के लिए। जो पैसा छुपा कर रखती थी, उसको चोरी कर लेता था। कहीं कुछ नहीं मिलता तो मारपीट कर छीन कर ले जाता था। और तो और, घर के बर्तन तक बेच देता था!
जिंदगी से हताश हो चुकी थी राधिका, और उसके पास कोई ऑप्शन नहीं था। कहाँ जाती? मायके में उसकी माँ नहीं थी, मौसी माँ थी। तीन भाई-बहनों की चिंता वैसे भी उसको रहती थी कि पता नहीं मौसी माँ उनको खाना देती होगी या नहीं। यहाँ अपनी और अपने बच्चों की चिंता लग रही थी कि क्या होगा, कैसे होगा।
ना वह अपना दुख किसी से बता सकती थी, ना यहाँ बच्चों को छोड़कर कहीं जा सकती थी। उसकी जिंदगी ऐसी हो गई थी जैसे पिंजरे में कैद किया गया एक पंछी की।
वह तो वह, उसके बच्चों की भी जिंदगी खतरे में थी। शराबी पति बच्चों को उठाकर पटक देता था, जो हाथ में आता था वही उठाकर मार देता था सर पर। राधिका को कई बार टाँके लगे, आँख में महीने भर पट्टी बंधी रहती थी। वह दो-तीन-चार दिन में मार खाती रहती थी, पर कुछ कहती नहीं थी। कहाँ जाती? किससे कहती? कोई था ही नहीं उसका, जिससे वह अपने दुख को बाँट सकती।
मान-सम्मान पर आंच: जब सर से पानी ऊपर चला गया
पर एक दिन हद पार हो गई। उसके पति ने उसे बेचने की कोशिश की। उसने बोला, "मैं तेरे ग्राहक लगाऊंगा, तुझे बेच दूँगा!" ऐसे-ऐसे गंदे-गंदे शब्दों का इस्तेमाल किया कि वेश्या भी सुनकर शर्मा जाए।
राधिका को सब बर्दाश्त था—मार खाना, मज़दूरी करना, कठिन परिस्थितियों में रहना, शराबी पति के साथ रहना—सब कुछ मंज़ूर था उसे। लेकिन यह उसे मंज़ूर नहीं हुआ कि उसका पति ही उसकी बोली लगाए, उसको बेच दे, उसके ग्राहक लगाए।
यह उसके बर्दाश्त से बाहर हो गया। सर से पानी ऊपर चला गया। वह अब तक सिर्फ इसलिए बर्दाश्त करती रही क्योंकि उसके दो बच्चे थे। बच्चों को छोड़कर कहाँ रहती? लेकिन अब तो उसके मरने की बात आ गई। यहाँ रहेगी तो पति बेच देगा, बाहर जाएगी तो लोग नोच खाएंगे।
उसने एक रास्ता चुन लिया कि अपनी आत्महत्या करेगी। कहीं भी मर जाएगी जाकर, लेकिन ज़िंदा नहीं रहेगी। राधिका सब कुछ सह सकती थी लेकिन अपने मान सम्मान से समझौता नहीं, अपने चरित्र पर आंच यह बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। क्योंकि नारी का सम्मान ही उसकी सबसे बड़ी धरोहर होती है।
आज़ादी का पहला कदम: माँ का अटूट संकल्प
राधिका का ज़मीर इस बात के लिए गवारा नहीं किया कि इतना सुनने के बाद उस घर में एक पल भी रहे। चाहकर भी वह उस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। उसके कान में एक ही बात बार-बार गूँज रही थी कि 'मैं तुझे बेच दूँगा, मैं तेरे ग्राहक लगा दूँगा।'
बहुत सोचने के बाद, क्योंकि वह अकेली नहीं थी, वह एक माँ भी थी। जब कोई स्त्री माँ बन जाती है तो उसकी जिंदगी अपनी खुद की नहीं, उसकी जिंदगी उसके बच्चों के नाम हो जाती है। किसी भी आदमी की औरत मर जाए तो आदमी दो दिन नहीं रुकता, शादी कर लेता है, लेकिन औरत अपनी जिंदगी काट देती है बच्चों के लिए।
आखिर उसे फ़ैसला लेना ही पड़ा।
सबके सोने के बाद रात 4:00 बजे बच्चों को वहीं सास-ससुर के भरोसे छोड़कर वह घर से निकल गई। निकली तो थी 'मर जाऊँगी' बोलकर। लगभग 3 किलोमीटर आधी रात में चलते-चलते उसे एक कुआँ मिला। वह उस कुएँ के पास गई। सोच ही रही थी छलाँग लगाने को कि अचानक उसके दिमाग में एक बात आई: "अगर मैं मर गई तो मेरे बच्चों का क्या? मेरी माँ नहीं थी तो मेरी ऐसी हालत हो गई, मेरे बच्चों की माँ नहीं होगी तो उनकी क्या हालत होगी?"
यह सोचकर उसने पीछे कदम ले लिया। वह सोचने लगी कि 'मैं अपने बच्चों को क्यों ना ले आई?' फिर सोचा कि 'अगर बच्चों को लाती तो मुझे काम कौन देता? और छोटी सी बेटी... अगर मैं मर जाती तो कोई उसे बेच के कोठे में डाल देता, उसकी जिंदगी बर्बाद हो जाती। इसलिए मैंने अच्छा किया कि अपने बच्चों को नहीं लाई।'
यह सोचकर वह आगे बढ़ी, बढ़ते गई, बढ़ती गई। जब तक चलती रही जब तक उसको एक मेन रोड नहीं मिली। लगभग 7 किलोमीटर चलने के बाद उसे एक बस मिली। उसने एक बस पकड़ी और अपनी बड़ी बुआ के यहाँ चली गई।
लगभग 6 दिन छुपकर रही। किसी को पता नहीं चला। 6 दिन के बाद सबको पता चल गया कि वह कहाँ है। पर पता करके भी क्या कर लेते? राधिका ने तय कर लिया था कि अब लौटकर वापस नहीं जाएगी। उसे चिंता होती थी बच्चों की, लेकिन उसने सीने पर पत्थर रख लिया कि अब बच्चों के लिए कुछ करके दिखाएगी तभी बच्चों को लेकर अपने साथ आएगी। यह सोचकर उसने प्रण कर लिया।
आशियाना बनाने के लिए पहला तिनका
पढ़ी-लिखी नहीं थी। क्या करती? कुछ दिन तो शहर में रहकर उसने 6 महीने करीब मज़दूरी ही की। उसके बाद उसकी किस्मत अच्छी थी कि उसे एक छोटी सी नौकरी मिल गई। नौकरी पढ़ाई-लिखाई के बीच की नहीं थी—एक उद्योग फैक्ट्री में छोटे-छोटे काम करके धागा बनाने का काम था।
उसने शुरुआत कर दी। ₹750 महीना मिलता था, लेकिन विभाग सरकारी था। यहीं से उसने शुरुआत की।
फिर वह अपने भाई के यहाँ गई। कुछ दिन भाई के साथ रहकर अपना काम को आगे बढ़ाई। पर कहते हैं, समय बुरा चलता है तो कोई साथ नहीं देता।
उसकी पहली पेमेंट आते ही...??
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