भाग 7 = हार नहीं मानी! ₹750 से ₹2400 तक का सफ़र: राधिका ने पापा को दिया सबसे बड़ा सम्मान।
गुल्लक के धोखे के बाद, आत्मनिर्भरता का पहला ठोस कदम
पिछली पोस्ट में आपने जाना कि विश्वासघात के बाद राधिका पूरी तरह टूट गई थी, पर उसने हार नहीं मानी। 3 दिन रोने के बाद, उसने हिम्मत जुटाई। ₹750 महीने की छोटी पेमेंट और कुछ बचत के बावजूद, ₹4000 की सिलाई मशीन अभी भी दूर थी।
राधिका ने अपनी ज़िन्दगी का एक और साहसी फ़ैसला लिया: उसने अपने पापा से ₹1800 उधार लिए और तुरंत अपनी सिलाई मशीन उठा ली!
परिवार की नाराज़गी और नया ठिकाना
सिलाई मशीन आने के बाद, राधिका को अपने भाई का रवैया समझ में आ गया। लड़ाई करने के बजाय, उसने चुपचाप नया रास्ता चुना। राधिका जानती थी कि किसी के हाव-भाव या तानों की परवाह करने से बेहतर है कि वह अपनी जगह खुद बनाए।
उसने तुरंत एक नया कमरा देखना शुरू कर दिया।
साहस और आत्मविश्वास से सैलरी में उछाल
राधिका ने अपने बॉस से बात करने का फ़ैसला लिया। उन्होंने हिम्मत से पूछा, "सर, मेरा घर ₹750 में नहीं चल सकता। मुझे कोई ऐसा काम दे दें, जिससे मुझे ज़्यादा पैसा मिल सके।"
बॉस (जो एक अच्छे इंसान थे) ने उनसे पूछा, "बताओ, तुम्हारा घर कितने में चल जाएगा?"
राधिका ने आत्मविश्वास से कहा, "कम से कम ₹1500 से ₹2000 तो मिलना चाहिए।"
बॉस ने उनकी हिम्मत और ईमानदारी देखी और कहा, "फील्ड वर्क करोगी? मैं तुम्हें ₹2100 देता हूँ।"
राधिका की पेमेंट तुरंत ₹750 से ₹2100 हो गई!
पसीना और लगन: हर कदम एक जीत
₹800 महीने का कमरा तो मिल गया, पर पास में कुछ नहीं था। मशीन तो थी, पर सिर्फ एक झाड़ू और एक चटाई खरीद पाई। ₹2100 की सैलरी अभी महीने भर बाद आती, इसलिए उसने बॉस से ₹1000 एडवांस लिया। उन्होंने मना नहीं किया। ₹400 मकान मालिक को दिए, और ₹400 के कुछ बर्तन ले आई।
उसका फील्ड वर्क आसान नहीं था। कभी 5 कि.मी., कभी 7 कि.मी., कभी 10 कि.मी. पैदल जाना पड़ता था। ऑटो के लिए पैसे नहीं थे। 9 बजे ड्यूटी पर पहुँचने के लिए वह 7:30 बजे घर से निकल जाती थी।
पर राधिका ने अपना काम पूरी लगन और निष्ठा से किया। उसका काम सबको पसंद आने लगा, और कुछ ही महीनों में उन्होंने उसकी पेमेंट और बढ़ा दी—₹2400! उसकी पोस्ट भी बढ़ गई, और वह एक सर्विस प्रोवाइडर के पद पर काम करने लगी। धीरे-धीरे उसने छोटे-छोटे सामान ले लिए और एक छोटी सी गृहस्थी बना ली।
"पापा, अब मुझे अपने दम पर कुछ करने दो।"
एक दिन राधिका के पापा उसे वापस ले जाने आए। राधिका ने उन्हें सबसे बड़ा सम्मान दिया। उसने पापा के पैसे वापस कर दिए और प्रेम से कहा:
"पापा, एक दिन तो मुझे अपने पैरों पर खड़े होना ही पड़ेगा। कब तक आपकी ऊँगली पकड़कर चलूँगी? अब मुझे अपने दम पर कुछ करने दो। आप मुझ पर विश्वास रखो। मैं आपकी नज़र नीचे कभी नहीं होने दूँगी। मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगी, जिससे आपको या आपके ऊपर कोई उँगली उठाए।"
अगले संघर्ष की तैयारी
राधिका ने आज़ादी की अपनी पहली उड़ान भर ली थी। ₹2400 की सैलरी, अपनी सिलाई मशीन, और अपना कमरा—ये सब उसकी मेहनत से अर्जित किया था। लेकिन बच्चों को अपने पास लाने, उन्हें अच्छी ज़िंदगी देने और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए उसे अभी और भी कई अकेली लड़ाइयाँ लड़नी थीं।
क्या राधिका अपने बच्चों को वापस ला पाएगी? और वह कौन-सा बड़ा फ़ैसला होगा, जो उसकी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल देगा?
जानें अगले भाग में...

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